मप्र में अब अफोर्डेबल हाउसिंग के लिए केवल पीएम आवास योजना के नियमों पर निर्भर नहीं रहना होगा। छोटे-बड़े कस्बों और शहरों की जरूरत के अनुसार प्रदेश अपनी अलग नीति बनाएगा। स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर की मदद से इसकी तैयारी शुरू हो चुकी है। ड्राफ्ट बनने के बाद शासन से मंजूरी ली जाएगी। पीएमएवाई 2.0 के तहत राज्यों को अपनी नीति बनाने के निर्देश मिले हैं। इसके बाद बिल्डर संगठनों, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, विकास प्राधिकरण, नगर निगम और रेरा से चर्चा कर सुझाव जोड़े जाएंगे। पीएमएवाई 2.0 में 45 वर्ग मी. तक आवासों की अनुमति पीएम आवास योजना के पहले चरण में 30 वर्ग मीटर तक आवास बनाने का नियम था, जिसे दूसरे चरण में बढ़ाकर 45 वर्ग मीटर कर दिया गया है। इससे लागत बढ़ेगी, क्योंकि पहले चरण में 18% जीएसटी नहीं था, जो बाद में जोड़ दिया गया। केंद्र के नियम सभी निकायों पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे जमीन महंगी हो या सस्ती। नई नीति में एफएआर में बदलाव के बिंदु भी शामिल होंगे। सुझावों के बाद सरकार शहरी आवास का डाटा कलेक्शन करेगी और बड़े शहरों में आसपास के गांव-कस्बों से हुए पलायन का आकलन होगा। जरूरत अनुसार डेवलपमेंट और रजिस्ट्री शुल्क में छूट दी जाएगी। एक्सपर्ट बोले- नए ड्राफ्ट से फंड जैसे कई फायदे मिलेंगे आर्किटेक्ट और अर्बन प्लानर डॉ. विनय श्रीवास्तव ने कहा कि राज्य की खुद की नीति बनने से जमीनों और हितग्राहियों से जुड़े विवाद खत्म होंगे। राज्यों के लिए किफायती आवास की परिभाषा तय करना आसान होगा। जैसे मप्र में 6 से 12 लाख तक ये आवास बनते हैं तो महाराष्ट्र के बड़े शहरों में 15 से 25 लाख तक भी लिमिट है। किफायती आवासों को अमृत आदि योजनाओं से जोड़ेंगे।


