भास्कर न्यूज | ब्रह्मपुर महाशिवरात्रि पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस की कथा में आचार्य धर्मेन्द्र जी महाराज ने नैमीषशारन्य में सूत शौनक संवाद के माध्यम से मानव जीवन का उद्देश्य आत्म दर्शन ,मोक्ष की प्राप्ति बताई। गौरीशंकर पब्लिक स्कूल परिसर में कथावाचक ने मोक्ष का अर्थ बतलाते हुए कहा मोक्ष का सरल अर्थ मोह का क्षय है। भक्ति भगवंत प्राप्ति का सरल साधना है। भक्ति का सहज अर्थ भगवान का हो जाना है,अपने सभी जीवन व्यवहार को भगवान के साथ जोड़ देना है। भगवान के 24 अवतारों की संक्षिप्त कथा कहते हुए भगवान के अवतार लेने के अनेक कारण को बतलाते हुए कहा असल में भगवान भक्तों पर कृपा करने के लिए निराकार ब्रह्म साकार रूप धारण करते हैं।यह रूप देश काल के अनुसार धारण करते हैं।यथा शनकादिक ऋषि,बराह, देवर्षि नारद,श्रीनारायण, कपिल,दातात्रेय, यज्ञनारायण, ऋषभदेव, पृथू, मत्स्य, कच्छप, धन्वंतरी, मोहनी, वामन, परशुराम, वेदव्यास,, श्री राम, श्री कृष्ण,बलराम, बुध,हंसनारायण, हयग्रीव आदि। दातात्रेय चरित्र कहते हुए अनुसुइया के पातिव्रत महिमा को बताया। वेदव्यास के अवतरण को याद करते हुए कहा कि वेदव्यास जी को 17पुराणों की रचना करने के बाद भी शान्ति नहीं मिली,तो देवर्षि नारद की प्रेरणा से श्रीमद्भागवत की रचना की शांति प्राप्त की। यह श्रीमद्भागवत मानव को लौकिक और अलौकिक सुख शांति प्रदान करता है। आचार्य जी ने कहा कि प्रभु की प्राप्ति तप,जप, ध्यान,सत्संग, संतों की सेवा,संत की चरणधुली से किया जा सकता है। भास्कर न्यूज | ब्रह्मपुर महाशिवरात्रि पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस की कथा में आचार्य धर्मेन्द्र जी महाराज ने नैमीषशारन्य में सूत शौनक संवाद के माध्यम से मानव जीवन का उद्देश्य आत्म दर्शन ,मोक्ष की प्राप्ति बताई। गौरीशंकर पब्लिक स्कूल परिसर में कथावाचक ने मोक्ष का अर्थ बतलाते हुए कहा मोक्ष का सरल अर्थ मोह का क्षय है। भक्ति भगवंत प्राप्ति का सरल साधना है। भक्ति का सहज अर्थ भगवान का हो जाना है,अपने सभी जीवन व्यवहार को भगवान के साथ जोड़ देना है। भगवान के 24 अवतारों की संक्षिप्त कथा कहते हुए भगवान के अवतार लेने के अनेक कारण को बतलाते हुए कहा असल में भगवान भक्तों पर कृपा करने के लिए निराकार ब्रह्म साकार रूप धारण करते हैं।यह रूप देश काल के अनुसार धारण करते हैं।यथा शनकादिक ऋषि,बराह, देवर्षि नारद,श्रीनारायण, कपिल,दातात्रेय, यज्ञनारायण, ऋषभदेव, पृथू, मत्स्य, कच्छप, धन्वंतरी, मोहनी, वामन, परशुराम, वेदव्यास,, श्री राम, श्री कृष्ण,बलराम, बुध,हंसनारायण, हयग्रीव आदि। दातात्रेय चरित्र कहते हुए अनुसुइया के पातिव्रत महिमा को बताया। वेदव्यास के अवतरण को याद करते हुए कहा कि वेदव्यास जी को 17पुराणों की रचना करने के बाद भी शान्ति नहीं मिली,तो देवर्षि नारद की प्रेरणा से श्रीमद्भागवत की रचना की शांति प्राप्त की। यह श्रीमद्भागवत मानव को लौकिक और अलौकिक सुख शांति प्रदान करता है। आचार्य जी ने कहा कि प्रभु की प्राप्ति तप,जप, ध्यान,सत्संग, संतों की सेवा,संत की चरणधुली से किया जा सकता है।


