बीपी-शुगर के मरीज बने खेल संघों के अध्यक्ष:SC की टिप्पणी के बाद भास्कर की पड़ताल, एमपी के 45 खेल संघों पर नेता-अफसर काबिज

मध्य प्रदेश के 50 खेल संघों में से 24 संघ के अध्यक्ष पद पर नेता काबिज है, 15 संघ ऐसे हैं जिनकी कमान सरकारी कर्मचारियों के हाथों में हैं। केवल 5 खेल संघ ऐसे हैं जिनके अध्यक्ष खिलाड़ी हैं। दरअसल, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के चुनावों पर सुनवाई के दौरान एक तीखी टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा, जिन्हें बल्ला पकड़ना नहीं आता, वे क्रिकेट संघ में बैठे हैं। खेल संस्थाओं का नेतृत्व ऐसे लोगों के पास होना चाहिए जो खेलों को समझते हों। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद जब भास्कर ने मप्र के 50 खेल संघों की पड़ताल की तो पाया कि यहां सिर्फ क्रिकेट ही नहीं, बल्कि लगभग हर खेल की कमान ऐसे लोगों के हाथों में है, जिनका उस खेल से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा। आलम यह है कि हाई बीपी और शुगर के मरीज उन खेल संघों के अध्यक्ष हैं, जिनमें फिटनेस सर्वोपरि होती है। जिन्होंने कभी शूटिंग वाली बंदूक नहीं उठाई, वे शूटिंग एसोसिएशन में निर्णायक पदों पर बैठे हैं। भास्कर ने पड़ताल में ये भी जाना कि इन संघों में आखिरी बार लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कब हुए थे और जमीनी स्तर पर जिला संघों की क्या स्थिति है? साथ ही एक्सपर्ट से समझा कि आखिर खेल संघ नेताओं के कब्जे में क्यों हैं? पढ़िए रिपोर्ट भास्कर की पड़ताल के बाद ये 5 पॉइंट सामने आए अब सिलसिलेवार जानिए इन खेल संघों के बारे में रमेश मेंदोला 16 साल से अध्यक्ष
MOA मध्य प्रदेश में खेलों की सर्वोच्च इकाई है। इसकी मान्यता के बिना किसी भी खेल संघ के खिलाड़ी आधिकारिक राष्ट्रीय खेलों में हिस्सा नहीं ले सकते। विक्रम और एकलव्य जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों के लिए खिलाड़ियों के नाम तय करने में भी इसकी भूमिका अहम होती है। इस सर्वोच्च संस्था पर पूरी तरह से राजनीति हावी है। पिछले 16 सालों से अध्यक्ष पद पर रमेश मेंदोला काबिज हैं। इससे पहले भी इस संघ में विश्वास सारंग और वी.डी. शर्मा जैसे बड़े नेता उपाध्यक्ष रह चुके हैं। 22 सालों से सिंधिया परिवार काबिज
प्रदेश के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट की कमान भी खिलाड़ियों के हाथ में नहीं है। पिछले 22 सालों से (2004 के बाद) कोई भी क्रिकेटर MPCA का अध्यक्ष नहीं बना है। वर्तमान में सिंधिया परिवार की तीसरी पीढ़ी, महाआर्यमान सिंधिया, इसके अध्यक्ष हैं। इससे पहले उनके पिता ज्योतिरादित्य सिंधिया और दादा माधवराव सिंधिया भी इस पद पर रह चुके हैं। जिला स्तर पर भी स्थिति यही है। हर जिले में प्रभावशाली नेताओं ने क्रिकेट संघों पर अपना वर्चस्व कायम कर रखा है, जबकि योग्य पूर्व खिलाड़ी और प्रशासक मौके का इंतजार ही कर रहे हैं। परिवार में ही अध्यक्ष-सचिव पद
मध्य प्रदेश टेबल टेनिस एसोसिएशन परिवारवाद का सबसे बड़ा उदाहरण है। जब नियम आया कि दो कार्यकाल पूरे कर चुके पदाधिकारी दोबारा पद नहीं ले सकते, तो अध्यक्ष ओम सोनी और सचिव जयेश आचार्य को हटना पड़ा, लेकिन उन्होंने सत्ता अपने ही परिवार में रखी। मप्र टेबल टेनिस एसोसिएशन के नए अध्यक्ष प्रमोद सोनी को चुना गया, जो पूर्व अध्यक्ष ओम सोनी के छोटे भाई है। वहीं पूर्व सचिव जयेश आचार्य की पत्नी रिंकू आचार्य नई सचिव चुनी गईं। हालांकि, जयेश और रिंकू आचार्य टेबल टेनिस के अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी रह चुके हैं। दोनों टेबल टेनिस की ट्रेनिंग भी देते हैं। एक कुर्सी, दो दावेदार और बीच में पिसते खिलाड़ी
मध्य प्रदेश एथलेटिक्स एसोसिएशन की स्थिति तो और भी विचित्र है। यहां एक ही एसोसिएशन के दो गुट हैं, और दोनों ही खुद को आधिकारिक बताते हैं। एक गुट के अध्यक्ष प्रदेश के खेल मंत्री विश्वास सारंग हैं, जिसे मप्र ओलंपिक संघ से मान्यता प्राप्त है। दूसरे गुट के अध्यक्ष कोच अमानत खान हैं, जिसे भारतीय एथलेटिक्स फेडरेशन मान्यता देता है। इस राजनीतिक लड़ाई का नतीजा यह है कि खिलाड़ियों का भविष्य अधर में लटका है। सारंग वाले गुट को ही खेल विभाग स्टेडियम और अन्य सुविधाएं मुहैया कराता है, जबकि दूसरा गुट उपेक्षित रहता है। बाकी खेल संघों पर भी नेताओं का कब्जा यह सूची बहुत लंबी है। चाहे हॉकी हो, बास्केटबॉल हो, जूडो हो या घुड़सवारी, हर जगह अध्यक्ष या सचिव के पद पर कोई नेता, कोई बड़ा व्यापारी या कोई रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी बैठा है, जिसका उस खेल की बारीकियों से कोई लेना-देना नहीं है। खिलाड़ियों को केवल सलाहकार या संयुक्त सचिव जैसे पदों पर रखा गया है, जहां उनकी कोई सुनता नहीं। एक्सपर्ट बोले- जवाबदेही तय होना चाहिए पूर्व ओलंपियन और पूर्व केंद्रीय मंत्री असलम शेर खान का इस मामले में कहना है कि खेलों का भला सिर्फ ईमानदार सोच से हो सकता है। हम दुनिया के किसी भी देश से सिर्फ एक मामले में पीछे हैं, और वह है ईमानदारी। अगर हमारे खेल संघों में बैठे लोग और खिलाड़ी अपने काम के प्रति ईमानदार हो जाएं, तो हमें कोई नहीं पछाड़ सकता। उन्होंने आगे कहा, अभी हालत यह है कि व्यक्तिगत खेलों में लोग अपनी पसंद के लोगों को आगे बढ़ा रहे हैं। अगर खिलाड़ी प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है, तो उसे इंजेक्शन देकर प्रदर्शन करवाया जा रहा है। वे राज्य स्तर पर तो जीत जाते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानकों पर टिक नहीं पाते। यही हाल टीम गेम्स का है। हॉकी या फुटबॉल में सबसे मजबूत टीम उतारने के बजाय, अपनी पसंद के दो-तीन कमजोर खिलाड़ियों को टीम में जगह दे दी जाती है, जिससे पूरी टीम का संतुलन बिगड़ता है और हम हार जाते हैं।उन्होंने 1954 के ओलंपिक का एक शानदार उदाहरण दिया, जब भारतीय हॉकी टीम फाइनल में एक गोल से हारकर रजत पदक जीती थी। उस समय हॉकी एसोसिएशन के अध्यक्ष जे.आर.डी. टाटा ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। आज के समय में इसी तरह की ईमानदारी और जवाबदेही की सख्त जरूरत है।

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