PGI में 257 किलोमीटर दूर से लाकर ट्रांसप्लांट हुआ लीवर:चार स्टेट की पुलिस के कोआर्डीनेशन से बना ग्रीन कोरिडोर, पहली बार सड़क रास्ते पहुंचा लीवर

PGIMER चंडीगढ़ ने मेडिकल क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए दो मरीजों की जान बचाई है। सेहत टीमों ने पहली बार AIIMS ऋषिकेश से सड़क मार्ग के जरिए लीवर ट्रांसप्लांट किया, वहीं दुर्लभ और अत्यंत समय-संवेदनशील पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट को भी सफलतापूर्वक अंजाम देकर एक और मरीज को नया जीवन दिया। इसके लिए चंडीगढ़ से पंजाब, हरियाणा और फिर उत्तराखंड में जरूरत के अनुसार ग्रीन ट्रैफिक कॉरीडोर बनाया गया था। जिससे 257 किलोमीटर का सफर छह घंटे में तय कर पीजीआई की टीम ने दो जिंदगियां बचाई हैं। तेज ठंड, लगातार बारिश, तेज हवाएं, रातभर का लंबा सड़क सफर की चुनौतियों के बीच PGIMER के डॉक्टरों और प्रशासनिक टीम ने अद्भुत समन्वय और प्रतिबद्धता का परिचय दिया है। दुख से जन्मी जीवन की नई उम्मीद
42 वर्षीय रघु पासवान को 16 जनवरी 2026 को दो मंजिला इमारत से गिरने के बाद गंभीर हालत में AIIMS ऋषिकेश में भर्ती कराया गया था। उन्हें गंभीर ब्रेन इंजरी हुई और तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें ब्रेन डेड घोषित करना पड़ा। इस अपार दुख के क्षण में परिजनों ने अंगदान का साहसिक फैसला लेकर कई मरीजों की जिंदगी बचाने का रास्ता खोल दिया। रात 9 बजे निकली टीम, दोपहर में हुआ ट्रांसप्लांट
PGIMER की लीवर और पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट टीमें 22 जनवरी की रात 9 बजे चंडीगढ़ से ऋषिकेश के लिए रवाना हुईं। करीब 6 घंटे के लगातार सड़क सफर के बाद टीम सुबह 3 बजे AIIMS ऋषिकेश पहुंची और सीधे ऑपरेशन थिएटर में तैयारी शुरू की।
सुबह 9 बजे अंग निकाले गए और दोपहर 12 बजे प्रक्रिया पूरी हुई। इसके बाद तुरंत ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया और अंगों को वापस चंडीगढ़ लाया गया। दोपहर 3 बजे टीम PGIMER पहुंची और सीधे ऑपरेशन थिएटर में ट्रांसप्लांट शुरू कर दिया गया। पहली बार सड़क से लाया गया लीवर
जनरल सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रो. एल. कामन ने बताया कि यह पहला मौका था जब AIIMS ऋषिकेश से PGIMER तक लीवर को सड़क मार्ग से, वो भी खराब मौसम में, लाया गया ताकि अंग को नुकसान (इस्कीमिया टाइम) कम से कम हो। 12 घंटे की रेस में जीता पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट
रेनल ट्रांसप्लांट विभाग के प्रमुख प्रो. आशीष शर्मा ने बताया कि देश में पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट के बहुत कम केंद्र हैं, जबकि डायबिटीज के मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है।
पैंक्रियाज को 12 घंटे के भीतर ट्रांसप्लांट करना जरूरी होता है। दूरी ज्यादा होने के कारण चुनौती और बढ़ गई, लेकिन स्प्लिट टीम स्ट्रेटेजी अपनाकर सफलता मिली।
डॉक्टरों की एक टीम ने पैंक्रियाज निकाला, जबकि दूसरी टीम ने चंडीगढ़ में मरीज की सर्जरी पहले ही शुरू कर दी।
यह पैंक्रियाज 28 वर्षीय युवती को लगाया गया, जो 8 साल की उम्र से डायबिटीज से जूझ रही थी और रोज कई बार इंसुलिन लेनी पड़ती थी। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज तेजी से रिकवर कर रही है और इंसुलिन से मुक्त हो गई है। प्रशासनिक तालमेल बना सबसे बड़ा हथियार
इस पूरे ऑपरेशन के दौरान अस्पताल प्रशासन विभाग की भूमिका अहम रही।
डॉ. (मेजर) आरपीएस भोगल ने बताया कि कई राज्यों की पुलिस, ट्रैफिक विभाग, NOTTO, ROTTO और अस्पताल प्रशासन के बीच पल-पल का समन्वय जरूरी था।
PGIMER के सिक्योरिटी ऑफिसर संजीव कुमार ने अलग-अलग जिलों के पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर यह सुनिश्चित किया कि कोई भी वाहन पीछे न छूटे।
अंगदान और इंटर-स्टेट सहयोग की बड़ी मिसाल
यह ऑपरेशन न सिर्फ कई मरीजों के लिए जीवनदान साबित हुआ, बल्कि राज्यों के बीच अंग साझा करने और ट्रांसप्लांट समन्वय की एक बड़ी मिसाल भी बना। PGIMER ने दोहराया कि वह भविष्य में भी अंगदान जागरूकता, बेहतर ट्रांसपोर्ट सिस्टम और डोनर परिवारों के सम्मान के लिए लगातार काम करता रहेगा। देशभर में अंगों का हुआ आवंटन
THOA एक्ट 1994 और NOTTO–ROTTO नॉर्थ के दिशा-निर्देशों के तहत अंगों का पारदर्शी आवंटन किया गया। PGIMER चंडीगढ़: लीवर, पैंक्रियाज और एक किडनी, AIIMS दिल्ली: एक किडनी, आर्मी हॉस्पिटल (RR), दिल्ली: हृदय, अपोलो हॉस्पिटल, चेन्नई: फेफड़े दिए गए हैं। इस तरह एक व्यक्ति का अंगदान देश के अलग-अलग हिस्सों में कई जिंदगियों की सांस बन गया।

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