Bhopal Hidden Places: भोपाल का नाम आते ही या तो आपका दिमाग झीलों को तलाशने लगता है या फिर नवाबी इतिहास, पुराने म्युजियम और कुछ गिनी-चुनी इमारतों को। लेकिन जो लोग शहर और उसके आसपास का क्षेत्र अच्छे से जानते हैं, उनसे पूछिए, भोपाल का असली सौंदर्य कहीं और भी छिपा है। कुछ ऐसी मनमोहक, खूबसूरत और ऐतिहासिक जगह जो न किसी टूरिस्ट ब्रोशर में नजर आती हैं और न ही MP Tourism की आधिकारिक लिस्ट में।
तब भी… दिलचस्प बात ये है कि इनमें से ज्यादातर जगहों के नाम सुनकर लोग इन्हें ऑफबीट का नाम देकर गूगल मैप पर खोजते हैं और आसानी से इन प्लेसेज पर पहुंच जाते हैं। patrika.com ने शहर के जानकार और ऐसे लोगों से (जिन्होंने भोपाल टूरिज्म का पैटर्न ही बदल दिया) जाना आखिर कहां-कहां छिपा है शहर के सुकून और खूबसूरती का ये खजाना… अगर आप भी जानना चाहते हैं… तो आइए चलिए हमारे साथ Hidden Places Bhopal जो आज भी नहीं हैं Tourist Place… यहां सिर्फ जानकार, इतिहासकार, कलाकार, फोटोग्राफर, नेचर लवर्स, रिसर्चर और भीड़-भाड़ से दूर शांत जगह तलाशते लोग जाते हैं… और वो शख्स भी… जो भोपाल को शहर नहीं एक अहसास मानता है…

गांव, खेत और सुकून का अनदेखा कॉम्बिनेशन
भोपाल से करीब 18-22 किमी दूर स्थित समसपुर कोई घोषित टूरिस्ट स्पॉट नहीं है, लेकिन यह इलाका रूरल-लैंडस्केप और स्लो लाइफ का बेहतरीन उदाहरण है। सीहोर रोड साइड, लोकल रूट तय कर जब यहां पहुंचते हैं, तो खेतों के बीच से निकलती पगडंडियां, छोटे तालाब और खुला आसमान आपको बेहद खुशी देता है। यह सब शहर से कुछ ही दूरी पर मौजूद है।

यह जगह फार्म-टूरिज्म, वीकेंड रिट्रीट और नेचर वॉक के लिए आदर्श हो सकती है, लेकिन फिलहाल यह सिर्फ स्थानीय लोगों की जानकारी तक सीमित है।
इतिहास जो खुद को बचाने की कोशिश कर रहा है
परमार कालीन मंदिर अवशेषों के लिए जाना जाता है आशापुरी मंदिर और इसके आसपास का पूरा क्षेत्र। राजधानी से 28-32 किमी दूर, विदिशा रोड की ओर बसे इस क्षेत्र में पहुंचते ही, टूटे स्तंभ, बिखरी मूर्तियां और पत्थरों पर उकेरी गई कलाकारी देखकर हैरानी होती है। क्योंकि इन्हें देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि यह इलाका कभी सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहा होगा।

लेकिन विडंबना यह है कि यहां न कोई सूचना पट्ट है, न कोई संरक्षण की ठोस व्यवस्था। इतिहास के छात्र और शोधकर्ता तो यहां पहुंच जाते हैं, लेकिन आम पर्यटक इस जगह के अस्तित्व से भी अनजान हैं।
आस्था, हरियाली और शांति का संगम
तरावली मंदिर और उसके आसपास बसा क्षेत्र सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक अनुभव देने वाली जगह है। भोपाल शहर से 28-35 किलो मीटर दूर रायसेन-विदिशा बेल्ट में पहाड़ियों और हरियाली के बीच स्थित यह मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच जाना-पहचाना है। लेकिन पर्यटन के नक्शे से बाहर है।

अगर इसे धार्मिक-पर्यटन और नेचर ट्रेल के रूप में विकसित किया जाए, तो यह भीड़भाड़ से दूर एक शांत विकल्प बन सकता है।
भोपाल का अनऑफिशियल नेचर थिएटर
राजधानी भोपाल से 25-27 किलो मीटर दूर स्थित चिड़ी खोह एक ऐसी जगह है जिसे शब्दों में समझना और समझाना मुश्किल है। पहाड़ी इलाका होने के साथ ही यह फॉरेस्ट जोन में भी आता है। चट्टानों की बनावट, गुफानुमा संरचना और सैकड़ों पक्षियों की आवाजों की गूंज इसे खास बना देती हैं।

बर्ड वॉचिंग और नेचर फोटोग्राफी के लिए ये जगह बेहतरीन है, लेकिन चूंकि यहां कोई आधिकारिक एंट्री या प्रबंधन नहीं है, इसलिए यह पर्यटन सूची से बाहर है।
नाम बदला, लेकिन कहानी आज भी अधूरी
भोपाल रियासत की पुरानी राजधानी इस्लामनगर, इसे अब जगदीशपुर कहा जाता है, ऐतिहासिक पलों से भरी हुई जगह है। जहां किले, महल और पुराने बाग इस बात के गवाह हैं कि यह इलाका कभी सत्ता और संस्कृति का केंद्र था। राजधानी शहर से 12-15 किलो मीटर की दूरी पर बसा है।

2023 में इसका नाम बदल दिया गया। लेकिन नाम बदलने के बाद भी इसका टूरिज्म नैरेटिव अपडेट नहीं हुआ। सही प्रचार और हेरिटेज सर्किट के साथ यह भोपाल पर्यटन की रीढ़ बन सकता है।
बौद्ध इतिहास का भूला हुआ अध्याय
विदिशा रोड पर भोपाल से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित सतधारा स्तूप क्षेत्र बौद्ध कालीन विरासत का हिस्सा है। यह सांची-विदिशा बेल्ट का प्राकृतिक विस्तार माना जा सकता है, लेकिन पर्यटन के नक्शे से लगभग गायब है।

यह जगह आध्यात्मिक पर्यटन और ऐतिहासिक अध्ययन दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
सड़क के किनारे खड़ा इतिहास
सुनारी स्तूप भोपाल शहर से करीब 45-47 किलोमीटर दूरी है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि लोग इसके पास से गुजरते हैं, लेकिन वे जानते नहीं कि वे यहां क्या देख रहे हैं। क्योंकि न वे इतिहासकार हैं और न ही कोई पुरातत्वविद और कलाकार या कोई फोटो ग्राफर। आम पर्यटक जिसमें थोड़ी सी जिज्ञासा जागे भी तो वो उसे इग्नोर कर आगे बढ़ जाते हैं।
Google Map लोगों को यहां पहुंचा तो देता है, लेकिन जानकारी के अभाव में उनका अनुभव अधूरा रह जाता है। सूचना पट्ट, गाइड और संरक्षण से यह भी एक महत्वपूर्ण पर्यटन बिंदु बन सकता है।
केरवा के पीछे का फॉरेस्ट बेल्ट (Offbeat Side of Kerwa)
केरवा डैम तो सब जानते हैं, लेकिन उसके पीछे का घना जंगल, कच्चे रास्ते और ऊंचे पॉइंट्स अब भी सिर्फ ‘लोकल सीक्रेट’ हैं।
यह इलाका क्यों है खास
- सनसेट व्यू
- नेचर ट्रैकिंग
- साइलेंट वीकेंड ट्रैवल
के लिए बेहद खास है। अगर इसे Eco-Tourism Zone के रूप में सीमित और नियंत्रित तरीके से डेवलप किया जाए, तो यह भोपाल शहर से मात्र 10-14 किमी पर स्थित बेहद खूबसूरत ‘साइलेंट हिल स्टेशन’ बन सकता है।
वाइल्डलाइफ से इतर रातापानी के अनछुए पॉइंट्स (Beyond Wildlife Sanctuary)
रातापानी अभयारण्य का नाम फाइलों में तो कायम है, इसे टाइगर रिजर्व भी घोषित किया गया है, लेकिन इसके आसपास मौजूद पहाड़ी रास्ते, पुराने रेलवे ट्रैक के पास के व्यू पॉइंट, आदिवासी बस्तियों के पास के नेचुरल कॉरिडोर, अब भी टूरिज्ट मैप से बाहर हैं।

भोपाल से 35-40 किमी दूर स्थित ये स्थान टूरिज्म का बेहतरीन उदाहरण बन सकता है। नेचर और कल्चरल अनुभव का अहसास देने वाले ये खूबसूरत प्लेसेस (Slow Tourism + Tribal Culture Experience) टूरिज्म के लिए आदर्श साबित हो सकते हैं।

भदभदा के नीचे का नेचुरल रॉक जोन
भदभदा झरना मानसून में चर्चा में आता है, लेकिन नीचे की चट्टानों और पानी के बहाव से बना प्राकृतिक रॉक-लैंडस्केप लगभग अनदेखा है। शहर से 8-10 किमी की दूरी पर बसा ये स्थल जियोलॉजिकल स्टडी, नेचर फोटोग्राफी, डॉक्यूमेंट्री शूट के लिए परफेक्ट है। लेकिन यहां न कोई जानकारी देता एक भी बोर्ड नजर आता है और न ही सुरक्षा पहरा।
कलियासोत के अनडिस्कवर्ड ट्रेल्स
शहर से 12-16 किमी दूर कलियासोत डैम के आसपास कुछ ऐसे रास्ते और ऊंचे पॉइंट्स हैं जहां से झील, जंगल और शहर…तीनों एक फ्रेम में दिखते हैं। ये पॉइंट्स Google Map से मिल जरूर जाते हैं, लेकिन टूरिज्म जैसी अपनी कोई पहचान नहीं बनाते। यही कारण है कि यह भोपाल का ‘Hidden View Deck’ बन सकता है।
भोजपुर के आगे का हेरिटेज जोन
भोजपुर मंदिर तक तो लोग जाते ही हैं। उसे देखने भक्तों की भीड़ उमड़ती है। लेकिन उसके आगे फैला पुराना पत्थर खनन क्षेत्र, अधूरी संरचनाएं, नदी के किनारे के ऐतिहासिक निशान अब भी केवल रिसर्च करने वालों तक ही सीमित हैं। शहर से 28-30 किमीटर की दूरी पर स्थित यह इलाका Ancient Engineering Tourism का शानदार और चौंकाने वाला क्षेत्र बन सकता है।
शाहपुरा के पास पुराने तालाब और बंधान
शहर फैल गया, लेकिन उसके 6 से 9 किमी दूर स्थित शाहपुरा और आसपास के पुराने जल संरचना तंत्र अब भी मौजूद हैं। भोपाल की वॉटर हेरिटेज, सस्टेनेबल अर्बन प्लानिंग की मिसाल कहलाने वाला ये क्षेत्र जिंदा मिसाल हैं, लेकिन टूरिज्म के नैरेटिव में इसे अभी तक जगह नहीं मिली है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे मध्यप्रदेश में करीब 450 पर्यटन केंद्र शामिल हैं, इन्हें चार इतिहास, प्राकृतिक, धार्मिक और वन्यजीव श्रेणियों में बांटा गया है। जबकि MP Tourism की आधिकारिक वेबसाइट पर कुल 34 शहरों को प्राकृतिक, हेरिटेज, वाइल्डलाइफ और आध्यात्मिक श्रेणियों में बांटा गया है।
भोपाल जिला प्रशासन की वेबसाइट की लिस्ट के मुताबिक जिले में कम से कम 10 प्रमुख स्थलों के नाम दर्ज हैं। जबकि अन्य वेबसाइट्स और टूरिज्म गाइड में भोपाल के करीब 15-20 प्रमुख विजिट प्वॉइंट्स हैं। इनमें मुगलकालीन इमारतें, संग्रहालय, पार्क, झीलें और गुफाएं शामिल हैं।
(कहना होगा कि मध्यप्रदेश में करीब 450 पर्यटन स्थल हैं। इनमें से MP Tourism बोर्ड ने 34 प्रमुख डेस्टिनेशन को अपनी सूची में प्रमुख रूप से शामिल किया है। लेकिन कई छोटे बीचोंबीच के स्थल सरकारी अब भी अनदेखे हैं, जबकि भोपाल में करीब 15-20 प्रमुख टूरिस्ट प्लेस हैं, लेकिन जिनमें कुछ को तो टूरिस्ट लिस्ट से बाहर रखा गया है। लेकिन कई स्थानीय और लोकप्रिय स्पॉट अब भी अनदेखे हैं।)
समस्या जगहों की नहीं, बस नजरभर की है
भोपाल के आसपास टूरिज्म की कमी नहीं है। कमी है तो विजन और प्राथमिकता की है। अगर इन जगहों को सोच-समझकर विकसित किया जाए तो भोपाल का पर्यटन सिर्फ बढ़ेगा ही नहीं, बल्कि समावेशी, शांत और टिकाऊ बनेगा।
तो आप समझ गए होंगे कि भोपाल की असली खूबसूरती उन जगहों में हैं जहां कोई बड़ा बोर्ड नहीं लगा, जहां टिकट खिड़की नहीं है और जहां अब भी शहर अपनी असली शक्ल में सांस ले रहा है। लेकिन सवाल फिर भी है और सिर्फ इतना ही है कि क्या हम इन जगहों को पहचान देने के लिए तैयार हैं?
-संजना कुमार ‘एमपी टूरिज्म’ सीरीज की अगली स्टोरी में जानें क्या कहते हैं हमारे टूरिस्ट एक्सपर्ट्स, इतिहासकार और अधिकारी…


