विपद ढोलकिया में विपरीत परिस्थितियों में भी खुद को समझने व जीवन जीने का संदेश

विपद ढोलकिया में विपरीत परिस्थितियों में भी खुद को समझने व जीवन जीने का संदेश

सिटी रिपोर्टर| बीहट
मध्य विद्यालय बीहट के परिसर में पूर्व क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, कोलकाता व आकाश गंगा रंग चौपाल एसोसिएशन, बरौनी द्वारा आयोजित 3 दिवसीय नाट्य महोत्सव के अंतिम दिन विपद ढोलकिया की प्रस्तुति के माध्यम से कलाकारों ने दिखाया कि आज के दौर में लोग जिस तरह आधुनिकता की तरफ भाग रहे हैं उससे हमारा पुरातन वैभव, संस्कृति, कला और कलाकार छूटते चले जा रहे हैं। नाट्य संस्था रिवाइवल द्वारा फणीश्वर नाथ रेणु की मूल कहानी का कुमार अभिजीत द्वारा नाट्य रूपांतरण व निर्देशन में प्रस्तुत नाटक विपद ढोलकिया ने लोक कलाओं के संरक्षण, व्यवस्था परिवर्तन एवं हमारे सामाजिक सांस्कृतिक नैतिक मूल्यों पर पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित करती नाटक समाज के उपर बड़ा सवाल छोड़ गया। पुरानी परंपराओं और कलाकारों के दर्द को उभारने की कोशिश में लगी नाटक विपरीत परिस्थितियों में भी खुद को संभालने समझने एवं साहस के साथ कर्मठता से जीवन जीने का संदेश देती दिखी। अभिनेता लुट्टन पहलवान की भूमिका में कुमार अभिजीत की ढोलक अंधेरे, महामारी और विपरीत समय में ग्रामीणों को जीने की प्रेरणा देती है किन्तु अंततः व्यवस्था के बदलते ही वह आप्रासंगिक होकर मिट जाती है। यह नाटक कलाकार के संरक्षण व संवर्धन की वकालत करती है क्योंकि आज भी लुट्टन सिंह जैसे हजारों लोक कलाकार व्यवस्था से हार कर भूख प्यास और परिवार के लिए कलाकारी और कला को छोड़कर मजदूर बनने को विवश हैं। लुट्टन की पत्नी के रूप में रजनी कुमारी, लुट्टन के बेटे की भूमिका में अनिकेत सुलभ व मिहिर मानस ने दर्शकों की तालियां बटोरी, राजा की भूमिका में मनीष कुमार, चांद सिंह की भूमिका में दीपक कुमार, मुंशी की भूमिका में नीरज कुमार, कवि की भूमिका में दीपक कुमार ने काफी प्रभावित किया। ढोलक पर नंदू कुमार, साउंड चंदन कुमार, लाइट मनोज कुमार, मेकअप-अमृता कुमारी का रहा। पंचों की झूठी शान और अंधविश्वास पर प्रहार… वहीं दूसरी प्रस्तुति कला भवन नाट्य विभाग पूर्णिया की पंचलाइट रही। नाटक का निर्देशन विश्वजीत कुमार सिंह ने किया। नाटक में पंचों की झूठी शान और अंधविश्वास को दर्शाते हुए यह दिखाया गया कि जरूरत पड़ने पर पुरानी परंपराएं व्यर्थ हो जाती हैं। बिहार के ग्रामीण परिवेश का यथार्थवादी चित्रण करना, जहां संपन्नता न होने पर भी लोग मिल-जुलकर पंचलाइट लाते हैं। साथ ही गोधन और मुनरी के प्रेम के माध्यम से ग्रामीण युवाओं की मासूमियत और मानवीय संवेदनाओं को भी उजागर किया गया। नाटक में प्रेम और मानवीयता के आगे जातिगत भेदभाव और पंचों की संकीर्ण मानसिकता टिक नहीं पाती। ग्रामीण जीवन में आशा और एकता का संदेश देती है। नाटक में सूत्रधार सूचित कुमार, गुलरी मंजू देवी, सरपंच की भूमिका में सुमित सिंह, अजीत कुमार सिंह, दीवान अभिनव कुमार, बिलवा अंजनी कुमार श्रीवास्तव ने अपने अभिनय से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं कल्लू शिवाजी राम राव, गोधन- प्रवीण कुमार, मुनरी-गरिमा सिंह, सरपंचनी -मिताली भौमिक, साक्षी झा, वैभव, चंदन कुमार सिंह, दक्ष, साहिल, संतोष, इरफान की भूमिका महत्वपूर्ण रही। वहीं संगीत पर रामपुकर टूटू, कुंदन सिंह थे। सिटी रिपोर्टर| बीहट
मध्य विद्यालय बीहट के परिसर में पूर्व क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, कोलकाता व आकाश गंगा रंग चौपाल एसोसिएशन, बरौनी द्वारा आयोजित 3 दिवसीय नाट्य महोत्सव के अंतिम दिन विपद ढोलकिया की प्रस्तुति के माध्यम से कलाकारों ने दिखाया कि आज के दौर में लोग जिस तरह आधुनिकता की तरफ भाग रहे हैं उससे हमारा पुरातन वैभव, संस्कृति, कला और कलाकार छूटते चले जा रहे हैं। नाट्य संस्था रिवाइवल द्वारा फणीश्वर नाथ रेणु की मूल कहानी का कुमार अभिजीत द्वारा नाट्य रूपांतरण व निर्देशन में प्रस्तुत नाटक विपद ढोलकिया ने लोक कलाओं के संरक्षण, व्यवस्था परिवर्तन एवं हमारे सामाजिक सांस्कृतिक नैतिक मूल्यों पर पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित करती नाटक समाज के उपर बड़ा सवाल छोड़ गया। पुरानी परंपराओं और कलाकारों के दर्द को उभारने की कोशिश में लगी नाटक विपरीत परिस्थितियों में भी खुद को संभालने समझने एवं साहस के साथ कर्मठता से जीवन जीने का संदेश देती दिखी। अभिनेता लुट्टन पहलवान की भूमिका में कुमार अभिजीत की ढोलक अंधेरे, महामारी और विपरीत समय में ग्रामीणों को जीने की प्रेरणा देती है किन्तु अंततः व्यवस्था के बदलते ही वह आप्रासंगिक होकर मिट जाती है। यह नाटक कलाकार के संरक्षण व संवर्धन की वकालत करती है क्योंकि आज भी लुट्टन सिंह जैसे हजारों लोक कलाकार व्यवस्था से हार कर भूख प्यास और परिवार के लिए कलाकारी और कला को छोड़कर मजदूर बनने को विवश हैं। लुट्टन की पत्नी के रूप में रजनी कुमारी, लुट्टन के बेटे की भूमिका में अनिकेत सुलभ व मिहिर मानस ने दर्शकों की तालियां बटोरी, राजा की भूमिका में मनीष कुमार, चांद सिंह की भूमिका में दीपक कुमार, मुंशी की भूमिका में नीरज कुमार, कवि की भूमिका में दीपक कुमार ने काफी प्रभावित किया। ढोलक पर नंदू कुमार, साउंड चंदन कुमार, लाइट मनोज कुमार, मेकअप-अमृता कुमारी का रहा। पंचों की झूठी शान और अंधविश्वास पर प्रहार… वहीं दूसरी प्रस्तुति कला भवन नाट्य विभाग पूर्णिया की पंचलाइट रही। नाटक का निर्देशन विश्वजीत कुमार सिंह ने किया। नाटक में पंचों की झूठी शान और अंधविश्वास को दर्शाते हुए यह दिखाया गया कि जरूरत पड़ने पर पुरानी परंपराएं व्यर्थ हो जाती हैं। बिहार के ग्रामीण परिवेश का यथार्थवादी चित्रण करना, जहां संपन्नता न होने पर भी लोग मिल-जुलकर पंचलाइट लाते हैं। साथ ही गोधन और मुनरी के प्रेम के माध्यम से ग्रामीण युवाओं की मासूमियत और मानवीय संवेदनाओं को भी उजागर किया गया। नाटक में प्रेम और मानवीयता के आगे जातिगत भेदभाव और पंचों की संकीर्ण मानसिकता टिक नहीं पाती। ग्रामीण जीवन में आशा और एकता का संदेश देती है। नाटक में सूत्रधार सूचित कुमार, गुलरी मंजू देवी, सरपंच की भूमिका में सुमित सिंह, अजीत कुमार सिंह, दीवान अभिनव कुमार, बिलवा अंजनी कुमार श्रीवास्तव ने अपने अभिनय से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं कल्लू शिवाजी राम राव, गोधन- प्रवीण कुमार, मुनरी-गरिमा सिंह, सरपंचनी -मिताली भौमिक, साक्षी झा, वैभव, चंदन कुमार सिंह, दक्ष, साहिल, संतोष, इरफान की भूमिका महत्वपूर्ण रही। वहीं संगीत पर रामपुकर टूटू, कुंदन सिंह थे।  

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