बलिया के पीडब्ल्यूडी डाक बंगले में मंगलवार को भाजपा के पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह ने यूजीसी से जुड़े एक मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि समाज में जाति व्यवस्था मौजूद है और रहेगी, लेकिन विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को इससे पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेताओं से इस दिशा में गंभीरता से सोचने का आग्रह किया। पूर्व विधायक ने कहा कि शिक्षण संस्थानों में केवल शिक्षक और शिक्षार्थी होने चाहिए। किसी भी विद्यालय या विश्वविद्यालय को सिर्फ संविधान बनाकर नहीं सुधारा जा सकता, बल्कि उन्हें संस्कारों और नैतिक मूल्यों के आधार पर बेहतर बनाया जाना चाहिए। उन्होंने शिक्षा प्रणाली में राम के चरित्र को पढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। सुरेंद्र सिंह ने कहा कि जिस दिन विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में राम का चरित्र पढ़ाया जाने लगेगा, उस दिन से हर बच्चा जातिगत भेदभाव भूलकर शबरी के झूठे बेर खाने को तैयार होगा और तब संविधान की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की चर्चा करते हुए कहा कि संघ अपनी 100वीं वर्षगांठ मना रहा है और सौ वर्षों की साधना के दौरान उसने समाज में समरसता स्थापित करने, छुआछूत और भेदभाव को समाप्त करने के लिए प्रभावी कार्य किया है। उनके अनुसार, आज की सामाजिक परिस्थितियों में छुआछूत और सामाजिक भेदभाव लगभग समाप्ति की अवस्था में पहुंच चुका है। पूर्व विधायक ने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान हालात में कोई ऐसा विधेयक लागू किया गया, तो सवर्ण समाज भय और आशंका के कारण दलित समाज के समीप जाने से हिचकिचाएगा। इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित होगा और उस भावना को नुकसान पहुंचेगा, जिसे मजबूत करने के लिए संघ ने सौ वर्षों तक प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि जिस भेदभाव और छुआछूत को समाप्त करने के लिए लंबी साधना की गई, उसका पुनर्जन्म किसी भी रूप में उचित या प्रासंगिक नहीं कहा जा सकता।


