Mahashivratri: मेवाड़ की धरा पर स्थित तिलस्वां महादेव मंदिर इन दिनों दूधिया रोशनी से नहाया हुआ है। महाशिवरात्रि के महापर्व पर यहां आयोजित 7 दिवसीय मेले की तैयारियां जोरों पर है। देश-प्रदेश से लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब महादेव के दर पर शीश नवाने उमड़ रहा है।
मान्यता है कि जहां विज्ञान हार जाता है, वहां तिलस्वां महादेव की महिमा काम करती है। करीब 2075 वर्ष पुराने इस प्राचीन मंदिर का इतिहास रावण के स्थापित शिवलिंग से जुड़ा है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता यहां का पवित्र कुंड है। मान्यता है कि कैंसर, बवासीर और कुष्ठ रोग जैसे असाध्य रोगों से पीड़ित भक्त यहां आकर कुंड में स्नान करते हैं।
आस्था की अनूठी परंपरा: महादेव की ‘चाकरी’
मनोकामना पूर्ति के लिए यहां भक्त पांच दिनों तक ‘कैदी’ के रूप में परिसर में रहते हैं। इस दौरान वे महादेव की सेवा (चाकरी) करते हैं। यह धाम ‘अन्न क्षेत्र’ के रूप में भी विख्यात है। यहां सेवा कर रहे ‘कैदियों’ को भोजन करवाने के लिए दानदाताओं में होड़ रहती है। भक्तों का मानना है कि भोलेनाथ पलक झपकते ही सारा दुख हर लेते हैं।
सुदृढ़ प्रबंधन और व्यवस्था
देवस्थान विभाग में पंजीकृत यह मंदिर 21 सदस्यीय ट्रस्ट से संचालित है। वर्तमान में अध्यक्ष रमेश अहीर, सचिव मांगीलाल धाकड़ और संरक्षक इंजीनियर कन्हैया लाल धाकड़ के कुशल निर्देशन में व्यवस्थाएं संभाली जा रही हैं। ट्रस्ट में पुजारी पाराशर परिवार से 4 स्थाई सदस्य और 17 सदस्य विभिन्न समाजों से हैं, जो सर्वसमाज की सहभागिता का प्रतीक है।
महाशिवरात्रि पर लघु कुंभ जैसा नजारा
सोमवार, पूर्णिमा, अमावस्या और विशेषकर महाशिवरात्रि पर यहां लघु कुंभ जैसा नजारा होता है। सात दिवसीय मेले के दौरान पूरा परिसर ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से गुंजायमान रहता है। मंदिर की भव्य सजावट और दिव्य वातावरण भक्तों को एक अलग ही आध्यात्मिक लोक का अनुभव करा रहा है।


