Republic Day Special: ‘चौखट पर दीये जलते ही रहे, कुछ राम कभी लौटे ही नहीं…’सरहद से बस वर्दी और यादें ही लौटीं’

Republic Day Special: ‘चौखट पर दीये जलते ही रहे, कुछ राम कभी लौटे ही नहीं…’सरहद से बस वर्दी और यादें ही लौटीं’

Martyrs Live Forever: जयपुर। ‘कुछ दर्द कभी सोते ही नहीं, वनवास खत्म होते ही नहीं। चौखट पर दीये जलते ही रहे, कुछ राम कभी लौटे ही नहीं…’ बॉर्डर-2 फिल्म के गीत मिट्टी के बेटे की ये पंक्तियां राजस्थान के उन शहीदों की याद दिलाती हैं, जिनकी दुश्मन से मुकाबले में शहादत की खबर तो घर पहुंची, लेकिन उनकी देह कभी नहीं लौटी।

परिजनों के हिस्से आईं तो बस कुछ निशानियां और जीवनभर का इंतजार। कई दशकों से इतिहास में दर्ज उन वीरों की वीरांगनाएं आज भी उन आखिरी पलों की स्मृतियों, बची-खुची निशानियों और अनकहे सवालों के सहारे जीवन गुजार रही हैं। उन्हें आज भी उनके अपने का घर लौट आने का इंतजार है।

61 साल से पति के लौटने का इंतजार, विवाहिता बनकर जी रही जिंदगी

जयपुर जिले के बधाल निवासी शहीद नायब सूबेदार भंवर सिंह शेखावत भारतीय सेना की 20 लांसर यूनिट में थे। भारत-पाक युद्ध के दौरान 2 सितंबर 1965 को वे पाकिस्तानी सेना की रैकी के लिए आगे बढ़ रहे थे। तभी हमले में वे शहीद हो गए। शहादत की सूचना और कुछ सामान तो उनके घर पहुंचा, लेकिन उनकी देह कभी नहीं लौटी।

शहीद नायब सूबेदार भंवर सिंह शेखावत, वीरांगना दरियाव कंवर

पीछे रह गईं उनकी वीरांगना दरियाव कंवर, जो बीते 61 वर्ष से आज भी अपने पति के लौट आने की राह देख रही हैं। उनके परिजनों का कहना है कि भले ही भंवर सिंह शेखावत का नाम इतिहास में अमर हो गया हो, लेकिन उनकी पत्नी आज भी विवाहिता की तरह जीवन जी रही हैं। उन्हें आज भी यही विश्वास है कि उनके पति जीवित हैं। यही उम्मीद उनका संबल है, यही प्रतीक्षा उनकी पूरी जिंदगी है।

कम उम्र में मिला बड़ा दर्द, यादों के सहारे बीत रहा वक्त

शहीद प्रहलाद सिंह वर्ष 1986 में भारतीय सेना में महज 18 साल की उम्र में भर्ती हो गए थे। दो साल बाद श्रीलंका में ऑपरेशन पवन के दौरान उनके ट्रक पर बम गिराए जिसमें वे वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी शादी हुए दो वर्ष ही बीते थे।

शहीद प्रहलाद सिंह,वीरांगना सम्पत कंवर

जयपुर में भावुक स्वर में उनकी वीरांगना सम्पत कंवर ने बताया कि पति की शहादत पर उन्हें गर्व है लेकिन, उन्हें कम उम्र में ही जीवनभर का बड़ा दर्द मिलने का दुख भी है। यहां तक किए उन्हें अंतिम दर्शन भी नहीं हो गए। ये सबसे बड़ा दर्द है। केवल उनका सामान, वर्दी ही घर पहुंची थी। अब उनकी यादों के सहारे ही हर पल बीत रहा है। मन में कई बातें थी, जो दबी की दबी रह गई। कई सपने थे। सब छूट और टूट गए।

शादी के 6 महीने बाद ही हो गए शहीद, हर पल खलती है कमी

झुंझुनूं जिले के धनुरी गांव निवासी 19 वर्षीय सिपाही शहीद जाफर अली खान को सेना में भर्ती हुए करीब डेढ़ साल ही बीते थे कि वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया। उस समय वे जम्मू-कश्मीर में तैनात थे और टैंक ड्यूटी पर थे। युद्ध के दौरान ऑपरेशन रक्षक में दुश्मन का एक गोला सीधे उनके ऊपर गिरा। जिसमें वे शहीद हो गए। उनका शरीर पूरी तरह क्षत-विक्षत हो गया। उनका शव घर नहीं भेजा जा सका। उन्हें पंजाब के फाजिल्का में दफनाया गया।

शहीद सिपाही जाफर अली खान, वीरांगना मुमताज बानो

उनकी वीरांगना मुमताज बानो ने बताया कि शहादत के समय उनकी शादी को महज छह महीने ही हुए थे। दोनों ने मिलकर कई सपने संजोए थे, लेकिन सब याद बनकर रह गए। पिछले 55 वर्ष से वे उन्हीं यादों के सहारे जीवन जी रही हैं। ईद हो या कोई भी त्योहार या कोई खुशी का अवसर हर पल उन्हें उनकी कमी खलती है।

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