Lunar And Planetary Science Conference 2026: बारां जिले के रामगढ़ गांव के समीप स्थित ऐतिहासिक रामगढ़ क्रेटर के बारे में वैज्ञानिकों को अहम जानकारी मिली हैं। भू वैज्ञानिकों के शोध में क्रेटर की तलछटी में पाए गए सूक्ष्म चुंबकीय कणों से इस बात के संकेत मिले हैं कि लगभग 16.5 करोड़ साल पहले यहां लौह समृद्ध उल्कापिंड धरती से टकराया था।
वैज्ञानिकों के मुताबिक यह संरचना उस समय बनी, जब एक उल्का पिंड ऊपरी मध्य जुरासिक युग में पृथ्वी से टकराया था। इससे लगभग 3.5 किलोमीटर व्यास का क्रेटर निर्मित हुआ। यह शोध अमरीका के टैक्सास शहर में 16 से 20 मार्च को होने वाली लूनर एंड प्लेनेटरी साइंस कॉन्फ्रेंस [एलपीएससी] 2026 में प्रस्तुत किया जाएगा। क्रेटर पर वर्ष 2020 से ही लगातार शोध किए जा रहे थे।
डेढ़ महीने पहले दिल्ली से आया था दल
जानकारी के अनुसार करीब 40 दिन पहले दिल्ली और हरियाणा से शोध करने वालों की एक टीम रामगढ़ क्रेटर आई थी। इस दल ने यहां पर ड्रोन से कई तरह की जांच की थी। इसके बाद यह दल अपने साथ यहां से पत्थरों और चट्टानों के नमूने अपने साथ ले गया था।
लंबे समय से शोध
यह गोलाकार क्रेटर लंबे समय से भूवैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय रहा है। नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने क्रेटर के भीतर खोदी गई दो उथली खाइयों से लगभग 30 तलछटी नमूने एकत्र किए। चुंबकों की सहायता से मिट्टी से सूक्ष्म चुंबकीय कण अलग कर उनका सूक्ष्मदर्शी और रासायनिक विश्लेषण किया गया।
माइक्रोटेक्टाइट्स से मिलती जुलती संरचना
शोध के दौरान मिले कई कण एक मिलीमीटर से भी छोटे, चिकने और गोलाकार पाए गए, जो संकेत देते हैं कि टकराव के समय चट्टानें अत्यधिक तापमान पर पिघलकर हवा में उछली और तेजी से ठंडी होकर ठोस बनी। इन कणों की संरचना माइक्रोटेक्टाइट्स से मिलती जुलती है, जो उल्कापिंड टकराव के दौरान बनते हैं।
आयरन, निकेल और सिलिकॉन की मौजूदगी
रासायनिक जांच में इन कणों में आयरन, निकेल और सिलिकॉन की मौजूदगी सामने आई। विशेष रूप से निकेल का पाया जाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह उल्कापिंडों में सामान्य है, लेकिन रामगढ़ क्षेत्र की बलुआ पत्थर चट्टानों में दुर्लभ होता है। कुछ कणों में अत्यधिक आयरन और आयरन.समृद्ध खनिज संरचनाएं भी पाई गईं। शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में होने वाले अध्ययन से टकराव के समय और उल्कापिंड की प्रकृति को लेकर और अधिक ठोस प्रमाण मिलने का अनुमान है।


