बेलगावी जिले में हाल ही में सामने आए संपत्ति पंजीकरण से जुड़े फर्जीवाड़े के मामलों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर आम नागरिक की जीवनभर की कमाई से खरीदी गई संपत्ति कितनी सुरक्षित है। असली जमीन मालिकों की जानकारी के बिना फर्जी पहचान पत्रों और जाली दस्तावेजों के आधार पर जमीन की रजिस्ट्री कराए जाने की घटनाएं अब चिंता का विषय बन चुकी हैं। खानापुर में मृत व्यक्ति के नाम पर जमीन का सौदा हो जाना और हुक्केरी क्षेत्र में भूमि हड़पने के मामले में अधिकारियों की गिरफ्तारी इस पूरे तंत्र में मौजूद खामियों को उजागर करती है।
स्पष्ट है कि यह अब अकेले व्यक्तियों द्वारा किया जाने वाला अपराध नहीं रहा, बल्कि संगठित तरीके से चल रहे नेटवर्क प्रशासनिक प्रक्रियाओं की कमजोरियों का फायदा उठा रहे हैं। शहरों में तेजी से बढ़ती जमीन की कीमतों ने इस तरह के अपराध को और आकर्षक बना दिया है। बाहर रहने वाले या लंबे समय से संपत्ति की देखरेख न कर पाने वाले मालिकों की जमीनें जालसाजों के लिए आसान निशाना बनती जा रही हैं। इस समस्या का एक पहलू नागरिकों की असावधानी भी है। कई लोग संपत्ति खरीदते समय दस्तावेजों की गहन जांच किए बिना केवल एजेंटों या जान-पहचान पर भरोसा कर लेते हैं। जबकि उप-पंजीयक कार्यालय केवल दस्तावेजों का पंजीकरण करता है, स्वामित्व की पुष्टि नहीं। यही अंतर अपराधियों को अवसर देता है।
समाधान केवल छापेमारी या गिरफ्तारियों में नहीं, बल्कि प्रणालीगत सुधारों में छिपा है। भूमि रिकॉर्ड का नियमित डिजिटल अद्यतन, आधार और बायोमेट्रिक सत्यापन, बिक्री से पहले स्वामित्व की सार्वजनिक सूचना तथा बहुस्तरीय दस्तावेज जांच जैसी प्रक्रियाओं को सख्ती से लागू करना आवश्यक है। साथ ही नागरिकों को भी अपनी संपत्ति का रिकॉर्ड अद्यतन रखना और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत शिकायत दर्ज करानी चाहिए। संपत्ति केवल निवेश नहीं, बल्कि परिवार की सुरक्षा और भविष्य का आधार होती है। यदि इस पर भरोसा डगमगाने लगे तो सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा दोनों बढ़ती हैं। इसलिए प्रशासन और नागरिकों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि जमीन के सौदे पारदर्शी और सुरक्षित हों, वरना भरोसे की यह दरार आगे और गहरी होती जाएगी।
जमीन सौदों में फर्जीवाड़े की बढ़ती साजिश


