आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी ने एपस्टीन फाइल विवाद पर जारी सियासी संग्राम के बीच हरदीप सिंह पुरी के संग जापान की एक कहानी शेयर की है। सोशल मीडिया फेसबुक पर अपनी कहानी शेयर करते हुए लिखा है कि इन दिनों हरदीप पुरी काफी चर्चा में हैं। इस चर्चा से उन्हें लेकर एक पुरानी स्मृति ताज़ा हो गई। लेकिन वह स्मृति हरदीप जी की कोई सकारात्मक छवि नहीं उजागर करती है।
चुनाव नहीं लड़ रहे तो जापान घुम आओ
शिवानंद तिवारी लिखते है कि वर्ष 1977 की बात है। आपातकाल के बाद जब बिहार विधानसभा का चुनाव हो रहा था। जनता पार्टी ने इस चुनाव में मुझे शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया था। लेकिन, मैंने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था। चंद्रशेखर जी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उन्होंने दिल्ली से मुझे फोन किया। पूछा—“अगर चुनाव नहीं लड़ रहे हो तो क्या जापान घूम आना चाहोगे?” मैंने कहा कि ‘यह भी पूछने की बात है! तत्काल मैंने हामी भर दी। उन दिनों “यूथ लीडर्स फ्रॉम इंडिया” नाम से एक कार्यक्रम जापान सरकार चलाती थी। पंद्रह दिनों का कार्यक्रम था। इसका पूरा खर्च जापान सरकार ही वहन कर रही थी। “यूथ लीडर्स फ्रॉम इंडिया” तीन लोग का प्रतिनिधिमंडल उसमें भाग लेने गए थे। मेरे अलावा दिल्ली आईआईटी के अंग्रेज़ी के एक प्रोफेसर और अहमदाबाद का नव निर्माण आंदोलन का एक युवा डॉक्टर इसमें शामिल होने गए थे।
अरूण जेटली के प्रशंसक हरदीप पुरी
शिवानंद तिवारी जापान की चर्चा करते हुए लिखते हैं कि जापान अद्भुत देश है। घर से लेकर बाहर तक वैसा अनुशासित समाज दुनिया में शायद ही दूसरा हो। उस दरम्यान भारतीय राजदूत ने रात के खाने पर हम लोगों को दूतावास में आमंत्रित किया। वहीं हरदीप पुरी जी से मुलाक़ात हुई थी। वे दूतावास में ही किसी पद पर तैनात थे। विदेश में संभवतः उनकी वह पहली पोस्टिंग थी। दूतावास में हमारा बहुत आत्मीय स्वागत हुआ। काफी देर तक गपशप चला। बातचीत में ही पता चला कि हरदीप जी दिल्ली यूनिवर्सिटी के ही विद्यार्थी थे और अरूण जेटली के प्रशंसक थे।
जापान में हुई थी पहली मुलाकात
दूतावास पहुँचने के बाद वहाँ की गाड़ी हम लोगों को छोड़ दी थी। भोजन के बाद गिंजा इलाके में स्थित हमारे होटल गिंजा दाइची छोड़ने का ज़िम्मा हरदीप जी को ही मिला था। उनकी अपनी कार थी, जिसे वे स्वयं चला रहे थे। जापान के अनुशासन और नागरिक मर्यादा ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। ट्रैफिक हो या सार्वजनिक जीवन—नियमों का पालन वहाँ जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। उसी अनुशासित माहौल में एक छोटी-सी घटना हुई।
जब ‘नो एंट्री’ वाले रास्ते में गाड़ी मोड़ दिया
हरदीप पुरी जी ने अनजाने में एक ‘नो एंट्री’ वाले रास्ते में गाड़ी मोड़ दिया। उन्हें तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ। मैंने मुड़कर देखा तो मोड़ पर मुझे पुलिस जैसा आदमी दिखा। मैंने हरदीप जी को कहा कि मोड़ पर पुलिस वाला था। शायद उसने आपकी गाड़ी का नंबर देख लिया हो। लेकिन, उन्होंने हंस कर कहा कि वह नम्बर नोट नहीं कर पाया होगा। क्योंकि पहले तो उसे लगा होगा कि वह सपना देख रहा है कि ‘नो इंट्री’ वाली सड़क में कोई गाड़ी घुस गई है। जब तक उसको यकीन होगा कि सचमुच ऐसा हुआ है तब तक हम लोग उसकी नजर से इतना आगे निकल चुके होंगे जहां से पुलिस वाले को गाड़ी का नंबर ही पता नहीं चलेगा।
एपस्टीन फाइल से याद आई पुरानी कहानी
उस समय वे विदेश सेवा में नए-नए थे। मैंने मन ही मन सोचा—यदि सचमुच पुलिस ने गाड़ी का नंबर नोट कर लिया होगा और कोई औपचारिक कार्रवाई हो जाती है, तो करियर की शुरुआत में ही उनके चरित्र अभिलेख पर एक अनचाहा धब्बा लग जाएगा। जापान जैसे अनुशासनप्रिय देश में नियम उल्लंघन की कल्पना भी गंभीर मानी जाती है।आज जब हरदीप जी का नाम एपस्टीन फाइल विवाद में आ रहा है तो मुझे जापान वाली घटना याद आ गई।


