विदिशा के किसान ने लगाए अमरूद के 900 पौधे:2.50 एकड़ में 2 साल बाद ही 60 क्विंटल उत्पादन; पहली बार में ही 75 हजार का मिला फायदा

विदिशा के किसान ने लगाए अमरूद के 900 पौधे:2.50 एकड़ में 2 साल बाद ही 60 क्विंटल उत्पादन; पहली बार में ही 75 हजार का मिला फायदा

विदिशा की गुलाबगंज तहसील के मेहरूखेड़ी गांव के हाइटेक किसान संकल्प शर्मा रासायनिक और जैविक खेती से दूरी बनाकर अब प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। वे अब अपनी फसलों में रासायनिक खाद और जैविक खेती में इस्तेमाल किए जाने वाली वर्मी कंपोस्ट, बायो फर्टिलाइजर का प्रयोग बंद करके प्राकृतिक खेती करना शुरू कर दिया है। इसमें घासफूस, मल्चिंग और बिना जुताई की खेती के प्रयोग से फसलों का उत्पादन किया जाता है। मल्चिंग खेती एक आधुनिक तकनीक है, जिसमें मिट्टी की ऊपरी सतह को प्लास्टिक शीट, सूखी पत्तियों या घास (मल्च) से ढंक दिया जाता है। यह नमी बनाए रखने, खरपतवार रोकने, मिट्टी के कटाव को रोकने और तापमान संतुलित करने में सहायक है। मल्चिंग से फसलों की उपज और गुणवत्ता में वृद्धि होती है संकल्प शर्मा ने प्राकृतिक खेती का पहला प्रयोग बागवानी में किया है। उन्होंने करीब 2 साल पहले 2.50 एकड़ जमीन में जापानी वैरायटी रेड डायमंड अमरूद के 900 से ज्यादा पौधे लगाए थे। इसके तीसरे साल ही प्रति पौधा 5 से 9 किलो की औसत से 60 क्विंटल से अधिक अमरूद का उत्पादन हुआ है। पौधे खरीदने सहित वन टाइम इनवेस्टमेंट में कुल 1.50 लाख की लागत आई थी। जबकि पहली फसल ही 2.25 लाख की बिक गई। यानी 75 हजार से अधिक का फायदा मिला है।
2 एकड़ में 400 आम के पौधे लगाए अगली फसल में बिना लागत के लाखों का फायदा मिलेगा। इससे उनका उत्साह बढ़ गया है। अब उन्होंने दूसरा प्रयोग 2 एकड़ में केसर वैरायटी के आम के 400 से अधिक पौधे लगाकर किया है। अगले साल आम के बगीचे में भी उत्पादन मिलने लगेगा। संकल्प शर्मा ने पौधों में किसी भी प्रकार की खाद और बायो फर्टिलाइजर का इस्तेमाल नहीं किया है।
नौकरी छोड़कर अपना प्राकृतिक खेती का रास्ता 45 वर्षीय संकल्प शर्मा ने वर्ष 2015 में अपनी कॉरपोरेट नौकरी छोड़ी और खेती को अपना भविष्य बनाया। यह फैसला केवल करियर बदलने का नहीं था, बल्कि जीवन की दिशा बदलने का निर्णय था। संकल्प शर्मा की शिक्षा तकनीकी और प्रबंधन दोनों क्षेत्रों में रही है। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीई किया और इसके बाद मार्केटिंग में एमबीए की पढ़ाई पूरी की। कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने योजना, प्रबंधन और संवाद की गहरी समझ विकसित की। लेकिन समय के साथ उन्हें महसूस हुआ कि रसायनों पर आधारित खेती ना तो किसानों के लिए ठीक है और ना ही मिट्टी, पर्यावरण और उपभोक्ता के लिए। यही सोच उन्हें प्राकृतिक खेती की ओर ले गई। संकल्प शर्मा 12 एकड़ भूमि पर पूरी तरह प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उनके खेतों में शरबती गेहूं, खापली गेहूं, विभिन्न दालें और फल उगाए जाते हैं।
3 प्रकार से करते हैं खेती और प्रयोग सबसे पहले वे CVR Soil Technique अपनाते हैं। इस मै सबसे पहले वे मिट्टी तकनीक अपनाते हैं। यह एक प्राकृतिक और कम लागत वाली विधि है, जिसमें अपने ही खेत की 3 से 4 फीट गहराई की मिट्टी को पानी में घोलकर फसलों पर छिड़काव किया जाता है। इस घोल में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव फसलों को पोषण देते हैं और फॉल आर्मीवर्म जैसे कीटों पर भी प्रभावी नियंत्रण करते हैं। इस तकनीक से बिना किसी रासायनिक दवा के फसल की उपज और मिट्टी की सेहत दोनों बेहतर होती है। दूसरी महत्वपूर्ण तकनीक है No-Till Farming बिना जुताई की खेती, जिसे वे खासतौर पर अपने बागानों में अपनाते हैं। इस पद्धति में खेत को बार-बार जोता नहीं जाता, बल्कि जमीन पर कवर क्रॉप और प्राकृतिक घास बनाए रखी जाती है। इससे मिट्टी की संरचना सुरक्षित रहती है, नमी बनी रहती है, कटाव कम होता है और मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ते हैं। साथ ही मशीन और मजदूरी का खर्च भी काफी घट जाता है। तीसरा और सबसे अनोखा प्रयोग है गाजर घास से तैयार बायो-एंजाइम। खेत में उगने वाली इस जहरीली और आक्रामक खरपतवार को गुड़ और पानी के साथ एक शक्तिशाली जैविक घोल बनाते हैं। यह बायो-एंजाइम प्राकृतिक खाद के रूप में काम करता है, मिट्टी की गुणवत्ता सुधारता है और एफिड व व्हाइट फ्लाई जैसे कीटों पर भी नियंत्रण करता है। चौथा नवाचार है अपने फार्म को एक ‘ ट्रेनिंग लैब’ के रूप में विकसित करना। यहां खेती के साथ-साथ किसानों को जमीन पर ही प्राकृतिक खेती के तरीके सिखाए जाते हैं। प्रशिक्षण शिविरों और फार्म विज़िट के माध्यम से किसान प्रत्यक्ष रूप से देखकर और करके सीखते हैं, जिससे सीख अधिक प्रभावी बनती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े लोग उनके वेबिनार के माध्यम से भी मार्गदर्शन लेते हैं।

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