बिहार में होली कब है-3 को या 4 मार्च को:2 तारीख को होलिका दहन, रंग खेलने में एक दिन का अंतर क्यो

बिहार में होली कब है-3 को या 4 मार्च को:2 तारीख को होलिका दहन, रंग खेलने में एक दिन का अंतर क्यो

होली कब है? 3 मार्च या 4 मार्च। कब होलिका दहन होगा? होलिका दहन पर भद्रा का साया और खग्रास चंद्र ग्रहण के चलते होली पर्व की तारीखों पर क्या असर पड़ रहा है? इन सवालों ने कई लोगों को उलझा रखा है। ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार 2 मार्च को होलिका दहन पर भद्रा का साया पड़ रहा है। 3 मार्च को खग्रास चंद्र ग्रहण रहेगा। इसके चलते इस दिन होली मनाना शास्त्रों के अनुसार ठीक नहीं है। ग्रहण से 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाएगा। इस दौरान शुभ कार्य नहीं किए जाते। इसलिए होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। आइए जानते हैं- भद्रा कौन थी? खग्रास चंद्र ग्रहण क्या है? होलिका दहन के लिए कौन सा समय ठीक है? इसकी विधि क्या है? 2 मार्च को होलिका दहन, 3 मार्च को कीजिए कुलदेवता की पूजा

होलिका दहन की तिथि मिथिला और बनारसी दोनों पंचांग में 2 मार्च बताई गई है। फाल्गुन शुक्ल की पूर्णिमा दो दिन होने के चलते होलिका दहन के एक दिन बाद 4 मार्च को होली पर्व मनाया जाएगा। 2 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा है। 3 मार्च को स्नान-दान करने का विधान है। पूर्णिमा सोमवार शाम 05:32 बजे से शुरू होकर मंगलवार शाम 04:46 बजे तक है। आचार्य राकेश झा ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलिका दहन को लेकर शास्त्रों में तीन नियम बताए गए हैं। पहला पूर्णिमा तिथि, दूसरा भद्रा मुक्त काल और तीसरा रात्रि का समय होना चाहिए। भद्रा में श्रावणी कर्म और फाल्गुनी कर्म वर्जित है। 2 मार्च की रात में पूर्णिमा तिथि व मघा नक्षत्र में होलिका दहन होगा। 3 मार्च को सूर्योदयकालीन पूर्णिमा, स्नान-दान की पूर्णिमा, कुलदेवता को सिन्दूर अर्पण किया जाएगा। इस दिन आप कुलदेवता की पूजा कर सकते हैं। कब है होलिका दहन के लिए शुभ समय? आचार्य राकेश झा ने बताया कि 2 मार्च को सूर्योदय सुबह 06:16 बजे होगा। इस दिन चतुर्दशी तिथि शाम 05:18 बजे तक रहेगी। इसके बाद पूर्णिमा तिथि शुरू होगी। इस दिन सुबह 07:24 बजे तक आश्लेषा नक्षत्र रहेगा। इसके बाद मघा नक्षत्र होगा। अतिगण्ड योग (अशुभ योग) दोपहर 12:06 बजे तक रहेगा। इसके बाद सुकर्मा योग (शुभ योग) बनेगा। पूर्णिमा तिथि 3 मार्च को शाम 04:33 बजे तक रहेगी। भद्रा की स्थिति 2 मार्च शाम 05:18 बजे से लेकर 3 मार्च सुबह 04:56 बजे तक रहेगी। यानी 2 मार्च की पूरी रात भद्रा और पूर्णिमा दोनों साथ-साथ रहेंगी। ऐसी स्थिति में शास्त्र बताते हैं कि भद्रा के पुच्छ भाग यानी की शुभ काल में होलिका दहन किया जा सकता है। यह समय शुभ माना गया है। इस साल भद्रा का शुभ काल रात 12:50 से रात के 02:02 बजे तक है। यही 1 घंटा 12 मिनट का समय होलिका दहन के लिए शुभ मुहूर्त रहेगा। हालांकि सूर्यास्त के बाद कभी भी होलिका दहन किया जा सकता है, लेकिन इस एक घंटे के दौरान शुभ समय होगा। होलिका दहन के 24 घंटे बाद होली खेली जाएगी। यह बहुत दुर्लभ स्थिति है।
रोग-शोक से दूर रहने के लिए करें होलिका की पूजा राकेश झा के अनुसार होलिका दहन के दिन होलिका की पूजा में अक्षत, गंगाजल, रोली-चंदन, मौली, हल्दी, दीपक, मिष्ठान आदि से पूजा करनी चाहिए। इसके बाद उसमें आटा, गुड़, कर्पूर, तिल, धुप, गुगुल, जौ, घी, आम की लकड़ी, गाय के गोबर से बने उपले या गोइठा डालकर सात बार परिक्रमा करने से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि में वृद्धि, नकारात्मकता की कमी, रोग-शोक से मुक्ति व मनोकामना की पूर्ति होती है। होलिका दहन की पूजा करने से होलिका की अग्नि में सभी दुख, कष्ट, रोग, दोष जलकर खत्म हो जाते हैं। ग्रह दोष दूर होते हैं। होलिका जलने के बाद उसमे चना या गेहूं की बाली सेंक कर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना चाहिए। भद्रा को अशुभ क्यों माना जाता है? राकेश झा ने बताया कि भद्रा शनिदेव की बहन हैं। इनका स्वभाव उग्र माना गया है। इसके चलते भद्रा काल को क्रोध और विघ्न का समय माना जाता है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य करने से बचना चाहिए। क्या है खग्रास चंद्र ग्रहण, 3 मार्च को लगेगा? खग्रास चंद्र ग्रहण पूर्ण चंद्र ग्रहण को कहते हैं। इसमें धरती की छाया पूरे चंद्रमा पर पड़ती है। इस साल 3 मार्च की शाम को चंद्रग्रहण लग रहा है। इससे 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाएगा। शाम करीब 05:59 बजे ग्रहण होने के कारण सुबह लगभग 06:30 बजे से सूतक काल लागू हो जाएगा। ग्रहण लगभग शाम को 06:48 बजे खत्म होगा। सूतक काल के दौरान खान-पान वर्जित माना जाता है। शुभ व मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इसलिए 3 मार्च को होली नहीं मनाई जाएगी। दो नक्षत्रों के मिले जुले संयोग में 4 मार्च को होली ज्योतिषाचार्य राकेश झा ने पंचागों के हवाले से बताया कि 4 मार्च को होली का पर्व पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के युग्म संयोग (एक साथ दो संयोग) में मनाई जाएगी। इस दिन सुबह 07:27 बजे तक पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र रहेगा, फिर पूरे दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र रहेगा। इसके अलावा इस दिन धृति योग भी रहेगा। होली के दिन सबसे पहले अपने कुल देवता, इष्ट देवता, आराध्य देवी और देवताओं की पूजा कर मधुर पकवान का भोग अर्पित करने के बाद उन्हें लाल, पीला या गुलाबी रंग के शुद्ध या हर्बल अबीर-गुलाल लगाना चाहिए। फिर बड़ों से आशीर्वाद लेकर आपस में प्रेम और सौहार्द से अबीर-गुलाल लगाकर होली का त्योहार मनाना चाहिए। क्या है होली के रंगों का महत्व? लाल: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लाल रंग ऊर्जा, शक्ति, भूमि, भवन, साहस व पराक्रम का प्रतीक है। इस रंग के प्रयोग से मंगल ग्रह भी प्रसन्न रहते हैं। लाल रंग से होली खेलने से स्वास्थ्य और यश में वृद्धि होती है। पीला: पीला रंग सौंदर्य व आध्यात्मिक तेज को निखारता है। इसके साथ ही पीले वस्त्र के इस्तेमाल से देवगुरु बृहस्पति भी प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं। नारंगी: नारंगी रंग ज्ञान, ऊर्जा, शक्ति, प्रेम व आनंद का प्रतीक है। यह रंग लाल और पीले से मिलकर प्रकट होता है। जीवन में इसके प्रयोग से मंगल व गुरु दोनों ग्रहों की कृपा तो बनी ही रहती है, साथ ही सूर्यदेव की भी असीम कृपा बरसती है। नीला: नीला रंग भगवान शिव के गुण और भाव को प्रदर्शित करता है। यह रंग साफ-सुथरा बिना पाप का, पारदर्शी, करुणामय, उच्च विचार होने का सूचक है। हरा: हरा रंग, समृद्धि, उत्कर्ष, प्रेम, दया, प्रगति, प्रकृति, सुकून, हीलिंग, प्रचुरता, तरक्की और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। हरे रंग के प्रयोग से बुध की कृपा बनी रहती है। बैंगनी: पर्पल या बैंगनी रंग विलासिता, रईसी, आत्मसम्मान और संतुलन का प्रतीक है। यह रंग पवित्रता व मासूमियत को दर्शाता है। गुलाबी: गुलाबी रंग खूबसूरती, प्यार, जोश एवं रोमांस का प्रतीक है। जीवन को आनंदमय बनाने के लिए इस रंग से होली खेलनी चाहिए। होली कब है? 3 मार्च या 4 मार्च। कब होलिका दहन होगा? होलिका दहन पर भद्रा का साया और खग्रास चंद्र ग्रहण के चलते होली पर्व की तारीखों पर क्या असर पड़ रहा है? इन सवालों ने कई लोगों को उलझा रखा है। ज्योतिष शास्त्रियों के अनुसार 2 मार्च को होलिका दहन पर भद्रा का साया पड़ रहा है। 3 मार्च को खग्रास चंद्र ग्रहण रहेगा। इसके चलते इस दिन होली मनाना शास्त्रों के अनुसार ठीक नहीं है। ग्रहण से 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाएगा। इस दौरान शुभ कार्य नहीं किए जाते। इसलिए होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। आइए जानते हैं- भद्रा कौन थी? खग्रास चंद्र ग्रहण क्या है? होलिका दहन के लिए कौन सा समय ठीक है? इसकी विधि क्या है? 2 मार्च को होलिका दहन, 3 मार्च को कीजिए कुलदेवता की पूजा

होलिका दहन की तिथि मिथिला और बनारसी दोनों पंचांग में 2 मार्च बताई गई है। फाल्गुन शुक्ल की पूर्णिमा दो दिन होने के चलते होलिका दहन के एक दिन बाद 4 मार्च को होली पर्व मनाया जाएगा। 2 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा है। 3 मार्च को स्नान-दान करने का विधान है। पूर्णिमा सोमवार शाम 05:32 बजे से शुरू होकर मंगलवार शाम 04:46 बजे तक है। आचार्य राकेश झा ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलिका दहन को लेकर शास्त्रों में तीन नियम बताए गए हैं। पहला पूर्णिमा तिथि, दूसरा भद्रा मुक्त काल और तीसरा रात्रि का समय होना चाहिए। भद्रा में श्रावणी कर्म और फाल्गुनी कर्म वर्जित है। 2 मार्च की रात में पूर्णिमा तिथि व मघा नक्षत्र में होलिका दहन होगा। 3 मार्च को सूर्योदयकालीन पूर्णिमा, स्नान-दान की पूर्णिमा, कुलदेवता को सिन्दूर अर्पण किया जाएगा। इस दिन आप कुलदेवता की पूजा कर सकते हैं। कब है होलिका दहन के लिए शुभ समय? आचार्य राकेश झा ने बताया कि 2 मार्च को सूर्योदय सुबह 06:16 बजे होगा। इस दिन चतुर्दशी तिथि शाम 05:18 बजे तक रहेगी। इसके बाद पूर्णिमा तिथि शुरू होगी। इस दिन सुबह 07:24 बजे तक आश्लेषा नक्षत्र रहेगा। इसके बाद मघा नक्षत्र होगा। अतिगण्ड योग (अशुभ योग) दोपहर 12:06 बजे तक रहेगा। इसके बाद सुकर्मा योग (शुभ योग) बनेगा। पूर्णिमा तिथि 3 मार्च को शाम 04:33 बजे तक रहेगी। भद्रा की स्थिति 2 मार्च शाम 05:18 बजे से लेकर 3 मार्च सुबह 04:56 बजे तक रहेगी। यानी 2 मार्च की पूरी रात भद्रा और पूर्णिमा दोनों साथ-साथ रहेंगी। ऐसी स्थिति में शास्त्र बताते हैं कि भद्रा के पुच्छ भाग यानी की शुभ काल में होलिका दहन किया जा सकता है। यह समय शुभ माना गया है। इस साल भद्रा का शुभ काल रात 12:50 से रात के 02:02 बजे तक है। यही 1 घंटा 12 मिनट का समय होलिका दहन के लिए शुभ मुहूर्त रहेगा। हालांकि सूर्यास्त के बाद कभी भी होलिका दहन किया जा सकता है, लेकिन इस एक घंटे के दौरान शुभ समय होगा। होलिका दहन के 24 घंटे बाद होली खेली जाएगी। यह बहुत दुर्लभ स्थिति है।
रोग-शोक से दूर रहने के लिए करें होलिका की पूजा राकेश झा के अनुसार होलिका दहन के दिन होलिका की पूजा में अक्षत, गंगाजल, रोली-चंदन, मौली, हल्दी, दीपक, मिष्ठान आदि से पूजा करनी चाहिए। इसके बाद उसमें आटा, गुड़, कर्पूर, तिल, धुप, गुगुल, जौ, घी, आम की लकड़ी, गाय के गोबर से बने उपले या गोइठा डालकर सात बार परिक्रमा करने से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि में वृद्धि, नकारात्मकता की कमी, रोग-शोक से मुक्ति व मनोकामना की पूर्ति होती है। होलिका दहन की पूजा करने से होलिका की अग्नि में सभी दुख, कष्ट, रोग, दोष जलकर खत्म हो जाते हैं। ग्रह दोष दूर होते हैं। होलिका जलने के बाद उसमे चना या गेहूं की बाली सेंक कर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना चाहिए। भद्रा को अशुभ क्यों माना जाता है? राकेश झा ने बताया कि भद्रा शनिदेव की बहन हैं। इनका स्वभाव उग्र माना गया है। इसके चलते भद्रा काल को क्रोध और विघ्न का समय माना जाता है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य करने से बचना चाहिए। क्या है खग्रास चंद्र ग्रहण, 3 मार्च को लगेगा? खग्रास चंद्र ग्रहण पूर्ण चंद्र ग्रहण को कहते हैं। इसमें धरती की छाया पूरे चंद्रमा पर पड़ती है। इस साल 3 मार्च की शाम को चंद्रग्रहण लग रहा है। इससे 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाएगा। शाम करीब 05:59 बजे ग्रहण होने के कारण सुबह लगभग 06:30 बजे से सूतक काल लागू हो जाएगा। ग्रहण लगभग शाम को 06:48 बजे खत्म होगा। सूतक काल के दौरान खान-पान वर्जित माना जाता है। शुभ व मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इसलिए 3 मार्च को होली नहीं मनाई जाएगी। दो नक्षत्रों के मिले जुले संयोग में 4 मार्च को होली ज्योतिषाचार्य राकेश झा ने पंचागों के हवाले से बताया कि 4 मार्च को होली का पर्व पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के युग्म संयोग (एक साथ दो संयोग) में मनाई जाएगी। इस दिन सुबह 07:27 बजे तक पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र रहेगा, फिर पूरे दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र रहेगा। इसके अलावा इस दिन धृति योग भी रहेगा। होली के दिन सबसे पहले अपने कुल देवता, इष्ट देवता, आराध्य देवी और देवताओं की पूजा कर मधुर पकवान का भोग अर्पित करने के बाद उन्हें लाल, पीला या गुलाबी रंग के शुद्ध या हर्बल अबीर-गुलाल लगाना चाहिए। फिर बड़ों से आशीर्वाद लेकर आपस में प्रेम और सौहार्द से अबीर-गुलाल लगाकर होली का त्योहार मनाना चाहिए। क्या है होली के रंगों का महत्व? लाल: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लाल रंग ऊर्जा, शक्ति, भूमि, भवन, साहस व पराक्रम का प्रतीक है। इस रंग के प्रयोग से मंगल ग्रह भी प्रसन्न रहते हैं। लाल रंग से होली खेलने से स्वास्थ्य और यश में वृद्धि होती है। पीला: पीला रंग सौंदर्य व आध्यात्मिक तेज को निखारता है। इसके साथ ही पीले वस्त्र के इस्तेमाल से देवगुरु बृहस्पति भी प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाते हैं। नारंगी: नारंगी रंग ज्ञान, ऊर्जा, शक्ति, प्रेम व आनंद का प्रतीक है। यह रंग लाल और पीले से मिलकर प्रकट होता है। जीवन में इसके प्रयोग से मंगल व गुरु दोनों ग्रहों की कृपा तो बनी ही रहती है, साथ ही सूर्यदेव की भी असीम कृपा बरसती है। नीला: नीला रंग भगवान शिव के गुण और भाव को प्रदर्शित करता है। यह रंग साफ-सुथरा बिना पाप का, पारदर्शी, करुणामय, उच्च विचार होने का सूचक है। हरा: हरा रंग, समृद्धि, उत्कर्ष, प्रेम, दया, प्रगति, प्रकृति, सुकून, हीलिंग, प्रचुरता, तरक्की और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। हरे रंग के प्रयोग से बुध की कृपा बनी रहती है। बैंगनी: पर्पल या बैंगनी रंग विलासिता, रईसी, आत्मसम्मान और संतुलन का प्रतीक है। यह रंग पवित्रता व मासूमियत को दर्शाता है। गुलाबी: गुलाबी रंग खूबसूरती, प्यार, जोश एवं रोमांस का प्रतीक है। जीवन को आनंदमय बनाने के लिए इस रंग से होली खेलनी चाहिए।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *