ग्वालियर के महाराज बाड़ा, जहां आज सेंट्रल लाइब्रेरी है और युवा अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए आते हैं, लेकिन 100 साल पहले यहां रियासत काल में अदालत लगा करती है। बताया जाता है कि यहां बड़े व गंभीर मुद्दों पर अदालत में सुनवाई होती थी। यह पूरी इमारत पत्थर से बनी है। दूसरी मंजिल पर कोर्ट लगती थी, जबकि पहली मंजिल पर सजायाफ्ता खतरनाक कैदियों के लिए काल कोठरी बनी हुई है। जिसके साक्ष्य आज भी मौजूद हैं और इन्हें देखने के लिए पर्यटक भी आते हैं। जिस भाग में कैदियों को रखा जाता था वहां रोशनी जाना तो दूर की बात हवा का दबाव भी कम होता था। युवा पीढ़ी को तो अभी इस अदालत के बारे में कुछ पता नहीं है।
100 वर्ष पूर्व लगती थी न्याय की अदालत
सेंट्रल लाइब्रेरी के प्रबंधक विवेक कुमार सोनी ने बताया कि ये लाइब्रेरी ऐतिहासिक है। साथ ही 1928 में इस भवन में लाइब्रेरी की स्थापना की गई थी। इतिहासकार भी बताते हैं और कुछ ऐसे प्रमाण भी हैं। जिनमें यह पता चलता है कि इस इमारत के ऊपरी हिस्से में न्यायालय लगा करता था और निचले हिस्से में सजायाफ्ता कैदियों को रखा जाता था। इन काल कोठरियों के साक्ष्य आज भी देखने को मिलते हैं। सूरज की रोशनी छोड़िए, हवा तक पहुंचना मुश्किल
इस इमारत के निचले हिस्से में बिना रोशनी के जाना बेहद मुश्किल है। बिना रोशनी के ये कारागृह आज भी उस समय की क्रूर सजाओ की गवाही देते नजर आ रहे हैं। कार कोठरियों में लगे लोहे और पत्थर के दरवाजे हैं, जिन्हें खोलना किसी एक व्यक्ति के बस की तो बात नहीं है। इतना ही नहीं इन काल कोठरी में सूरज की रोशनी तो छोड़िए हवा तक जाना ना मुश्किल सा लगता है। यही कारण है कि यहां बंद गंभीर अपराधों के कैदी ऑक्सीजन दबाव के चलते न कुछ सोच पाते थे न ही कुछ समझ पाते थे। कई बार गर्मियों के समय में ऑक्सीजन का दबाव भी यहां कम हो जाता है। इसलिए इसे भंडार गृह के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। इसमें सैकड़ों साल पुराने साहित्य को सहेज कर रखा गया है।
पत्थरों से बनी दीवारें और छत
इस भवन की काल कोठरियों की कैद से निकलना मुश्किल हो नहीं नामुमकिन था। क्योंकि इस कैदखाने का लगभग पूरा हिस्सा पत्थरों से बना हुआ था। इन काल कोठरी की दीवारों से लेकर छत और यहां तक को दरवाजे भी पत्थर से बने हुए थे। इस जेल में कैदी के आने के बाद सजा खत्म होने से पहले निकलना नामुमकिन ही था। इतना ही नहीं इन पत्थरों में जो फॉर्सेल्स नजर आ रहे हैं, वे भी इसकी प्राचीनता को दर्शा रहे हैं। लाइब्रेरी को दिया गया है डिजिटल लुक
तकरीबन 100 साल पुराने इस पुस्तकालय का नवीनीकरण स्मार्ट सिटी द्वारा किया गया था। जिसके बाद यहां अति प्राचीन किताबों को संग्रह किया गया। साथ ही इन किताबों को स्कैनिंग कर अब इंटरनेट के माध्यम से छात्र-छात्राओं को उपलब्ध कराया जा रहा है। जिसके माध्यम से इन काल कोठरियों में एकत्रित ज्ञान का लाभ लेकर बच्चे अपने भविष्य को सवार रहे हैं।
संविधान की मूल प्रति आज भी संरक्षित
लाइब्रेरी के प्रबंधक विवेक सोनी ने बताया कि संविधान की 16 मूल प्रतियां हैं। जिनमें से एक प्रति ग्वालियर के केंद्रीय पुस्तकालय में रखी हुई है। जो साल में तीन बार आमजन के लिए निकाली जाती है. इसकी प्रति को 31 मार्च 1956 को ग्वालियर लाया गया था। जिसमें कुल 231 पेज हैं। जिसमें संविधान कमेटी के लगभग सभी सदस्यों के हस्ताक्षर भी मौजूद हैं। यह पुस्तक पूरी तरह से हस्तलिखित हैं। आपको बता दें कि कुछ वर्ष पूर्व तक इस किताब को छूकर व इसके पन्नों को पलट कर देखा जा सकता था, लेकिन किन्हीं गतिविधियों के चलते अब इसे बड़ी स्क्रीन पर डिजिटल रूप में दिखाया जाता है।


