KGMU परिसर में 3 बड़ी मजारें, नोटिस पर विवाद:3400 वर्गफीट में केवल मजार, एम्बुलेंस और मरीजों को आने-जाने में दिक्कत

KGMU परिसर में 3 बड़ी मजारें, नोटिस पर विवाद:3400 वर्गफीट में केवल मजार, एम्बुलेंस और मरीजों को आने-जाने में दिक्कत

KGMU परिसर में 3 बड़ी मजारें ऐसी हैं जिनकी वजह से एम्बुलेंस और मरीजों को आने-जाने में दिक्कत होती है। 3400 वर्गफीट में केवल मजारें हैं, परिसर का क्षेत्र इससे भी बड़ा हो जाता है। इन्हें हटाने के लिए KGMU ने नोटिस चस्पा कर दिए हैं। उसके बाद से लखनऊ के मौलानाओं ने चुनौतियां देनी शुरू कर दीं। इस मामले में सपा के विधायक भी सामने आ गए हैं। विधायक रविदास मेहरोत्रा ने तो यहां तक कह दिया है कि मजार तोड़ने से पहले बुलडोजर उनके ऊपर से गुजरेगा। स्थितियां यहां तक पहुंच चुकी हैं तो दैनिक भास्कर ने ग्राउंड जीरो पर पहुंचा। यहां रिपोर्टर ने जो कुछ देखा वह सब पढ़ेंगे। साथ ही धर्मगुरुओं की बात भी जानेंगे जो KGMU के नोटिस को गंगा-जमुनी तहजीब पर हमला बता रहे हैं। KGMU प्रशासन की बात भी करेंगे जो इन मजारों को मरीजों की सेवा में बाधक बता रहे हैं। पढ़िए यह रिपोर्ट… पहले 3 तस्वीरें देखिए… अब पढ़िए मजारों का पूरा मामला… मजारें कब की हैं, इसी सवाल पर सबसे बड़ा टकराव मजारों की उम्र इस पूरे विवाद की धुरी है। दरगाह शाहमीना शाह से जुड़े लोगों और धर्मगुरुओं का दावा है कि परिसर में मौजूद कई मजारें 500 से 600 साल पुरानी हैं और KGMU के अस्तित्व में आने से पहले की हैं। उनका कहना है कि यह इलाका नवाबी दौर से सूफी परंपरा का केंद्र रहा है, जहां इलाज और दुआ साथ-साथ चलते थे। वहीं KGMU प्रशासन इन दावों को खारिज करता है। प्रशासन के अनुसार जिन मजारों को नोटिस जारी किया गया है, वे ऐतिहासिक नहीं हैं। जांच में सामने आया है कि पिछले 30-40 वर्षों में कुछ मजारें बनाई गईं और बीते डेढ़ साल में उनका दायरा तेजी से बढ़ाया गया। प्रशासन का कहना है कि यही विस्तार अब अतिक्रमण की श्रेणी में आता है। मजारों की देखभाल करने वाले बोले- यह सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं ग्राउंड पर मजारों की देखभाल करने वाले लोग खुद को कटघरे में खड़ा महसूस कर रहे हैं। मजार की सेवादार कैसेर जहां बताती हैं कि यह मजार नवाबों के जमाने से है। यहां आने वाले मरीज इलाज के साथ दुआ भी मांगते हैं। उनका दावा है कि कई डॉक्टरों और मरीजों ने खुद मजार की मरम्मत के लिए पैसे दिए। क्वीन मेरी के सामने बनी मजार पर उर्स का दावा क्वीन मेरी अस्पताल के सामने बनी मजार के संचालक मोहम्मद शकील कहते हैं कि यहां हर साल उर्स लगता है और हिंदू-मुस्लिम सभी समुदाय के लोग आते हैं। उनका कहना है कि पहली बार मजार हटाने का नोटिस मिला है और वे इसे गैरकानूनी मानते हैं। हालांकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि अब प्रशासन से टकराव की स्थिति बन चुकी है। अब पढ़िए मजारों का पक्ष लेने वालों की बातें… ‘चयनात्मक कार्रवाई और तहजीब पर हमला’ शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद का आरोप है कि सरकार और प्रशासन दोहरा मापदंड अपना रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब थानों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बने धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई नहीं होती, तो सिर्फ मजारों को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है। मजार विश्वविद्यालय बनने से पहले की हैं सैयद बाबर अशरफ ने KGMU प्रशासन पर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नोटिस देने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि जिन मजारों को नोटिस दिया गया है, वे विश्वविद्यालय बनने से पहले की हैं और इन्हें हटाना कानून के खिलाफ है। उन्होंने इसे लखनऊ की गंगा-जमुनी सांस्कृतिक विरासत पर सीधा हमला बताया। राजनीति की एंट्री: सड़क से सदन तक विरोध मामले में राजनीति भी खुलकर सामने आ गई है। सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने कहा- मजारों को हटाने की कोशिश माहौल खराब करने की साजिश है। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी धार्मिक स्थल को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हुई तो इसका विरोध सड़क पर होगा। उन्होंने बीते दिनों मौलाना की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी कह दिया था कि मजार पर बुलडोजर चलने से पहले मेरे ऊपर से गुजरेगा। मजारों पर कार्रवाई नहीं होने देंगे। KGMU प्रशासन का पक्ष: मरीजों को होती है परेशानी KGMU प्रशासन का कहना है कि पूरे विवाद को धार्मिक रंग देना गलत है। प्रवक्ता डॉ. केके सिंह के अनुसार समीना शाह साहब की मजार और हलमैन साहब की दरगाह को कोई नोटिस नहीं दिया गया है। नोटिस केवल उन मजारों को जारी किए गए हैं, जो हाल के वर्षों में बनीं या जिनका तेजी से विस्तार हुआ। प्रशासन के मुताबिक मजारों और उनसे जुड़ी दुकानों के कारण करीब 30 हजार वर्ग फीट जमीन पर अवैध कब्जा है। शाहमीना मजार परिसर में लगभग 40 दुकानें संचालित हो रही हैं, जहां मरीजों और तीमारदारों से सामान्य से ज्यादा पैसे वसूले जाने की शिकायतें हैं। कर्मचारियों के साथ हाथापाई की घटनाएं भी हुई हैं। अब पढ़िए अस्पताल की ग्राउंड रियलिटी… एम्बुलेंस, जाम और अव्यवस्था मजारों के चलते अस्पताल परिसर में जाम के हालात रहते हैं। क्वीन मेरी अस्पताल के मुख्य गेट के सामने बनी मजार के कारण एम्बुलेंस को खड़ा करने की पर्याप्त जगह नहीं बचती। ट्रॉमा सेंटर और अन्य विभागों के पास बनी मजारों से मरीजों और तीमारदारों की आवाजाही बाधित होती है। कुछ जगहों पर शाम होते ही संदिग्ध गतिविधियों की शिकायतें भी सामने आती हैं। हालांकि मजार से जुड़े लोग इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं, लेकिन प्रशासन का कहना है कि अस्पताल परिसर में किसी भी तरह की अव्यवस्था स्वीकार्य नहीं है। कितनी जमीन, कितनी आबादी प्रभावित KGMU के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अलग-अलग मजारों और उनसे जुड़े ढांचों के कारण हजारों वर्ग फीट जमीन पर कब्जा है। इन इलाकों के आसपास सैकड़ों लोग रहते या काम करते हैं। दुकानदार, सेवादार और अस्थायी कर्मचारी। मजार हटाने की स्थिति में इन लोगों के रोजगार और ठिकाने पर भी असर पड़ेगा, जिसे लेकर प्रशासन के पास अभी कोई स्पष्ट पुनर्वास योजना नहीं है। मजार हटाने के बाद क्या चाहता है KGMU नेत्र विभाग के पीछे की बनी मजार परिसर में 2025 में KGMU प्रशासन ने कार्रवाई की थी। यहां की अवैध दुकानों और झुग्गी-झोपड़ियों को तोड़कर हटा दिया। मजार को यथावत छोड़ दिया गया। स्थिति यह है कि शाम होते ही यहां संदिग्ध तत्वों का आना-जाना शुरू हो जाता है, जिससे KGMU कैंपस की सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर चिंता बनी रहती है। KGMU प्रशासन का कहना है कि मजारों के हटने के बाद उस जमीन का उपयोग अस्पताल की सुविधाएं बढ़ाने, एम्बुलेंस मूवमेंट, पार्किंग और नए विभागों के विस्तार के लिए किया जाएगा। प्रशासन का दावा है कि यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत की जा रही है और इसका मकसद केवल स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु बनाना है।

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