सर्दियों में उत्तराखंड बना जंगल की आग का हॉटस्पॉट:1,900 फायर अलर्ट, देश में सबसे ज्यादा; नंदा देवी से फूलों की घाटी तक दिखी लपटें

सर्दियों में उत्तराखंड बना जंगल की आग का हॉटस्पॉट:1,900 फायर अलर्ट, देश में सबसे ज्यादा; नंदा देवी से फूलों की घाटी तक दिखी लपटें

सर्दियों में उत्तराखंड के जिन पहाड़ों पर बर्फ गिरती थी, वहां जंगल धधकते नजर आए। हालात इतने बिगड़े कि नवंबर से जनवरी के बीच प्रदेश में 1,900 से अधिक फॉरेस्ट फायर अलर्ट जारी हुए, जो देश में सबसे ज्यादा हैं। इस दौरान फूलों की घाटी से लेकर नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान तक जलते दिखे।
पिछले दो दशकों में बदले मौसम चक्र ने उत्तराखंड के जंगलों को नई चुनौती में डाल दिया है। शीतकाल में सूखे जैसे हालात, बढ़ता तापमान और मानवीय लापरवाही ने आग की घटनाओं को सामान्य बना दिया है। वन विभाग के लिए यह संकट इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पारंपरिक फायर सीजन शुरू होने से पहले ही फायर वॉचर समेत जरूरी संसाधन झोंकने पड़ रहे हैं। वन विभाग का आधिकारिक फायर सीजन 15 फरवरी से 15 जून तक होता है। पहले मार्च-अप्रैल के बाद ही जंगल सुलगते थे, लेकिन अब नवंबर से ही आग बुझाने की नौबत आने लगी है। कैसे होती है कंट्रोल बर्निंग ज्यादातर आग सड़क किनारे फेंकी गई माचिस, बीड़ी-सिगरेट या जानबूझकर लगाई गई आग से फैलती है। कंट्रोल बर्निंग में वन विभाग पहले ही सूखी घास, पिरूल और पत्तियां जला देता है, ताकि फायर लाइन बन सके और आग आगे न बढ़े। जलवायु परिवर्तन के चलते शीतकालीन बारिश और बर्फबारी में भारी कमी आई है। 2012, 2016, 2018 और 2021-23 के बाद 2025 के नवंबर-दिसंबर भी पूरी तरह सूखे रहे। नतीजतन, नवंबर 2025 से ही वनाग्नि की घटनाएं शुरू हो गईं। नवंबर से जनवरी तक विंटर फायर अलर्ट क्या होता है फायर अलर्ट सैटेलाइट जंगल के ऊपर नजर रखते हैं। जहां तापमान अचानक बढ़ा या धुआं दिखा, वहां तुरंत चेतावनी भेजी जाती है ताकि आग फैलने से पहले कार्रवाई हो सके। गोविंद घाट के जंगल एक हफ्ते तक धधके इस बार आग ने दुर्गम और सुरक्षित क्षेत्रों को भी नहीं बख्शा। जनवरी 2026 में नंदा देवी नेशनल पार्क की फूलों की घाटी और गोविंद घाट रेंज के जंगल करीब एक सप्ताह तक जलते रहे। खड़ी चट्टानें और दुर्गम इलाका होने के कारण वन कर्मियों को आग बुझाने में भारी मशक्कत करनी पड़ी। वहीं, पिथौरागढ़ के नैनीसैनी और जमतड़ी गांव के जंगलों में आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड और एसएसबी के जवानों को मोर्चा संभालना पड़ा। शिकारियों की सक्रियता का अंदेशा पंचाचूली क्षेत्र कस्तूरी मृग का निवास स्थान है। स्थानीय जानकारों का मानना है कि जब बर्फबारी न होने से वन्य जीव निचले इलाकों की ओर आते हैं, तो शिकारी उन्हें फंसाने के लिए झाड़ियों में आग लगा देते हैं। हालांकि, पिथौरागढ़ के डीएफओ आशुतोष सिंह का कहना है कि शिकारियों के पुख्ता सबूत तो नहीं मिले हैं, लेकिन रिजर्व फॉरेस्ट में निगरानी बढ़ा दी गई है। वन्य जीव शिकार पर 7 साल तक की सजा का प्रावधान है। जलवायु परिवर्तन ने पूरा कैलेंडर बदला डीएफओ आशुतोष सिंह के अनुसार, जलवायु परिवर्तन ने वन विभाग के पूरे कैलेंडर को बदल दिया है। पहले मार्च-अप्रैल में आग लगती थी, जिसके लिए विभाग 15 फरवरी से तैयारी करता था। अब नवंबर से ही जंगल जलने लगे हैं। विभाग अब ‘कंट्रोल बर्निंग’ (सड़कों किनारे की सूखी घास को योजनाबद्ध तरीके से जलाना) के जरिए फायर लाइन तैयार कर रहा है ताकि मुख्य जंगल को बचाया जा सके। केवल पर्यावरण नहीं, सेहत को भी खतरा पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक के अनुसार, समय पर बारिश न होना और बढ़ता तापमान मानव जनित कारणों से भी है। वनों की आग केवल पेड़ों को ही नहीं जलाती, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र और मानव स्वास्थ्य को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रही है। हालिया 23-24 जनवरी की बारिश ने कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन यदि दोबारा लंबा सूखा पड़ा तो खतरा फिर बढ़ सकता है। ——————— ये खबर भी पढ़े : औली में बर्फ पिघलने से विंटर चैंपियनशिप का वेन्यू बदला: गौरसो बुग्याल या रोपवे टावर-10 के पास होंगे मुकाबले, पहले भी हो चुका आयोजन औली में 12 से 16 फरवरी तक प्रस्तावित नेशनल विंटर चैंपियनशिप के आयोजन स्थल में बदलाव कर दिया गया है। औली के नंदा देवी स्कीइंग स्लोप पर तेजी से बर्फ पिघलने के चलते खेलों के आयोजन को लेकर संशय की स्थिति बन गई थी। (पढ़ें पूरी खबर)

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