भास्कर न्यूज | गढ़वा शहर के चिनिया रोड स्थित नाहर चौक के पास संचालित द न्यू सिटी हॉस्पिटल में 4 फरवरी को सामने आए गंभीर मामले में अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से आमजन में रोष बढ़ता जा रहा है। आरोप है कि इलाज के दौरान पैसे का भुगतान नहीं होने पर अस्पताल प्रबंधन ने बच्चे को परिजनों को सौंपने से इनकार कर दिया, जिससे अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा हुआ। घटना के दो दिन बीत जाने के बावजूद सिविल सर्जन स्तर से जांच शुरू नहीं होने पर स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार 4 फरवरी को एक बीमार बच्चे को इलाज के लिए न्यू सिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों से भारी-भरकम राशि की मांग की। जब परिजन तत्काल पूरी रकम नहीं दे पाए, तो आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने बच्चे को परिजनों को देने से मना कर दिया। इस घटना के बाद अस्पताल परिसर में परिजनों और स्थानीय लोगों ने जमकर हंगामा किया। हंगामे के बावजूद अस्पताल प्रबंधन द्वारा परिजनों से कुल 80 हजार रुपए तीन किस्तों में वसूल किए गए। परिजनों का आरोप है कि इतनी बड़ी राशि चुकाने के बाद भी बच्चे की हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ। इसके बाद मजबूर होकर परिजन बच्चे को इलाज के लिए पलामू जिले के एक निजी अस्पताल ले गए, जहां उसका इलाज जारी है। घटना सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सिविल सर्जन गढ़वा डॉ. जॉन एफ. केनेडी द्वारा जांच की बात कही गई थी, लेकिन अब तक जांच शुरू नहीं हो सकी है। इस संबंध में सिविल सर्जन ने बताया कि उक्त मामले की जांच की जानी थी, लेकिन विभागीय बैठक के कारण शुक्रवार को भी जांच नहीं हो पाई। उन्होंने कहा कि मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है और जल्द ही अस्पताल जाकर जांच की जाएगी। जांच में दोषी पाए जाने पर संबंधित अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। इधर, स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों और उनके परिजनों का आर्थिक शोषण लगातार बढ़ रहा है। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार इलाज के नाम पर कर्ज लेने को मजबूर हैं। इस मामले में भी यदि समय रहते प्रशासन सख्ती दिखाता, तो परिजनों को इस तरह की पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती। लोगों का यह भी कहना है कि पैसे के अभाव में मरीज को बंधक बनाना न केवल अमानवीय है, बल्कि यह कानूनन अपराध भी है। ऐसे मामलों में स्वास्थ्य विभाग को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि निजी अस्पतालों में मनमानी पर लगाम लग सके। जानकारी के अनुसार पिछले उपायुक्त रमेश घोलप के समय बिना लाइसेंस के चला रहे दर्जनों नर्सिंग होम, क्लिनिक को उपायुक्त के निर्देश पर जांच कर सील किया गया था।


