सहरसा के सत्तरकटैया प्रखंड अंतर्गत आरण गांव निवासी शहीद कुंदन कुमार यादव की शहादत को छह वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उनके परिवार का संघर्ष आज भी जारी है। देश की सीमा की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर सपूत के परिजन अब भी सरकार द्वारा किए गए वादों के पूरा होने की राह देख रहे हैं। शहादत के बाद हुए बड़े-बड़े ऐलान जमीन पर उतरते नजर नहीं आ रहे, जिससे शहीद के परिवार को लगातार दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। देशसेवा का जज्बा, 2012 में सेना में भर्ती शहीद कुंदन कुमार यादव, निमेंद्र यादव के दो बेटों में सबसे छोटे थे। बचपन से ही उनमें देशसेवा का जुनून था। वर्ष 2012 में उन्होंने बिहार रेजीमेंट की 16वीं बटालियन में बतौर सिपाही भारतीय सेना ज्वाइन की। सेना में चयन के बाद गांव में खुशी का माहौल था। परिजनों को गर्व था कि उनका बेटा देश की सेवा करेगा। अरुणाचल से लद्दाख तक निभाई जिम्मेदारी सेना में शामिल होने के बाद कुंदन की पहली तैनाती अरुणाचल प्रदेश में हुई, जो दुर्गम और संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। इसके बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर में भी अपनी सेवाएं दीं। देश की सुरक्षा के लिए उन्होंने लद्दाख जैसे अत्यंत चुनौतीपूर्ण इलाके में भी ड्यूटी निभाई, जहां हर दिन जोखिम भरा होता है। साथी जवानों के अनुसार कुंदन बेहद अनुशासित और साहसी सैनिक थे। पैंगोंग त्सो में भारत-चीन झड़प, देश के लिए दी जान 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो झील क्षेत्र के नॉर्थ बैंक इलाके में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसी झड़प में कुंदन कुमार यादव वीरगति को प्राप्त हुए। इस घटना में भारत ने अपने कई जांबाज सपूत खो दिए थे। कुंदन की शहादत की खबर जैसे ही गांव पहुंची, पूरे इलाके में मातम छा गया। हर आंख नम थी और हर जुबान पर शहीद कुंदन का नाम। शहादत के बाद किया गया जमीन देने का वादा शहीद कुंदन यादव की शहादत के बाद सरकार की ओर से उनके परिवार को पांच कट्ठा जमीन देने का वादा किया गया था। कहा गया था कि यह जमीन परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दी जाएगी। उस वक्त परिजनों को उम्मीद बंधी थी कि सरकार उनके बलिदान को सम्मान देगी। छह साल बाद भी कागजों में अटका आश्वासन लेकिन शहादत के छह साल बीत जाने के बावजूद यह वादा अब तक पूरा नहीं हो सका है। शहीद के परिजन आज भी जिला मुख्यालय से लेकर पटना तक अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। कभी फाइल लंबित होने की बात कही जाती है, तो कभी प्रक्रिया पूरी न होने का हवाला दिया जाता है। परिजनों का कहना है कि हर बार सिर्फ आश्वासन मिलता है, लेकिन जमीन अब तक नहीं मिली। पत्नी को नौकरी, लेकिन परिवार की मुश्किलें बरकरार सरकार की ओर से शहीद की पत्नी बेबी कुमारी को सहरसा के DCLR कार्यालय में लिपिक के पद पर नौकरी जरूर दी गई है। यह नौकरी परिवार के लिए एक सहारा बनी है, लेकिन इससे सभी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। बेबी कुमारी का कहना है कि नौकरी के साथ बच्चों की परवरिश और भविष्य की चिंता लगातार बनी रहती है। अगर जमीन का वादा पूरा हो जाता, तो परिवार को स्थायी सुरक्षा मिल सकती थी। दो मासूम बेटे, पिता की शहादत पर गर्व शहीद कुंदन यादव के दो छोटे बेटे हैं, 9 साल की रोशन और 6 साल का राणा। दोनों अपने पिता को कहानियों और तस्वीरों में देखते हैं। गांव के लोग और परिजन उन्हें बताते हैं कि उनके पिता देश के लिए शहीद हुए थे। बच्चे गर्व महसूस करते हैं, लेकिन पिता की कमी हर पल उन्हें और परिवार को खलती है। ग्रामीणों में नाराजगी, उठ रहे सवाल आरण गांव के लोग भी इस बात से नाराज हैं कि शहीद के नाम पर किए गए वादे पूरे नहीं हो रहे। ग्रामीणों का कहना है कि शहादत के समय नेता और अधिकारी पहुंचकर बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन समय बीतते ही सब भूल जाते हैं। इससे शहीदों के परिवारों का मनोबल टूटता है। क्या शहीदों के वादे सिर्फ फाइलों तक सीमित रहेंगे? देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद कुंदन कुमार यादव का परिवार आज भी सम्मान और हक की प्रतीक्षा में है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शहीदों के लिए किए गए सरकारी वादे कभी समय पर पूरे होंगे, या फिर ये आश्वासन भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएंगे। शहीद के परिजन चाहते हैं कि सरकार उनके साथ किया गया वादा जल्द पूरा करे, ताकि यह साबित हो सके कि देश अपने वीर सपूतों को सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में भी सम्मान देता है। सहरसा के सत्तरकटैया प्रखंड अंतर्गत आरण गांव निवासी शहीद कुंदन कुमार यादव की शहादत को छह वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उनके परिवार का संघर्ष आज भी जारी है। देश की सीमा की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर सपूत के परिजन अब भी सरकार द्वारा किए गए वादों के पूरा होने की राह देख रहे हैं। शहादत के बाद हुए बड़े-बड़े ऐलान जमीन पर उतरते नजर नहीं आ रहे, जिससे शहीद के परिवार को लगातार दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। देशसेवा का जज्बा, 2012 में सेना में भर्ती शहीद कुंदन कुमार यादव, निमेंद्र यादव के दो बेटों में सबसे छोटे थे। बचपन से ही उनमें देशसेवा का जुनून था। वर्ष 2012 में उन्होंने बिहार रेजीमेंट की 16वीं बटालियन में बतौर सिपाही भारतीय सेना ज्वाइन की। सेना में चयन के बाद गांव में खुशी का माहौल था। परिजनों को गर्व था कि उनका बेटा देश की सेवा करेगा। अरुणाचल से लद्दाख तक निभाई जिम्मेदारी सेना में शामिल होने के बाद कुंदन की पहली तैनाती अरुणाचल प्रदेश में हुई, जो दुर्गम और संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। इसके बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर में भी अपनी सेवाएं दीं। देश की सुरक्षा के लिए उन्होंने लद्दाख जैसे अत्यंत चुनौतीपूर्ण इलाके में भी ड्यूटी निभाई, जहां हर दिन जोखिम भरा होता है। साथी जवानों के अनुसार कुंदन बेहद अनुशासित और साहसी सैनिक थे। पैंगोंग त्सो में भारत-चीन झड़प, देश के लिए दी जान 15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो झील क्षेत्र के नॉर्थ बैंक इलाके में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसी झड़प में कुंदन कुमार यादव वीरगति को प्राप्त हुए। इस घटना में भारत ने अपने कई जांबाज सपूत खो दिए थे। कुंदन की शहादत की खबर जैसे ही गांव पहुंची, पूरे इलाके में मातम छा गया। हर आंख नम थी और हर जुबान पर शहीद कुंदन का नाम। शहादत के बाद किया गया जमीन देने का वादा शहीद कुंदन यादव की शहादत के बाद सरकार की ओर से उनके परिवार को पांच कट्ठा जमीन देने का वादा किया गया था। कहा गया था कि यह जमीन परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दी जाएगी। उस वक्त परिजनों को उम्मीद बंधी थी कि सरकार उनके बलिदान को सम्मान देगी। छह साल बाद भी कागजों में अटका आश्वासन लेकिन शहादत के छह साल बीत जाने के बावजूद यह वादा अब तक पूरा नहीं हो सका है। शहीद के परिजन आज भी जिला मुख्यालय से लेकर पटना तक अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। कभी फाइल लंबित होने की बात कही जाती है, तो कभी प्रक्रिया पूरी न होने का हवाला दिया जाता है। परिजनों का कहना है कि हर बार सिर्फ आश्वासन मिलता है, लेकिन जमीन अब तक नहीं मिली। पत्नी को नौकरी, लेकिन परिवार की मुश्किलें बरकरार सरकार की ओर से शहीद की पत्नी बेबी कुमारी को सहरसा के DCLR कार्यालय में लिपिक के पद पर नौकरी जरूर दी गई है। यह नौकरी परिवार के लिए एक सहारा बनी है, लेकिन इससे सभी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। बेबी कुमारी का कहना है कि नौकरी के साथ बच्चों की परवरिश और भविष्य की चिंता लगातार बनी रहती है। अगर जमीन का वादा पूरा हो जाता, तो परिवार को स्थायी सुरक्षा मिल सकती थी। दो मासूम बेटे, पिता की शहादत पर गर्व शहीद कुंदन यादव के दो छोटे बेटे हैं, 9 साल की रोशन और 6 साल का राणा। दोनों अपने पिता को कहानियों और तस्वीरों में देखते हैं। गांव के लोग और परिजन उन्हें बताते हैं कि उनके पिता देश के लिए शहीद हुए थे। बच्चे गर्व महसूस करते हैं, लेकिन पिता की कमी हर पल उन्हें और परिवार को खलती है। ग्रामीणों में नाराजगी, उठ रहे सवाल आरण गांव के लोग भी इस बात से नाराज हैं कि शहीद के नाम पर किए गए वादे पूरे नहीं हो रहे। ग्रामीणों का कहना है कि शहादत के समय नेता और अधिकारी पहुंचकर बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन समय बीतते ही सब भूल जाते हैं। इससे शहीदों के परिवारों का मनोबल टूटता है। क्या शहीदों के वादे सिर्फ फाइलों तक सीमित रहेंगे? देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद कुंदन कुमार यादव का परिवार आज भी सम्मान और हक की प्रतीक्षा में है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शहीदों के लिए किए गए सरकारी वादे कभी समय पर पूरे होंगे, या फिर ये आश्वासन भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएंगे। शहीद के परिजन चाहते हैं कि सरकार उनके साथ किया गया वादा जल्द पूरा करे, ताकि यह साबित हो सके कि देश अपने वीर सपूतों को सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में भी सम्मान देता है।


