झारखंड की आवाज को देश का तीसरा बड़ा सम्मान:दिशोम गुरु हुए अब पद्मभूषण शिबू सोरेन, जल, जंगल, जमीन के लिए किया संघर्ष

झारखंड की आवाज को देश का तीसरा बड़ा सम्मान:दिशोम गुरु हुए अब पद्मभूषण शिबू सोरेन, जल, जंगल, जमीन के लिए किया संघर्ष

झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता, झारखंड राज्य के निर्माता और आदिवासी अधिकारों के प्रतीक रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण देने की घोषणा की गई है। यह झारखंड के लिए ऐतिहासिक और गौरव का क्षण है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर रविवार को जारी पद्म पुरस्कारों की सूची में उन्हें पद्मभूषण के लिए चुना है। इस वर्ष कुल 13 हस्तियों को पद्मभूषण से सम्मानित किया जाएगा। हाल ही में शिबू सोरेन को भारत रत्न देने की मांग भी उठी थी। झारखंड विधानसभा ने बीते सत्र में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। अब पद्मभूषण के रूप में राष्ट्र ने उनके संघर्ष और योगदान को सम्मानित किया है। शिबू सोरेन को यह सम्मान उनकी समर्पित सार्वजनिक सेवा, आदिवासी अधिकारों के संघर्ष, झारखंड राज्य के गठन और सामाजिक न्याय के लिए दशकों लंबे योगदान के लिए दिया जाएगा। उन्होंने जनजातीय समाज, गरीबों और वंचित वर्गों की आवाज को संसद से सड़क तक बुलंद किया। शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। 81 वर्ष की उम्र में 4 अगस्त 2025 को उनका निधन हुआ। वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक नेताओं में से एक रहे और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। जल-जंगल-जमीन को बनाया संघर्ष का मूल आधार शिबू सोरेन ने बचपन से ही आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार, जमींदारी शोषण और विस्थापन को बहुत नजदीक से देखा। यही अनुभव उनके जीवन की दिशा तय करने वाला बना। युवा अवस्था में ही वे आदिवासी अधिकार आंदोलन से जुड़े और जल्द ही एक जुझारू नेता के रूप में उभरे। 1970 में ‘धान काटो आंदोलन’ के जरिए उन्होंने महाजनों-जमींदारों के खिलाफ मोर्चा खोला। गरीब और आदिवासियों की जमीन हड़पने वालों के खेतों की फसल सामूहिक ताकत से कटवाई। 1980 के दशक में जब खनन, उद्योग और वन कानूनों के नाम पर आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही थी, तब उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित किया। जल, जंगल, जमीन को आदिवासी अस्तित्व का मूल आधार बताया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के माध्यम से उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया। 1990 के दशक में उन्होंने संसद में सवाल उठाया-खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र का आदिवासी गरीब क्यों है? दशकों के संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड बना। 5 बड़े काम… जिससे मिली सफलता और सम्मान अबुआ राज… महाजन के आदिवासी जमीन पर किए कब्जे को मुक्त कराया शिबू सोरेन ने आदिवासियों की जमीन व महिलाओं के सम्मान के लिए ‘आ​दिवासी सुधार समिति’बनाई। महाजनों के खिलाफ संघर्ष छेड़ा। महाजनों ने जिन आदिवासी जमीनों पर कब्जा कर रखा था, उसे मुक्त कराया और बिरसा मुंडा के नारे ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ को सार्थक किया। नशे के विरोधी… लोगों को समझाते कि शराब और हड़िया से दूर रहो गुरुजी शुद्ध शाकाहारी और नशे के विरोधी थे। वे हड़िया-दारू के खिलाफ लोगों को जागरूक करते रहे। कहते थे कि दारू पिलाकर कागजात पर ठेपा लगाकर उनकी जमीन पर महाजन कब्जा कर रहे हैं। शराब मत पीयो। कई बार तो गुरुजी शराब पीने वालों को पीटते भी थे। सर्वधर्म समभाव… हर धर्म के लोगों को झारखंड आंदोलन से जोड़कर रखा झारखंड आंदोलन के समय उन्होंने कहा था कि यह किसी धर्म का आंदोलन नहीं है। इसमें सभी शामिल होंगे। तभी आंदोलनकारियों में हिंदू, मुस्लिम, सरना, ईसाई ही नहीं, सिख और जैन समाज ने भी योगदान दिया। वे कहते थे कि साथ रहेंगे तभी झारखंड मिलेगा। पर्यावरण प्रेमी… पौधे लगाने का महत्व बताते थे गुरुजी ने लंबा समय जंगलों में बिताया। पेड़-पौधों से उन्हें बहुत लगाव था। उनके आंदोलन की शुरुआत जंगलों से पेड़ काटने वाले ठेकेदारों का विरोध करने से हुई थी। बाद में वे टुंडी के पास पलमा में आश्रम बनाकर रहने लगे। लोगों को पेड़ लगाने का संदेश देने लगे। शिक्षा सर्वोपरि… रात्रि पाठशाला शुरू की शिबू सोरेन वर्षों तक जंगल-पहाड़ के लोगों के बीच रहे। उनकी समस्याएं देख जाना कि अनपढ़ आदिवासियों को महाजन बरगला कर उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं। रात्रि पाठशाला की शुरुआत कर लोगों को पढ़ाने भी लगे। जमीन से जुड़े रहे… गांवों में बसती थी आत्मा कोल्हान गुरुजी की कर्मभूमि रही : शिबू सोरेन का अलग राज्य के लिए आंदोलन हो या सामाजिक कार्य, उनकी कर्मभूमि कोल्हान ही रही। आंदोलन के दौरान समर्थकों को बचाने और पुलिस की लुकाछिपी में वे यहीं शरण लेते थे। बोकारो में धरतीपुत्र बने : गुरुजी जब भी बोकारो या इसके आसपास होते, उनका मन यहीं बसता। सुबह की शुरुआत खेतों की सैर से होती, किस पेड़ पर क्या फल आया? गायों को चारा मिला या नहीं? किस क्यारी में सब्जी कम है? इन सवालों के जवाब वे खुद खोजते। धनबाद में मिली गुरुजी की उपाधि : टुंडी प्रखंड का पोखरिया गांव.. यहां बिजली नहीं थी। गुरुजी लालटेन की रोशनी में महिला- पुरुषों को अक्षर ज्ञान, सामूहिक खेती व पशुपालन के बारे में बताते। यहीं शिबू लोगों को पढ़ाकर ‘गुरुजी’ बने। गिरिडीह में सामाजिक क्रांति लाई : वर्ष 1979 में जब आंदोलन के प्रमुख नेता विनोद बिहारी महतो गिरिडीह जेल में बंद थे। तब शिबू ने ऐलान किया था कि 4 मार्च 1980 को गिरिडीह जेल की खुदाई होगी। उस दौर में यह आंदोलन सामाजिक क्रांति बन चुका था। जामताड़ा में महाजनी प्रथा के खिलाफ बिगुल फूंका : गुरुजी ने जामताड़ा जिले के चिरूडीह गांव में महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका था। वर्ष 1975 में चिरूडीह गांव के महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन ने झारखंड की राजनीति की दिशा भी बदल दी। दुमका में शेड में जनसमस्याएं सुनते : ‘गुरुजी’ ने जिस दुमका को आदिवासी आंदोलन का केंद्र बनाया। जब भी गुरुजी यहां आते थे, पार्टी कार्यकर्ताओं का तांता लगा रहता था। शेड में गुरुजी पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ लोगों की समस्याएं भी सुनते थे। झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता, झारखंड राज्य के निर्माता और आदिवासी अधिकारों के प्रतीक रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण देने की घोषणा की गई है। यह झारखंड के लिए ऐतिहासिक और गौरव का क्षण है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर रविवार को जारी पद्म पुरस्कारों की सूची में उन्हें पद्मभूषण के लिए चुना है। इस वर्ष कुल 13 हस्तियों को पद्मभूषण से सम्मानित किया जाएगा। हाल ही में शिबू सोरेन को भारत रत्न देने की मांग भी उठी थी। झारखंड विधानसभा ने बीते सत्र में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। अब पद्मभूषण के रूप में राष्ट्र ने उनके संघर्ष और योगदान को सम्मानित किया है। शिबू सोरेन को यह सम्मान उनकी समर्पित सार्वजनिक सेवा, आदिवासी अधिकारों के संघर्ष, झारखंड राज्य के गठन और सामाजिक न्याय के लिए दशकों लंबे योगदान के लिए दिया जाएगा। उन्होंने जनजातीय समाज, गरीबों और वंचित वर्गों की आवाज को संसद से सड़क तक बुलंद किया। शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। 81 वर्ष की उम्र में 4 अगस्त 2025 को उनका निधन हुआ। वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक नेताओं में से एक रहे और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। जल-जंगल-जमीन को बनाया संघर्ष का मूल आधार शिबू सोरेन ने बचपन से ही आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार, जमींदारी शोषण और विस्थापन को बहुत नजदीक से देखा। यही अनुभव उनके जीवन की दिशा तय करने वाला बना। युवा अवस्था में ही वे आदिवासी अधिकार आंदोलन से जुड़े और जल्द ही एक जुझारू नेता के रूप में उभरे। 1970 में ‘धान काटो आंदोलन’ के जरिए उन्होंने महाजनों-जमींदारों के खिलाफ मोर्चा खोला। गरीब और आदिवासियों की जमीन हड़पने वालों के खेतों की फसल सामूहिक ताकत से कटवाई। 1980 के दशक में जब खनन, उद्योग और वन कानूनों के नाम पर आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही थी, तब उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित किया। जल, जंगल, जमीन को आदिवासी अस्तित्व का मूल आधार बताया। झारखंड मुक्ति मोर्चा के माध्यम से उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया। 1990 के दशक में उन्होंने संसद में सवाल उठाया-खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र का आदिवासी गरीब क्यों है? दशकों के संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड बना। 5 बड़े काम… जिससे मिली सफलता और सम्मान अबुआ राज… महाजन के आदिवासी जमीन पर किए कब्जे को मुक्त कराया शिबू सोरेन ने आदिवासियों की जमीन व महिलाओं के सम्मान के लिए ‘आ​दिवासी सुधार समिति’बनाई। महाजनों के खिलाफ संघर्ष छेड़ा। महाजनों ने जिन आदिवासी जमीनों पर कब्जा कर रखा था, उसे मुक्त कराया और बिरसा मुंडा के नारे ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ को सार्थक किया। नशे के विरोधी… लोगों को समझाते कि शराब और हड़िया से दूर रहो गुरुजी शुद्ध शाकाहारी और नशे के विरोधी थे। वे हड़िया-दारू के खिलाफ लोगों को जागरूक करते रहे। कहते थे कि दारू पिलाकर कागजात पर ठेपा लगाकर उनकी जमीन पर महाजन कब्जा कर रहे हैं। शराब मत पीयो। कई बार तो गुरुजी शराब पीने वालों को पीटते भी थे। सर्वधर्म समभाव… हर धर्म के लोगों को झारखंड आंदोलन से जोड़कर रखा झारखंड आंदोलन के समय उन्होंने कहा था कि यह किसी धर्म का आंदोलन नहीं है। इसमें सभी शामिल होंगे। तभी आंदोलनकारियों में हिंदू, मुस्लिम, सरना, ईसाई ही नहीं, सिख और जैन समाज ने भी योगदान दिया। वे कहते थे कि साथ रहेंगे तभी झारखंड मिलेगा। पर्यावरण प्रेमी… पौधे लगाने का महत्व बताते थे गुरुजी ने लंबा समय जंगलों में बिताया। पेड़-पौधों से उन्हें बहुत लगाव था। उनके आंदोलन की शुरुआत जंगलों से पेड़ काटने वाले ठेकेदारों का विरोध करने से हुई थी। बाद में वे टुंडी के पास पलमा में आश्रम बनाकर रहने लगे। लोगों को पेड़ लगाने का संदेश देने लगे। शिक्षा सर्वोपरि… रात्रि पाठशाला शुरू की शिबू सोरेन वर्षों तक जंगल-पहाड़ के लोगों के बीच रहे। उनकी समस्याएं देख जाना कि अनपढ़ आदिवासियों को महाजन बरगला कर उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं। रात्रि पाठशाला की शुरुआत कर लोगों को पढ़ाने भी लगे। जमीन से जुड़े रहे… गांवों में बसती थी आत्मा कोल्हान गुरुजी की कर्मभूमि रही : शिबू सोरेन का अलग राज्य के लिए आंदोलन हो या सामाजिक कार्य, उनकी कर्मभूमि कोल्हान ही रही। आंदोलन के दौरान समर्थकों को बचाने और पुलिस की लुकाछिपी में वे यहीं शरण लेते थे। बोकारो में धरतीपुत्र बने : गुरुजी जब भी बोकारो या इसके आसपास होते, उनका मन यहीं बसता। सुबह की शुरुआत खेतों की सैर से होती, किस पेड़ पर क्या फल आया? गायों को चारा मिला या नहीं? किस क्यारी में सब्जी कम है? इन सवालों के जवाब वे खुद खोजते। धनबाद में मिली गुरुजी की उपाधि : टुंडी प्रखंड का पोखरिया गांव.. यहां बिजली नहीं थी। गुरुजी लालटेन की रोशनी में महिला- पुरुषों को अक्षर ज्ञान, सामूहिक खेती व पशुपालन के बारे में बताते। यहीं शिबू लोगों को पढ़ाकर ‘गुरुजी’ बने। गिरिडीह में सामाजिक क्रांति लाई : वर्ष 1979 में जब आंदोलन के प्रमुख नेता विनोद बिहारी महतो गिरिडीह जेल में बंद थे। तब शिबू ने ऐलान किया था कि 4 मार्च 1980 को गिरिडीह जेल की खुदाई होगी। उस दौर में यह आंदोलन सामाजिक क्रांति बन चुका था। जामताड़ा में महाजनी प्रथा के खिलाफ बिगुल फूंका : गुरुजी ने जामताड़ा जिले के चिरूडीह गांव में महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका था। वर्ष 1975 में चिरूडीह गांव के महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन ने झारखंड की राजनीति की दिशा भी बदल दी। दुमका में शेड में जनसमस्याएं सुनते : ‘गुरुजी’ ने जिस दुमका को आदिवासी आंदोलन का केंद्र बनाया। जब भी गुरुजी यहां आते थे, पार्टी कार्यकर्ताओं का तांता लगा रहता था। शेड में गुरुजी पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ लोगों की समस्याएं भी सुनते थे।  

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