“हम लोग 100 साल से यहां रह रहे हैं। हमने कोई अतिक्रमण नहीं किया। पहले कभी प्रशासन ने नहीं हटाया, लेकिन तीन दिन पहले नगर निगम और पुलिस आई और कहा कि यहां से खाली करो। सामान समेट ही रहे थे कि अचानक JCB चलने लगी। हमारे बच्चों को भी मारने लगे। हमलोग बचाने पहुंचे तो हमारे ऊपर लाठी चलाने लगे। भला कोई अपने बच्चों को पिटता कैसे देख सकता है? पुलिस वालों ने हमें इतना पीटा कि शरीर पर पिटाई के निशान बन गए हैं। चोट के दाग पीठ पर काले पड़ गए हैं। ऐसी जगह मारा गया कि शर्म के कारण दिखा भी नहीं सकते। वो लोग अस्पताल को जमीन देने के लिए जबरन जमीन खाली करवा रहे हैं। मजबूरन हमें प्रशासन का विरोध करना पड़ा।” ये दर्द है पटना के कंकड़बाग इलाके में रहने वाले उन परिवारों का, जिनपर अतिक्रमण करने का आरोप है और उन्हें हटाने की कार्रवाई की जा रही है। इसी कार्रवाई के विरोध में यहां महिला पुलिसकर्मियों को पीटा गया था। दैनिक भास्कर की टीम पीड़ितों का हाल जानने मौके पर पहुंचीं। लोगों में नाराजगी, गुस्सा और बेघर होने का डर साफ नजर आया। कई परिवारों ने कहा कि अगर उन्हें हटाया गया तो उनके पास सिर छुपाने की जगह नहीं बचेगी। पूरी रिपोर्ट पढ़िए… सबसे पहले पूरा मामला जानिए दरअसल, कंकड़बाग में जिस स्थान पर मेदांता हॉस्पिटल के लिए पार्किंग बनाई जानी है, वहां फिलहाल करीब 300 घर बसे हुए हैं। इन्हें हटाने के लिए प्रशासन की ओर से कार्रवाई की जा रही है। तीन दिन पहले प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच पत्थरबाजी हुई थी, जिसके बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया। अभी भी वहां पर पुलिस तैनात है। परिवार डर में रह रहे हैं। पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें कहीं किराए पर घर नहीं मिल रहा। 10-15 हजार रुपए किराया मांगा जाता है। अगर इतना किराया देंगे तो कमाएंगे-खाएंगे क्या और बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे? उन्होंने मांग की है कि सरकार पहले उनके रहने की वैकल्पिक व्यवस्था करे। प्लास्टिक, टीन और बांस के सहारे टिकी झोपड़ियां भास्कर टीम जब मौके पर पहुंची तो देखा कि परिवार टूटी-फूटी झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। घर के सामान रखने तक की जगह नहीं बची थी। बर्तन, कपड़े और जरूरी सामान इधर-उधर बिखरे पड़े थे। प्लास्टिक, टीन और बांस के सहारे किसी तरह झोपड़ियां खड़ी थीं। पीड़ित परिवारों से हाल जानने के लिए सवाल किया गया तो वे भावुक हो गए। कई लोगों की आंखें भर आईं। कुछ देर तक माहौल गमगीन रहा, फिर खुद को संभालते हुए उन्होंने अपनी परेशानियां बताईं। इसी दौरान स्कूल से लौटा एक बच्चा भी मिला। बातचीत में उसने कहा, ‘हम बड़े होकर फौजी बनना चाहते हैं। हमें रहने के लिए कहीं अच्छी जगह दी जाए।’ उसकी मासूम ख्वाहिशों और परिवार की बेबसी ने वहां की स्थिति को और भी मार्मिक बना दिया। तस्वीरों में देखें किस हालात में रह रहा परिवार अब पढ़िए पीड़ितों की परेशानी, उनकी मांगें और उम्मीदें… चोट लगेगी तो आवाज नहीं उठाएंगे… स्थानीय निवासी रश्मि देवी ने बताया, ‘नगर निगम के लोग आए और कहने लगे कि थोड़ी-बहुत कार्रवाई करेंगे, फोटो लेंगे और चले जाएंगे, लेकिन वे हमारे सामान को ही तोड़ने-बर्बाद करने लगे। हमने पूछा- जब सिर्फ फोटो लेने की बात कही थी, तो सामान क्यों तोड़ा जा रहा है? इसी दौरान मेरी बुजुर्ग मां गिर गईं। तब प्रशासन के लोगों ने कहा- मर जाएगी तो अस्पताल पहुंचा देंगे। अगर हमें चोट लगेगी तो क्या हम आवाज नहीं उठाएंगे? हमारी झोपड़ी के लगभग सभी लोग घायल हैं। मेरे मां-बाप और दादा-दादी भी यहीं रहते हैं। हम 100 साल से ज्यादा समय से यहां बसे हुए हैं। अचानक हमें उजाड़ा जा रहा है।’ नोटिस नहीं मिला, बस हटने का ऐलान हुआ रश्मि देवी ने कहा, ‘हमें किसी तरह का कोई लिखित नोटिस नहीं दिया गया। बस माइक से ऐलान किया गया कि नाले के इस तरफ की झुग्गी-झोपड़ी हटा लो। हमने नाले से करीब 12 फीट दूर अपनी झोपड़ी बनाई है। हम लोग तो नाले के किनारे रह रहे हैं। गरीब हैं, आखिर कहां जाएंगे?’ उन्होंने बताया, ‘परिवार में 5 छोटे बच्चे हैं। हम घर-घर जाकर चूल्हा-चौका और बर्तन मांजकर पैसा कमाते हैं, तभी बच्चों को खाना खिला पाते हैं। मेरे पति ठेला और रिक्शा चलाते हैं। बड़ी मजबूरी से घर चलता है।’ अपने बच्चों को लेकर कहां जाएं, बेघर होने का डर स्थानीय निवासी अनिल महतो ने कहा, ‘नगर निगम की टीम आई और हमारे घर पर बुलडोजर चला दिया। विरोध करने पर हमलोगों की पिटाई की गई। मेरी पत्नी और बेटियां दूसरों के घरों में चूल्हा-चौका और झाड़ू-पोछा करके घर चलाती हैं। इसी जगह मेरे पिताजी ने अंतिम सांस ली थी।’ उन्होंने आरोप लगाया कि रोजी-रोटी के साधन भी छीने जा रहे हैं। अनिल महतों ने कहा, ‘अगर हम यहां छोटी-सी दुकान लगाते हैं, तो उसे भी उखाड़कर ले जाते हैं। फिर 5 या 10 हजार रुपए भरने पड़ते हैं। मेरे छह छोटे-छोटे बच्चे हैं। हम इन्हें लेकर कहां जाएं? प्रशासन ने हमें कमाने लायक भी नहीं छोड़ा है। कम से कम एक ऐसी जगह दे दी जाए, जहां हम रह भी सकें और काम भी कर सकें।’ सरकार हमारी रहने की व्यवस्था करे वहीं, इंदू देवी ने आरोप लगाया, ‘बिना किसी लिखित नोटिस के प्रशासन यहां पहुंच गया। महिला पुलिस कह रही थी कि हमें लाठी से मारा गया है, जबकि वही हमारी पिटाई कर रही थीं। मेरी बच्ची को भी काफी चोट आई है। कार्रवाई के दौरान महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। हमारा सिर्फ इतना कहना है कि सरकार पहले हमारे रहने की व्यवस्था करे, फिर हटाए। बिना ठिकाने के हम कहां जाएंगे?’ हम सामान हटा रहे थे, फिर भी बुलडोजर चला दिया पिंकू देवी ने बताया, ‘प्रशासन और नगर निगम की टीम आई और हमें यहां से सारा सामान हटाने को कहा। उस समय हम घर पर नहीं थे, काम पर गए हुए थे। मेरा बच्चा दौड़ता हुआ मेरे पास आया और बताया कि अधिकारी घर गिराने आए हैं। हम तुरंत पहुंचे और सामान ठेला पर रखकर हटाने लगे। तभी नगर निगम के लोग कहने लगे कि ये लोग हट नहीं रहे हैं, बुलडोजर से तोड़ दो। हमने विनती की कि हम अकेले हैं, सामान समेटने में थोड़ा समय लगेगा, लेकिन उन्होंने कहा कि ऊपर से आदेश है, जल्दी हटाओ।’ पिंकू देवी के मुताबिक, हम लोग खुद ही घर खाली कर रहे थे, फिर भी बुलडोजर चलाकर ढांचा गिरा दिया गया। पीड़ितों में कुछ महिलाएं और पुरुष ऐसे भी मिले, जिन्होंने अपनी तकलीफें तो खुलकर बताईं, लेकिन जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने बताने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि नाम सार्वजनिक होने से उन्हें आगे और परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। 7 दिन की चेतावनी मिली है, लेकिन जाएं कहां एक महिला ने बताया, ‘प्रशासन ने कहा कि अगले सोमवार को फिर आएंगे। हमें 7 दिन की चेतावनी दी गई है, लेकिन हम जाएं कहां? झोपड़ी में रहने वालों को कोई कमरा भी नहीं देता। एक कमरे का 10 से 15 हजार रुपए किराया मांगा जाता है। हम लोग घर-घर काम करते हैं, महीने में करीब 1500 रुपए मिलते हैं। उसी पैसे में खाना खाएं, बच्चों को पढ़ाएं या फिर किराया दें?’ महिला ने नाराजगी जताते हुए कहा, ‘चुनाव के समय ‘दीदी-चाचा’ कहकर वोट ले लेते हैं, लेकिन जब घर तोड़ने की बारी आती है तो कोई नहीं आता। हमारे तीन बच्चे हैं, उन्हें भी पढ़ा रहे हैं। हमने किसी का क्या बिगाड़ा है? एक कोने में रहकर मेहनत करते हैं, कमाते हैं और खाते हैं।’ मजबूरी है, तभी सड़क पर रहते हैं एक व्यक्ति ने रोते हुए कहा, ‘हमारे पास कोई घर नहीं है। हम लोग सड़क पर सोते हैं। अब यहां से भी हटाया जा रहा है। कभी-कभी भूखे पेट सोना पड़ता है। कार्रवाई के दौरान मेरा सिर फोड़ दिया गया, हाथ में भी चोट लगी है। हम फुटपाथ पर रहते हैं, चारों तरफ गंदगी और बदबू है, लेकिन क्या करें- मजबूरी है, तभी तो यहां हैं। मेरे पांच बच्चे हैं, वे भी कई बार भूखे सो जाते हैं।’ इतना मारा कि दर्द अब तक नहीं गया एक महिला ने आरोप लगाया, ‘प्रशासन ने हमें इतना मारा कि अभी तक दर्द नहीं गया है। हम यहां से कहां जाएं? जब कहीं जगह मिलेगी, तभी तो जाएंगे। गरीबों के घरों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है। हमारी पांच बेटियां हैं। हम उन्हें खिलाएं, पढ़ाएं और उनकी शादी करें या फिर किराया दें? 10-15 हजार रुपए किराया कहां से लाएं?’ पार्किंग को लेकर आरोप एक अन्य व्यक्ति ने आरोप लगाया, ‘मेदांता अस्पताल के लिए यहां पार्किंग बनाई जानी है। कहा जा रहा है कि इसके लिए प्रशासन को मोटी रकम दी जा रही है। थाने से लोग आए और बोले- यहां से हटो। वैसे भी हम सड़क पर ही हैं, अब जहां फेंकना है फेंक दीजिए। गरीब आदमी को रहने के लिए जगह तक नहीं दी जा रही।’ अब देखिए अतिक्रमण हटाने के दौरान विरोध की तस्वीरें… नगर दंडाधिकारी ने कहा- नियमानुसार कार्रवाई की जायेगी नगर दंडाधिकारी आदित्य श्रीवास्तव ने बताया कि ‘नगर निगम की टीम अतिक्रमण हटाने आई थी। पुलिस बल भी था। इसी दौरान अतिक्रमणकारियों ने हमला कर दिया। जिसमें एक सब इंस्पेक्टर, और कुछ अन्य पदाधिकारियों को चोट लगी है। जेसीबी को क्षतिग्रस्त कर दिया गया है। नियमानुसार कार्रवाई की जायेगी।’ “हम लोग 100 साल से यहां रह रहे हैं। हमने कोई अतिक्रमण नहीं किया। पहले कभी प्रशासन ने नहीं हटाया, लेकिन तीन दिन पहले नगर निगम और पुलिस आई और कहा कि यहां से खाली करो। सामान समेट ही रहे थे कि अचानक JCB चलने लगी। हमारे बच्चों को भी मारने लगे। हमलोग बचाने पहुंचे तो हमारे ऊपर लाठी चलाने लगे। भला कोई अपने बच्चों को पिटता कैसे देख सकता है? पुलिस वालों ने हमें इतना पीटा कि शरीर पर पिटाई के निशान बन गए हैं। चोट के दाग पीठ पर काले पड़ गए हैं। ऐसी जगह मारा गया कि शर्म के कारण दिखा भी नहीं सकते। वो लोग अस्पताल को जमीन देने के लिए जबरन जमीन खाली करवा रहे हैं। मजबूरन हमें प्रशासन का विरोध करना पड़ा।” ये दर्द है पटना के कंकड़बाग इलाके में रहने वाले उन परिवारों का, जिनपर अतिक्रमण करने का आरोप है और उन्हें हटाने की कार्रवाई की जा रही है। इसी कार्रवाई के विरोध में यहां महिला पुलिसकर्मियों को पीटा गया था। दैनिक भास्कर की टीम पीड़ितों का हाल जानने मौके पर पहुंचीं। लोगों में नाराजगी, गुस्सा और बेघर होने का डर साफ नजर आया। कई परिवारों ने कहा कि अगर उन्हें हटाया गया तो उनके पास सिर छुपाने की जगह नहीं बचेगी। पूरी रिपोर्ट पढ़िए… सबसे पहले पूरा मामला जानिए दरअसल, कंकड़बाग में जिस स्थान पर मेदांता हॉस्पिटल के लिए पार्किंग बनाई जानी है, वहां फिलहाल करीब 300 घर बसे हुए हैं। इन्हें हटाने के लिए प्रशासन की ओर से कार्रवाई की जा रही है। तीन दिन पहले प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच पत्थरबाजी हुई थी, जिसके बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया। अभी भी वहां पर पुलिस तैनात है। परिवार डर में रह रहे हैं। पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें कहीं किराए पर घर नहीं मिल रहा। 10-15 हजार रुपए किराया मांगा जाता है। अगर इतना किराया देंगे तो कमाएंगे-खाएंगे क्या और बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे? उन्होंने मांग की है कि सरकार पहले उनके रहने की वैकल्पिक व्यवस्था करे। प्लास्टिक, टीन और बांस के सहारे टिकी झोपड़ियां भास्कर टीम जब मौके पर पहुंची तो देखा कि परिवार टूटी-फूटी झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। घर के सामान रखने तक की जगह नहीं बची थी। बर्तन, कपड़े और जरूरी सामान इधर-उधर बिखरे पड़े थे। प्लास्टिक, टीन और बांस के सहारे किसी तरह झोपड़ियां खड़ी थीं। पीड़ित परिवारों से हाल जानने के लिए सवाल किया गया तो वे भावुक हो गए। कई लोगों की आंखें भर आईं। कुछ देर तक माहौल गमगीन रहा, फिर खुद को संभालते हुए उन्होंने अपनी परेशानियां बताईं। इसी दौरान स्कूल से लौटा एक बच्चा भी मिला। बातचीत में उसने कहा, ‘हम बड़े होकर फौजी बनना चाहते हैं। हमें रहने के लिए कहीं अच्छी जगह दी जाए।’ उसकी मासूम ख्वाहिशों और परिवार की बेबसी ने वहां की स्थिति को और भी मार्मिक बना दिया। तस्वीरों में देखें किस हालात में रह रहा परिवार अब पढ़िए पीड़ितों की परेशानी, उनकी मांगें और उम्मीदें… चोट लगेगी तो आवाज नहीं उठाएंगे… स्थानीय निवासी रश्मि देवी ने बताया, ‘नगर निगम के लोग आए और कहने लगे कि थोड़ी-बहुत कार्रवाई करेंगे, फोटो लेंगे और चले जाएंगे, लेकिन वे हमारे सामान को ही तोड़ने-बर्बाद करने लगे। हमने पूछा- जब सिर्फ फोटो लेने की बात कही थी, तो सामान क्यों तोड़ा जा रहा है? इसी दौरान मेरी बुजुर्ग मां गिर गईं। तब प्रशासन के लोगों ने कहा- मर जाएगी तो अस्पताल पहुंचा देंगे। अगर हमें चोट लगेगी तो क्या हम आवाज नहीं उठाएंगे? हमारी झोपड़ी के लगभग सभी लोग घायल हैं। मेरे मां-बाप और दादा-दादी भी यहीं रहते हैं। हम 100 साल से ज्यादा समय से यहां बसे हुए हैं। अचानक हमें उजाड़ा जा रहा है।’ नोटिस नहीं मिला, बस हटने का ऐलान हुआ रश्मि देवी ने कहा, ‘हमें किसी तरह का कोई लिखित नोटिस नहीं दिया गया। बस माइक से ऐलान किया गया कि नाले के इस तरफ की झुग्गी-झोपड़ी हटा लो। हमने नाले से करीब 12 फीट दूर अपनी झोपड़ी बनाई है। हम लोग तो नाले के किनारे रह रहे हैं। गरीब हैं, आखिर कहां जाएंगे?’ उन्होंने बताया, ‘परिवार में 5 छोटे बच्चे हैं। हम घर-घर जाकर चूल्हा-चौका और बर्तन मांजकर पैसा कमाते हैं, तभी बच्चों को खाना खिला पाते हैं। मेरे पति ठेला और रिक्शा चलाते हैं। बड़ी मजबूरी से घर चलता है।’ अपने बच्चों को लेकर कहां जाएं, बेघर होने का डर स्थानीय निवासी अनिल महतो ने कहा, ‘नगर निगम की टीम आई और हमारे घर पर बुलडोजर चला दिया। विरोध करने पर हमलोगों की पिटाई की गई। मेरी पत्नी और बेटियां दूसरों के घरों में चूल्हा-चौका और झाड़ू-पोछा करके घर चलाती हैं। इसी जगह मेरे पिताजी ने अंतिम सांस ली थी।’ उन्होंने आरोप लगाया कि रोजी-रोटी के साधन भी छीने जा रहे हैं। अनिल महतों ने कहा, ‘अगर हम यहां छोटी-सी दुकान लगाते हैं, तो उसे भी उखाड़कर ले जाते हैं। फिर 5 या 10 हजार रुपए भरने पड़ते हैं। मेरे छह छोटे-छोटे बच्चे हैं। हम इन्हें लेकर कहां जाएं? प्रशासन ने हमें कमाने लायक भी नहीं छोड़ा है। कम से कम एक ऐसी जगह दे दी जाए, जहां हम रह भी सकें और काम भी कर सकें।’ सरकार हमारी रहने की व्यवस्था करे वहीं, इंदू देवी ने आरोप लगाया, ‘बिना किसी लिखित नोटिस के प्रशासन यहां पहुंच गया। महिला पुलिस कह रही थी कि हमें लाठी से मारा गया है, जबकि वही हमारी पिटाई कर रही थीं। मेरी बच्ची को भी काफी चोट आई है। कार्रवाई के दौरान महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। हमारा सिर्फ इतना कहना है कि सरकार पहले हमारे रहने की व्यवस्था करे, फिर हटाए। बिना ठिकाने के हम कहां जाएंगे?’ हम सामान हटा रहे थे, फिर भी बुलडोजर चला दिया पिंकू देवी ने बताया, ‘प्रशासन और नगर निगम की टीम आई और हमें यहां से सारा सामान हटाने को कहा। उस समय हम घर पर नहीं थे, काम पर गए हुए थे। मेरा बच्चा दौड़ता हुआ मेरे पास आया और बताया कि अधिकारी घर गिराने आए हैं। हम तुरंत पहुंचे और सामान ठेला पर रखकर हटाने लगे। तभी नगर निगम के लोग कहने लगे कि ये लोग हट नहीं रहे हैं, बुलडोजर से तोड़ दो। हमने विनती की कि हम अकेले हैं, सामान समेटने में थोड़ा समय लगेगा, लेकिन उन्होंने कहा कि ऊपर से आदेश है, जल्दी हटाओ।’ पिंकू देवी के मुताबिक, हम लोग खुद ही घर खाली कर रहे थे, फिर भी बुलडोजर चलाकर ढांचा गिरा दिया गया। पीड़ितों में कुछ महिलाएं और पुरुष ऐसे भी मिले, जिन्होंने अपनी तकलीफें तो खुलकर बताईं, लेकिन जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने बताने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि नाम सार्वजनिक होने से उन्हें आगे और परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। 7 दिन की चेतावनी मिली है, लेकिन जाएं कहां एक महिला ने बताया, ‘प्रशासन ने कहा कि अगले सोमवार को फिर आएंगे। हमें 7 दिन की चेतावनी दी गई है, लेकिन हम जाएं कहां? झोपड़ी में रहने वालों को कोई कमरा भी नहीं देता। एक कमरे का 10 से 15 हजार रुपए किराया मांगा जाता है। हम लोग घर-घर काम करते हैं, महीने में करीब 1500 रुपए मिलते हैं। उसी पैसे में खाना खाएं, बच्चों को पढ़ाएं या फिर किराया दें?’ महिला ने नाराजगी जताते हुए कहा, ‘चुनाव के समय ‘दीदी-चाचा’ कहकर वोट ले लेते हैं, लेकिन जब घर तोड़ने की बारी आती है तो कोई नहीं आता। हमारे तीन बच्चे हैं, उन्हें भी पढ़ा रहे हैं। हमने किसी का क्या बिगाड़ा है? एक कोने में रहकर मेहनत करते हैं, कमाते हैं और खाते हैं।’ मजबूरी है, तभी सड़क पर रहते हैं एक व्यक्ति ने रोते हुए कहा, ‘हमारे पास कोई घर नहीं है। हम लोग सड़क पर सोते हैं। अब यहां से भी हटाया जा रहा है। कभी-कभी भूखे पेट सोना पड़ता है। कार्रवाई के दौरान मेरा सिर फोड़ दिया गया, हाथ में भी चोट लगी है। हम फुटपाथ पर रहते हैं, चारों तरफ गंदगी और बदबू है, लेकिन क्या करें- मजबूरी है, तभी तो यहां हैं। मेरे पांच बच्चे हैं, वे भी कई बार भूखे सो जाते हैं।’ इतना मारा कि दर्द अब तक नहीं गया एक महिला ने आरोप लगाया, ‘प्रशासन ने हमें इतना मारा कि अभी तक दर्द नहीं गया है। हम यहां से कहां जाएं? जब कहीं जगह मिलेगी, तभी तो जाएंगे। गरीबों के घरों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है। हमारी पांच बेटियां हैं। हम उन्हें खिलाएं, पढ़ाएं और उनकी शादी करें या फिर किराया दें? 10-15 हजार रुपए किराया कहां से लाएं?’ पार्किंग को लेकर आरोप एक अन्य व्यक्ति ने आरोप लगाया, ‘मेदांता अस्पताल के लिए यहां पार्किंग बनाई जानी है। कहा जा रहा है कि इसके लिए प्रशासन को मोटी रकम दी जा रही है। थाने से लोग आए और बोले- यहां से हटो। वैसे भी हम सड़क पर ही हैं, अब जहां फेंकना है फेंक दीजिए। गरीब आदमी को रहने के लिए जगह तक नहीं दी जा रही।’ अब देखिए अतिक्रमण हटाने के दौरान विरोध की तस्वीरें… नगर दंडाधिकारी ने कहा- नियमानुसार कार्रवाई की जायेगी नगर दंडाधिकारी आदित्य श्रीवास्तव ने बताया कि ‘नगर निगम की टीम अतिक्रमण हटाने आई थी। पुलिस बल भी था। इसी दौरान अतिक्रमणकारियों ने हमला कर दिया। जिसमें एक सब इंस्पेक्टर, और कुछ अन्य पदाधिकारियों को चोट लगी है। जेसीबी को क्षतिग्रस्त कर दिया गया है। नियमानुसार कार्रवाई की जायेगी।’


