दौसा। खारे पानी की समस्या से जूझ रहे किसानों के लिए खुशखबर है। अब किसान खारे पानी में भी जौ की खेती आसानी से कर सकेंगे। राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान दुर्गापुरा (जयपुर) की ओर से विकसित की गई जौ की आरडी 2907 किस्म पर कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) दौसा पर किए गए प्रयोग में सफलता मिली है।
यहां की लवणीय भूमि में भी जौ की फसल लहलहा रही है। अभी तक इस फसल में किसी प्रकार के रोग व कीट का असर भी नहीं हुआ है। केवीके में जाकर कोई भी किसान कैफेटरिया में लहलहा रही इस फसल की निशुल्क जानकारी ले सकते हैं।
केवल तीन सिंचाई की जरूरत
कृषि विज्ञान केन्द्र की वैज्ञानिक डॉ सुनीता चौधरी ने बताया कि इस किस्म की एक और विशेषता यह है कि मात्र तीन सिंचाई में भी फसल तैयार हो जाती है। इसकी पकाव अवधि 120 से 130 दिन है। इस फसल को कम पानी की जरूरत होती है। इस किस्म में पीली रोली रोग (यलो रस्ट) जैसे प्रमुख रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पाई जाती है। इसका तना मजबूत होता है। फसल हवा/बारिश में भी आसानी से नहीं गिरती। दानों का आकार तथा गुणवत्ता बेहतर रहती है। चारा भी अच्छा होता है।
यहां के लिए भी अनुकूल
यह फसल नागौर, चूरू, दौसा, सवाईमाधोपुर, करौली, टोंक, भरतपुर, जयपुर, अलवर, हनुमानगढ़ क्षेत्र के लिए ज्यादा उपयुक्त मानी जा रही है। इसके अलावा राजस्थान में जहां भी लवणीय भूमि व खारा पानी है, वहां इस फसल को उगाया जा सकता है। उत्तर भारत के अनेक राज्यों में इस जौ की किस्म को अच्छा माना जा रहा है। बीज की जरूरत एक हेक्टेयर में करीब एक क्विंटल की होती है। वहीं उत्पादन चालीस से पचास क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
टॉपिक एक्सपर्ट
दौसा में केवीके के कैफेटरिया में जौ की किस्म आरडी 2907 का प्रयोग सफल रहा है। लवणीय भूमि व खारे पानी में भी इसकी खेती हो जाती है। दौसा सहित जहां पानी खारा है, वहां इस किस्म को उगाया जा सकता है। उपज भी अच्छी है। तेज हवा में फसल आडी नहीं गिरती।
-डॉ. बीएल जाट, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष , केवीके दौसा


