केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर आयोजित देशव्यापी आम हड़ताल के समर्थन में आज पटना में व्यापक प्रदर्शन देखने को मिला। भाकपा (माले) के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य के साथ सैकड़ों की संख्या में मजदूर, किसान और विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। यह जुलूस बुद्ध स्मृति पार्क से निकल कर डाकबंगला चौराहे तक आया, जहां सरकार की नीतियों के खिलाफ जमकर आवाज बुलंद की गई। डाकबंगला चौराहे पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि मजदूरों की यह हड़ताल सिर्फ वेतन और काम के अधिकार की लड़ाई नहीं है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक संरचना को बचाने की भी लड़ाई है। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक हड़ताल को खेत मजदूरों, किसानों, छात्रों और नौजवानों का व्यापक समर्थन मिला है, जो केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश का स्पष्ट संकेत है। 4 श्रम कोड को बताया मजदूर-विरोधी भाकपा माले ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए 4 श्रम कोड को मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन श्रम कोड के जरिए मजदूरों को संगठित होने, यूनियन बनाने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की ताकत को कमजोर किया जा रहा है। जैसे किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन ने सरकार को 3 कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर किया, वैसे ही मजदूरों का संगठित संघर्ष 4 श्रम कोड को भी वापस लेने पर मजबूर करेगा। उन्होंने दावा किया कि ये श्रम कोड पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने और श्रम कानूनों को लचीला बनाकर कॉरपोरेट हितों को कानूनी संरक्षण देने की साजिश हैं। मनरेगा में 200 दिन रोजगार और 600 रुपये दैनिक मजदूरी की मांग मनरेगा के मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह कानून ग्रामीण गरीबों और खेत मजदूरों के लिए रोजगार की गारंटी के रूप में बना था, लेकिन वर्तमान सरकार इसे कमजोर करने की दिशा में काम कर रही है। मजदूर संगठनों की ओर से मांग रखी गई कि मनरेगा के तहत कम से कम 200 दिन का रोजगार और 600 रुपये प्रतिदिन मजदूरी सुनिश्चित की जाए। सरकार की नीतियों के कारण ग्रामीण बेरोजगारी और आर्थिक संकट बढ़ रहा है। कृषि और शिक्षा नीति पर भी साधा निशाना भाकपा माले ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने देश की खेती-किसानी को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी हितों के सामने गिरवी रख दिया है। कृषि क्षेत्र को बाहरी दबावों के लिए खोलना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है और इससे देश की 60 प्रतिशत आबादी प्रभावित होगी। शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, संघीय ढांचे को कमजोर किया जा रहा है और शिक्षा के क्षेत्र में एक विशेष विचारधारा थोपने की कोशिश की जा रही है। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर आयोजित देशव्यापी आम हड़ताल के समर्थन में आज पटना में व्यापक प्रदर्शन देखने को मिला। भाकपा (माले) के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य के साथ सैकड़ों की संख्या में मजदूर, किसान और विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। यह जुलूस बुद्ध स्मृति पार्क से निकल कर डाकबंगला चौराहे तक आया, जहां सरकार की नीतियों के खिलाफ जमकर आवाज बुलंद की गई। डाकबंगला चौराहे पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि मजदूरों की यह हड़ताल सिर्फ वेतन और काम के अधिकार की लड़ाई नहीं है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक संरचना को बचाने की भी लड़ाई है। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक हड़ताल को खेत मजदूरों, किसानों, छात्रों और नौजवानों का व्यापक समर्थन मिला है, जो केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश का स्पष्ट संकेत है। 4 श्रम कोड को बताया मजदूर-विरोधी भाकपा माले ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए 4 श्रम कोड को मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन श्रम कोड के जरिए मजदूरों को संगठित होने, यूनियन बनाने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की ताकत को कमजोर किया जा रहा है। जैसे किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन ने सरकार को 3 कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर किया, वैसे ही मजदूरों का संगठित संघर्ष 4 श्रम कोड को भी वापस लेने पर मजबूर करेगा। उन्होंने दावा किया कि ये श्रम कोड पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने और श्रम कानूनों को लचीला बनाकर कॉरपोरेट हितों को कानूनी संरक्षण देने की साजिश हैं। मनरेगा में 200 दिन रोजगार और 600 रुपये दैनिक मजदूरी की मांग मनरेगा के मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह कानून ग्रामीण गरीबों और खेत मजदूरों के लिए रोजगार की गारंटी के रूप में बना था, लेकिन वर्तमान सरकार इसे कमजोर करने की दिशा में काम कर रही है। मजदूर संगठनों की ओर से मांग रखी गई कि मनरेगा के तहत कम से कम 200 दिन का रोजगार और 600 रुपये प्रतिदिन मजदूरी सुनिश्चित की जाए। सरकार की नीतियों के कारण ग्रामीण बेरोजगारी और आर्थिक संकट बढ़ रहा है। कृषि और शिक्षा नीति पर भी साधा निशाना भाकपा माले ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने देश की खेती-किसानी को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी हितों के सामने गिरवी रख दिया है। कृषि क्षेत्र को बाहरी दबावों के लिए खोलना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है और इससे देश की 60 प्रतिशत आबादी प्रभावित होगी। शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, संघीय ढांचे को कमजोर किया जा रहा है और शिक्षा के क्षेत्र में एक विशेष विचारधारा थोपने की कोशिश की जा रही है।


