इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि बकाया की वसूली के लिए किसी निजी कंपनी के खिलाफ याचिका पोषणीय नहीं है। कोर्ट ने निजी कंपनी के खिलाफ दाखिल याचिका पांच हजार रुपये हर्जाने के साथ खारिज़ कर दी है। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाले असाधारण उपचारों का उपयोग निजी बकाया की वसूली के लिए नहीं किया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने दिया है। प्रयागराज की यूनियन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन ट्रांसपोर्ट कंपनी ने अपना बकाया वसूलने के लिए याचिका की। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि विपक्षी का इस दावे से कोई लेना-देना नहीं था। याची के वकील ने भी स्वीकार किया कि राहत निजी कंपनी के खिलाफ मांगी जा रही थी। कोर्ट ने ऐसी याचिका पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसी याचिकाएं न्यायालय का कीमती समय बर्बाद करती हैं और उन मामलों की सुनवाई में बाधा उत्पन्न करती हैं जो वास्तव में विचारणीय हैं। अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी लेकिन कोर्ट ने भविष्य में ऐसी याचिकाओं को हतोत्साहित करने के लिए पांच हजार रुपये का हर्जाना लगाते हुए याचिका खारिज कर दी।


