सिसदेवरी के 80% किसान छोड़ रहे पारंपरिक खेती:रबी सीजन में नोहर चंद्राकर समेत बाकी अन्नदाता धान की जगह सरसों लगा रहे

सिसदेवरी के 80% किसान छोड़ रहे पारंपरिक खेती:रबी सीजन में नोहर चंद्राकर समेत बाकी अन्नदाता धान की जगह सरसों लगा रहे

बलौदाबाजार जिले के पलारी ब्लॉक स्थित सिसदेवरी गांव में कृषि परिदृश्य बदल रहा है। रबी सीजन में जो खेत पहले खाली रहते थे, अब वहां सरसों की फसल लहलहा रही है। इस बदलाव का श्रेय किसान नोहर चंद्राकर को जाता है, जिनकी सफलता ने उन्हें भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई है। नोहर चंद्राकर ने करीब 20 साल पहले पारंपरिक धान की खेती छोड़कर सरसों उगाने का फैसला किया था। शुरुआत में गांव वालों ने उनके इस कदम को असामान्य माना, लेकिन जब सरसों से बेहतर उत्पादन और आय दोगुनी होने लगी तो किसानों का नजरिया बदल गया। नोहर की सफलता से प्रेरित होकर आज सिसदेवरी गांव के लगभग 80 प्रतिशत किसान रबी सीजन में सरसों की खेती कर रहे हैं। किसान जितेंद्र चंद्राकर, राजेश, उत्तम, भीम, गोरखनाथ, श्यामलाल, पवन चंद्राकर, दिनेश, रुयेश, मनोहर चंद्राकर और कुबेर यादव बताते हैं कि पहले उनके खेत रबी में खाली रहते थे। प्रेरणा के साथ व्यावहारिक सहयोग भी नोहर चंद्राकर ने किसानों को केवल प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि व्यावहारिक सहायता भी दी। उनकी तेल मिल में किसान बिना नकद भुगतान के, केवल खली देकर अपनी सरसों का शुद्ध तेल निकलवा सकते हैं, जिससे उनकी लागत और जोखिम दोनों कम हुए। कम लागत, अधिक मुनाफा बना सरसों की पहचान नोहर के अनुसार, धान की तुलना में सरसों की खेती में लागत लगभग 40 प्रतिशत कम आती है। इसमें पानी की जरूरत कम होती है और रखवाली का खर्च भी न के बराबर है। मूल्य संवर्धन से बढ़ी किसानों की आमदनी उन्होंने किसानों को मूल्य संवर्धन का महत्व समझाया। सीधे सरसों बेचने पर जहां 6500 रुपये प्रति क्विंटल मिलते हैं, वहीं तेल और खली अलग-अलग बेचने पर आय बढ़कर करीब 9000 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच जाती है। सामुदायिक प्रभाव: एक गांव से 20 गांवों तक नोहर चंद्राकर का प्रभाव अब सिसदेवरी तक सीमित नहीं है। गिर्रा, जर्वे, कोसमंदी, पलारी, चिखली सहित 20 से अधिक गांवों के किसान उनके पास तेल निकलवाने पहुंच रहे हैं। इससे सामूहिक उद्यमशीलता को बढ़ावा मिला है और गांव के युवा शहरों की ओर पलायन करने के बजाय कृषि से जुड़ रहे हैं। विशेषज्ञ की राय कृषि वैज्ञानिक डॉ. गजेंद्र चंद्राकर कहते हैं, नोहर चंद्राकर का मॉडल फसल विविधीकरण और मूल्य संवर्धन का आदर्श उदाहरण है। जब एक किसान सफल होता है, तो वह पूरे समुदाय के लिए प्रयोगशाला बन जाता है। सिसदेवरी में यही हुआ है। यह आत्मनिर्भर कृषि की ओर एक सार्थक कदम है। आत्मनिर्भरता की मिसाल बना सिसदेवरी सिसदेवरी गांव की यह कहानी साबित करती है कि कृषि परिवर्तन के लिए किसी बड़े अभियान की नहीं, बल्कि एक सफल और जीवंत उदाहरण की जरूरत होती है। नोहर चंद्राकर की पहल आज पूरे गांव के लिए नई कृषि चेतना, आर्थिक सशक्तिकरण और सामुदायिक एकजुटता की पहचान बन चुकी है।

​ 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *