क्षेत्र में इन दिनों ‘काला सोना’ कही जाने वाली अफीम की फसल की लुआई-चिराई का काम जोरों पर है। किसान अपने साल भर की मेहनत को सहेजने में जुटे हैं, लेकिन अचानक बढ़ते तापमान और बदलते मौसम ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
चेचट तहसील के बड़ोदिया कलां, सालेड़ा कलां, सांडियाखेड़ी, गुडाला, कंवरपुरा, धारुपुरा, भोलू, धायपुरा और गणेशपुरा जैसे गांवों में अफीम की खेती प्रमुखता से की जाती है। फरवरी में ही तापमान में हुई अप्रत्याशित वृद्धि ने फसल को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। पौधों के पत्ते पीले पड़ने लगे हैं। यदि तापमान ऐसे ही बढ़ता रहा तो उत्पादन और गुणवत्ता पर असर पड़ेगा।
आस्था के साथ शुरुआत
अफीम की खेती केवल आर्थिक आधार नहीं, बल्कि किसानों की अटूट आस्था से भी जुड़ी है। किसान इष्टदेव की विशेष पूजा-अर्चना करने के बाद ही लुआई के कार्य का श्रीगणेश करते हैं। तड़के 4-5 बजे खेतों में पहुंच जाते हैं और सुबह 8 बजे तक काम पूरा कर लेते हैं, फिर दिनभर चीरा लगाने का कठिन श्रम चलता है।
खेतों में अब दिखने लगी मचान, सीसीटीवी भी
अफीम की कीमती फसल को चोरी और पक्षियों (विशेषकर तोतों) से बचाने के लिए किसानों ने खेतों को ‘किले’ में तब्दील कर दिया है। पक्षियों से बचाव के लिए पूरे खेत के ऊपर जाली बिछाई है। ऊंची टापरियां (मचान) बनाई हैं, जहां किसान परिवार सहित दिन-रात पहरा दे रहे हैं। अब रखवाली के लिए लाठी और टॉर्च ही नहीं, सीसीटीवी कैमरे, सायरन, लाइट वाले उपकरण और प्रशिक्षित कुत्तों की मदद भी ली जा रही है।


