माघ मेले में संत बनाम सिस्टम:शंकराचार्य–प्रशासन टकराव की घटना बनी सबसे बड़ी कंट्रोवर्सी, 11वें दिन समाप्त हुआ विवादित मामला

माघ मेले में संत बनाम सिस्टम:शंकराचार्य–प्रशासन टकराव की घटना बनी सबसे बड़ी कंट्रोवर्सी, 11वें दिन समाप्त हुआ विवादित मामला

प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को संगम स्नान से रोके जाने के बाद शुरू हुआ विवाद लगातार 10 दिनों तक चला। पुलिस–प्रशासन पर अपमान और शिष्यों की पिटाई के आरोप लगे। वहीं प्रशासन ने नियम और भीड़ प्रबंधन का हवाला दिया। यह मामला धार्मिक, राजनीतिक और सोशल मीडिया स्तर पर देशभर में चर्चा का विषय बना रहा। आखिरकार 28 जनवरी को शंकराचार्य मेला क्षेत्र से प्रस्थान कर गए। मौनी अमावस्या पर शुरू हुआ विवाद
मौनी अमावस्या यानी 18 जनवरी को शंकराचार्य स्वामी पालकी पर सवार होकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे। इसी दौरान पुलिस प्रशासन ने भीड़ अधिक होने का हवाला देते हुए उन्हें संगम से करीब 50 मीटर पहले ही रोक दिया। इसे लेकर मौके पर तनाव की स्थिति बन गई। शिष्यों की पिटाई और अपमान का आरोप
शंकराचार्य का आरोप है कि इसी घटनाक्रम के बाद उनके कुछ शिष्यों को संगम नोज चौकी पर ले जाकर पुलिसकर्मियों ने पिटाई की। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पालकी को अपमानजनक ढंग से शिविर के बाहर तक ले जाकर छोड़ दिया गया और पुलिसकर्मी वहां से चले गए। शिविर में प्रवेश से इनकार, बाहर बैठकर विरोध
घटना के बाद शंकराचार्य ने घोषणा की कि जब तक पुलिस प्रशासन सम्मानपूर्वक उन्हें संगम स्नान नहीं कराता, तब तक वह अपने शिविर में प्रवेश नहीं करेंगे। इसके बाद वह लगातार शिविर के बाहर ही बैठे रहे और विरोध दर्ज कराते रहे। गो प्रतिष्ठा प्रेरणा यात्रा और संतों से संपर्क
विवाद के दौरान शंकराचार्य प्रतिदिन सुबह करीब 8 बजे पूजन और तर्पण के बाद ‘गो प्रतिष्ठा प्रेरणा यात्रा’ पर निकलते रहे। इस दौरान वह माघ मेले में मौजूद साधु–संतों से संपर्क करते और गोरक्षा का संकल्प दिलाते रहे। सोशल मीडिया पर ट्रेंड, देशभर में बहस
यह मुद्दा देखते ही देखते सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा। देशभर से पक्ष और विपक्ष में हजारों–लाखों टिप्पणियां आने लगीं। कई लोगों ने इसे संतों का अपमान बताया, जबकि कुछ लोगों ने भीड़ और सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर पुलिस कार्रवाई को उचित ठहराया। विपक्षी दलों का सरकार पर हमला
मामले को लेकर कई विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा और संतों के अपमान का आरोप लगाया। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडे, राज्यसभा सांसद व आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह, कांग्रेस नेता अखिलेश प्रताप सिंह समेत कई राजनीतिक हस्तियां शंकराचार्य से मिलने उनके शिविर तक पहुंचीं।
पुरी शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती समेत कई संतों और कथावाचकों ने शिष्यों की पिटाई को गलत बताया। संत समाज की ओर से मांग की गई कि प्रशासन इस पूरे मामले में क्षमा याचना करे। प्रशासन की ओर से नोटिस, जवाब में प्रेस कॉन्फ्रेंस
विवाद के बीच मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को बैक-टू-बैक दो नोटिस जारी किए। एक नोटिस में पूछा गया कि उन्होंने अपने बोर्ड पर ‘शंकराचार्य’ क्यों लिखा है और इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना बताया गया। इसके जवाब में शंकराचार्य की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई। उन्होंने कहा कि प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या कर रहा है। उनका दावा था कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल पट्टाभिषेक तक सीमित है और उसमें यह कहीं नहीं कहा गया कि वह अपने नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ नहीं लिख सकते। इस संबंध में शंकराचार्य की ओर से मेला प्रशासन को नोटिस भेजने का भी दावा किया गया। समर्थन और विरोध दोनों
शंकराचार्य के समर्थन में जगह-जगह प्रदर्शन हुए, वहीं कुछ लोगों ने उनकी मांगों को गलत बताते हुए पुलिस प्रशासन को सही ठहराया। इस तरह यह मामला धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बना रहा। लगातार 10 दिनों तक शंकराचार्य अपने शिविर के बाहर ही बैठे रहे। इस दौरान हजारों श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए पहुंचे, लेकिन संगम स्नान को लेकर कोई समाधान नहीं निकल सका। 11वें दिन मेला क्षेत्र से प्रस्थान
आखिरकार 11वें दिन यानी 28 जनवरी को शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती माघ मेला क्षेत्र से प्रस्थान कर गए। इससे पहले उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि वह दुखी मन से मेला छोड़ रहे हैं। उनके प्रस्थान के साथ ही माघ मेले का यह विवादित अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन संत–प्रशासन टकराव की यह घटना लंबे समय तक चर्चा में बनी रही।

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