भास्कर एक्सक्लूिसव सरकारी स्कूलों में 2019-20 में सेनिटरी नैपकिन की सप्लाई की शुरू की गई थी, लेकिन 2020-21 से सप्लाई बंद है। अब स्कूलों में सिर्फ आयरन व कृमि की दवा सप्लाई की जाती है। इसमें क्लास 1 से 5 की बच्चियों को आयरन की पिंक और क्लास 6-12 की छात्राओं को नीली गोली प्रत्येक सप्ताह दी जाती है। जिले के 1560 स्कूलों में लगभग एक लाख छात्राएं पढ़ाई करती हैं। इनमें क्लास 8वीं की करीब 9500 छात्राएं हैं। लेकिन उन्हें सेनिटरी नैपकिन नहीं दी जाती है। जबकि सरकार की ओर से हेल्थ एंड वैलनेस कार्यक्रम चलाया जाता है। इसमें बच्चियों को आयरन की गोली के अलावा स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता का पाठ पढ़ाया जाता है। जबकि छात्राओं के स्वास्थ्य जुड़ा सबसे बड़े समस्या के लिए समाधान की दिशा में ठोस काम नहीं किया जा रहा है। बल्कि सरकारी स्कूल अब सिर्फ संस्थाओं की ओर से दिए गए नैपकिन पेड पर निर्भर है। संस्थाओं की ओर से मिलने वाले नैपकिन पेड ही छात्राओं के बीच बांटा जाता है। स्टॉक खत्म होने के बाद नहीं मिलता है। सरकार के स्तर से कार्रवाई की जानी चाहिए : डीईओ स्कूलों को नैपकिन के लिए नहीं दिया गया फंड : ठाकुर उत्क्रमित मध्य विद्यालय आसनसोल के प्रभारी प्रधानाध्यापक राममूर्ति ठाकुर ने कहा कि जिन स्कूलों में 7वीं और 8वीं की पढ़ाई होती है, वहां प्राथमिकता के साथ नैपकिन पेड उपलब्ध होना जरूरी है। क्योंकि उसी दौरान बच्चियों को पहली बार उस शुरूआती दौर से गुजरना पड़ता है। इसमें असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है। स्कूलों में इसके लिए फंड नहीं है। किसी संस्था व किसी एनजीओ के भरोसे पूरी व्यवस्था है। क्लास 8 में 9500 छात्राएं, जिन्हें नैपकिन की जरूरत बोकारो में कुल 528 मिडिल स्कूल हैं। इनमें लगभग 9500 छात्राएं है। महिला शिक्षिका सरिता ने बताया कि इस कक्षा में पढ़ने वाली अधिकतर छात्राओं को पहली बार पीरियड होती है। उन्हें पहले से मालूम भी नहीं रहता है कि उन्हें पीरियड होने वाली है या वह क्या है। अचानक स्कूल में किसी समय पीरियड शुरू होने की वजह से बेटियां शर्म के कारण बोल नहीं पाती हैं। वहीं स्कूल में पेड उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें घर भेजने की विवशता होती है। वहीं मध्य विद्यालय सेक्टर-2सी की प्रभारी प्रधानाध्यापिका शौंपी कुमारी ने बताया कि चार साल पहले सेनिटरी नैपकिन की सप्लाई स्कूलों में शुरू हुई थी, उस समय लगा था कि यह सरकार की अच्छी पहल है, लेकिन अफसोस की बात इसकी सप्लाई ही बंद हो गई। वर्षों से इसकी आपूर्ति नहीं हो रही है। अब अपने से व्यवस्था करना पड़ता है। इसके लिए कोई फंड नहीं है। जिस समय स्कूलों में सेनिटरी नैपकिन की सप्लाई शुरू हुई थी, उसी समय स्कूलों में सेनिटरी नैपकिन के लिए मशीन भी लगाई गई थी। जो आज की तारीख में खराब हो चुकी है। ऐसी स्थिति में छात्राएं अपने से सेनिटरी नैपकिन नहीं ले सकती है। उन्हें सेनिटरी नैपकिन लेना है तो स्कूल के टीचर्स से संपर्क करना होगा। स्कूल में पढ़ती छात्राएं।


