ISL 12 को मिली हरी झंडी, लेकिन Fitness Coach पर क्लबों की मांगों से मचा बवाल।

ISL 12 को मिली हरी झंडी, लेकिन Fitness Coach पर क्लबों की मांगों से मचा बवाल।

इंडियन सुपर लीग के 12वें सीजन को लेकर अब धीरे-धीरे उम्मीद बनती दिख रही है। बता दें कि ब्रॉडकास्ट पार्टनर के ऐलान को आईएसएल 12 के आयोजन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि मंगलवार तक सीजन की शुरुआत एक हफ्ते टालने की चर्चा चल रही थी, लेकिन अब लक्ष्य 14 फरवरी से लीग शुरू कराने का रखा गया है।गौरतलब है कि ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन और क्लब प्रतिनिधियों की अंतरिम समिति इस समय तेज़ी से काम कर रही है। मौजूद जानकारी के अनुसार समिति के कई सदस्य विदेश यात्रा के दौरान भी ऑनलाइन बैठकों में शामिल हो रहे हैं ताकि लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल चुनौतियों को समय रहते सुलझाया जा सके। कोलकाता की एक प्रोडक्शन कंपनी ने प्रसारण की जिम्मेदारी संभाली है, जिसने समिति पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ा है। बताया जा रहा है कि मैचों के लिए आठ से दस कैमरों का इस्तेमाल किया जाएगा और प्रसारण गुणवत्ता पिछले सीजन के करीब रहने की उम्मीद है।खिलाड़ियों की ओर से वेतन में कटौती स्वीकार करना, क्लबों का ट्रांसफर विंडो में सक्रिय रहना और ज्यादातर टीमों का करीब दो हफ्ते से ट्रेनिंग में जुट जाना, इन सबने लीग को लेकर भरोसा बढ़ाया है। यह स्थिति पिछले साल अप्रैल से जनवरी के बीच बने निराशाजनक माहौल से बिल्कुल अलग नजर आती है। इस बदलाव के लिए एआईएफएफ, क्लबों और केंद्रीय खेल मंत्रालय की भूमिका को अहम माना जा रहा है।हालांकि क्लबों का कहना है कि मौजूदा सीजन एक तरह की “फोर्स मेज्योर” स्थिति में खेला जा रहा है। इसी आधार पर क्लबों ने खेल मंत्रालय को पत्र लिखकर इस सीजन में रिलेगेशन रोकने की मांग की है। उनका तर्क है कि जब कई टीमों ने अनिश्चितता के चलते संचालन रोक दिया था, तो ऐसे असमान हालात में रिलेगेशन जैसे स्थायी खेल और वित्तीय नतीजे खेल की निष्पक्षता और निवेशकों के भरोसे को नुकसान पहुंचा सकते हैं।लेकिन इसी पत्र में क्लबों ने अगले तीन से पांच साल तक रिलेगेशन रोकने की भी मांग रखी है, जिस पर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि लीग को स्थिर करने की जरूरत थी, तो 2019 के बाद से अब तक यह प्रक्रिया क्यों पूरी नहीं हो पाई। पत्र में यह भी कहा गया है कि मौजूदा सीजन व्यावसायिक रूप से लाभकारी नहीं है, हालांकि हकीकत यह भी है कि आईएसएल को अब तक लगातार आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।इन सबके बीच सबसे ज्यादा चिंता क्लबों की उस मांग को लेकर जताई जा रही है, जिसमें उन्होंने इस सीजन गोलकीपर कोच और स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग स्टाफ की नियुक्ति से छूट मांगी है। क्लबों का तर्क है कि ये पद फिलहाल “अनिवार्य नहीं” हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला खिलाड़ियों की फिटनेस और चोट के खतरे को बढ़ा सकता है, खासकर तब जब छोटा सीजन होने के कारण तीन महीनों में 90 से ज्यादा मैच खेले जाने हैं।लंबे ब्रेक के बाद लौट रहे खिलाड़ियों के लिए फिटनेस स्टाफ की भूमिका और भी अहम मानी जाती है। अगर इस जरूरत को नजरअंदाज किया गया, तो भारतीय फुटबॉल एक बार फिर उस दौर की ओर लौट सकता है जब एक ही कोच को कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ती थीं और संसाधनों की भारी कमी रहती थी। ऐसे में आईएसएल 12 का आयोजन तो तय होता दिख रहा है, लेकिन यह सीजन भारतीय फुटबॉल के भविष्य को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर बहस अभी खत्म नहीं हुई हैं। 

इंडियन सुपर लीग के 12वें सीजन को लेकर अब धीरे-धीरे उम्मीद बनती दिख रही है। बता दें कि ब्रॉडकास्ट पार्टनर के ऐलान को आईएसएल 12 के आयोजन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि मंगलवार तक सीजन की शुरुआत एक हफ्ते टालने की चर्चा चल रही थी, लेकिन अब लक्ष्य 14 फरवरी से लीग शुरू कराने का रखा गया है।
गौरतलब है कि ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन और क्लब प्रतिनिधियों की अंतरिम समिति इस समय तेज़ी से काम कर रही है। मौजूद जानकारी के अनुसार समिति के कई सदस्य विदेश यात्रा के दौरान भी ऑनलाइन बैठकों में शामिल हो रहे हैं ताकि लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल चुनौतियों को समय रहते सुलझाया जा सके। कोलकाता की एक प्रोडक्शन कंपनी ने प्रसारण की जिम्मेदारी संभाली है, जिसने समिति पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ा है। बताया जा रहा है कि मैचों के लिए आठ से दस कैमरों का इस्तेमाल किया जाएगा और प्रसारण गुणवत्ता पिछले सीजन के करीब रहने की उम्मीद है।
खिलाड़ियों की ओर से वेतन में कटौती स्वीकार करना, क्लबों का ट्रांसफर विंडो में सक्रिय रहना और ज्यादातर टीमों का करीब दो हफ्ते से ट्रेनिंग में जुट जाना, इन सबने लीग को लेकर भरोसा बढ़ाया है। यह स्थिति पिछले साल अप्रैल से जनवरी के बीच बने निराशाजनक माहौल से बिल्कुल अलग नजर आती है। इस बदलाव के लिए एआईएफएफ, क्लबों और केंद्रीय खेल मंत्रालय की भूमिका को अहम माना जा रहा है।
हालांकि क्लबों का कहना है कि मौजूदा सीजन एक तरह की “फोर्स मेज्योर” स्थिति में खेला जा रहा है। इसी आधार पर क्लबों ने खेल मंत्रालय को पत्र लिखकर इस सीजन में रिलेगेशन रोकने की मांग की है। उनका तर्क है कि जब कई टीमों ने अनिश्चितता के चलते संचालन रोक दिया था, तो ऐसे असमान हालात में रिलेगेशन जैसे स्थायी खेल और वित्तीय नतीजे खेल की निष्पक्षता और निवेशकों के भरोसे को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
लेकिन इसी पत्र में क्लबों ने अगले तीन से पांच साल तक रिलेगेशन रोकने की भी मांग रखी है, जिस पर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि लीग को स्थिर करने की जरूरत थी, तो 2019 के बाद से अब तक यह प्रक्रिया क्यों पूरी नहीं हो पाई। पत्र में यह भी कहा गया है कि मौजूदा सीजन व्यावसायिक रूप से लाभकारी नहीं है, हालांकि हकीकत यह भी है कि आईएसएल को अब तक लगातार आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
इन सबके बीच सबसे ज्यादा चिंता क्लबों की उस मांग को लेकर जताई जा रही है, जिसमें उन्होंने इस सीजन गोलकीपर कोच और स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग स्टाफ की नियुक्ति से छूट मांगी है। क्लबों का तर्क है कि ये पद फिलहाल “अनिवार्य नहीं” हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला खिलाड़ियों की फिटनेस और चोट के खतरे को बढ़ा सकता है, खासकर तब जब छोटा सीजन होने के कारण तीन महीनों में 90 से ज्यादा मैच खेले जाने हैं।
लंबे ब्रेक के बाद लौट रहे खिलाड़ियों के लिए फिटनेस स्टाफ की भूमिका और भी अहम मानी जाती है। अगर इस जरूरत को नजरअंदाज किया गया, तो भारतीय फुटबॉल एक बार फिर उस दौर की ओर लौट सकता है जब एक ही कोच को कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ती थीं और संसाधनों की भारी कमी रहती थी। ऐसे में आईएसएल 12 का आयोजन तो तय होता दिख रहा है, लेकिन यह सीजन भारतीय फुटबॉल के भविष्य को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर बहस अभी खत्म नहीं हुई हैं।

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