राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने लिया प्रसंज्ञान, मांगी एटीआर

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने लिया प्रसंज्ञान, मांगी एटीआर

– शहर के पास चंबल किनारे बसा गांव राजघाट

– युवाओं ने शुरू किया था सेव द राजघाट अभियान

धौलपुर. मध्यप्रदेश सीमा स्थित चंबल नदी किनारे बसे गांव राजघाट फिर से चर्चाओं में है। राजघाट सेव अभियान पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने प्रसंज्ञान लिया है। इस गांव में स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल, सडक़ और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लेकर दायर शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया है। गांव राजघाट की कहानी एक संघर्ष की है, जिसमें कुछ युवा आगे आए और फिर धीरे-धीरे तस्वीर बदलती गई। सुविधाओं को लेकर संघर्ष आज भी जारी है।

एनएचआरसी के आधिकारिक पत्र में कहा कि शिकायत में लगाए आरोप पीडि़तों के मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन की श्रेणी में आते हैं। आयोग ने यह टिप्पणी शिकायत के अवलोकन के बाद की है। आयोग ने इस आधार पर जिला मजिस्ट्रेट धौलपुर को निर्देश दिया है कि वे मामले में जांच कर दो सप्ताह के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट आयोग को प्रस्तुत करें। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी चंबल नदी के किनारे बसे राजघाट गांव में स्वास्थ्य केंद्र का अभाव, खराब सडक़ें, स्वच्छ पेयजल की कमी व स्वच्छता सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। मानसून के दौरान स्कूल और अस्पताल तक पहुंच लगभग असंभव हो जाता है। जिससे विशेष रूप से महिलाओं और बच्चियों की शिक्षा व स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

शिकायत में रहवासियों की बताई गंभीर स्थिति

शिकायत में यह भी उल्लेख है कि आपात परिस्थितियों में ग्रामीणों को खतरनाक चंबल नदी पार करनी पड़ती है, जबकि कुछ मामलों में नदी से शव निकालने और बच्चों के मगरमच्छ प्रभावित पानी में उतरने जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं, जिससे जीवन का सीधा खतरा उत्पन्न होता है। एनएचआरएम ने इन तथ्यों को गंभीर मानते हुए प्रशासन से जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू की है।

गांव राजघाट की यूं बदली सूरत

बीहड़ में बसे राजघाट गांव में करीब 10 साल पहले मूलभूत सुविधाओं को लेकर शुरू हुई जंग आज दिल्ली तक पहुंच गई है। साल 2015 में एक युवा चिकित्सक डॉ.अश्विनी ने कुछ साथियों के साथ राजघाट गांव में सुविधाओं की लड़ाई शुरू की और फिर सिलसिला चल निकला। संघर्ष का असर यह रहा कि राजघाट में पहले बिजली, विद्यालय में आरओ वाटर प्लांट, स्मार्ट कक्षा के लिए बोर्ड समेत अन्य सुविधाएं मिली। यह सब युवा टीम की बदौलत हुआ। गांव की दुर्दशा के चलते यहां शादी संबंध नहीं होते थे। लेकिन बाद में युवाओं की मुहिम के चलते करीब 22 साल बाद साल 2018 में पड़ोसी एमपी के गांव कुसैत को युवक पवन की बारात रवाना हुई। इससे पहले साल 1996 में शादी हुई थी।

– यह संज्ञान ग्रामीण भारत में बुनियादी अधिकारों की अनदेखी पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक हस्तक्षेप है। एनएचआरएम के एक्शन टेकन रिपोर्ट मांगी है। उम्मीद है कि राजघाट के लिए कुछ अच्छा होगा। अभियान का भी यही मूल उद्देश्य है।

– डॉ.अश्विनी पाराशर, कार्यकर्ता सेव द राजघाट अभियान

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