स्पोर्ट्स और एजुकेशन का तालमेल जरूरी, तभी बनेगा भारत स्पोर्टिंग नेशन: मांडविया

स्पोर्ट्स और एजुकेशन का तालमेल जरूरी, तभी बनेगा भारत स्पोर्टिंग नेशन: मांडविया

ग्वालियर. केंद्रीय युवा मामले एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने कहा कि स्पोर्ट्स और एजुकेशन को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। दोनों के समन्वय से ही भारत एक मजबूत स्पोर्टिंग नेशन बन सकता है। उन्होंने कहा कि अब नई खेल सुविधाएं खड़ी करने के बजाय मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर का प्रभावी उपयोग और बेहतर गवर्नेंस समय की जरूरत है।

डॉ. मांडविया शुक्रवार को लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान (एलएनआईपीई), ग्वालियर में आयोजित सेतु-2026 कार्यक्रम को वर्चुअल माध्यम से संबोधित कर रहे थे। उन्होंने विश्वविद्यालयों को खेल गतिविधियों का केंद्र बनाने पर जोर देते हुए कहा कि स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी और स्कूल स्तर तक स्पोर्ट्स गवर्नेंस की अवधारणा को लागू करना होगा।


देश में खेल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी नहीं

केंद्रीय खेल मंत्री ने कहा कि देश में खेल इंफ्रास्ट्रक्चर की कोई कमी नहीं है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, सेना, पुलिस, खेल फेडरेशन और अन्य संस्थानों के पास पर्याप्त सुविधाएं मौजूद हैं। जरूरत है इन संसाधनों के सही उपयोग और समन्वय की।


सुविधाएं ज्यादा, पदक कम क्यों?

डॉ. मांडविया ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर केवल इंफ्रास्ट्रक्चर ही सफलता का पैमाना होता, तो युगांडा, केन्या और तंजानिया जैसे छोटे देश ओलंपिक में 4-5 पदक कैसे जीत लेते? भारत में सुविधाएं ज्यादा हैं, लेकिन अपेक्षित पदक नहीं मिल पा रहे हैं। इसका कारण सिस्टम, कोचिंग, गवर्नेंस और नीति स्तर पर सुधार की आवश्यकता है।


ग्रासरूट से बने नीति ढांचे

उन्होंने कहा कि सेतु-2026 पहली बार ऐसा मंच है, जहां विश्वविद्यालयों के स्पोर्ट्स एक्सपर्ट, कोच और खेल विशेषज्ञ एक साथ बैठकर ग्रासरूट समस्याओं पर चर्चा कर रहे हैं। अक्सर नीतियां जमीनी हकीकत को समझे बिना बन जाती हैं, जिससे उनका प्रभाव सीमित रह जाता है। इसलिए जरूरी है कि नीतियां ग्रासरूट जरूरतों के आधार पर तैयार हों।


इंफ्रास्ट्रक्चर से ज्यादा जरूरी उसका सही उपयोग

खेल मंत्री ने झारखंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बड़ा खेल इंफ्रास्ट्रक्चर तो बना दिया गया, लेकिन संचालन और रखरखाव की स्पष्ट व्यवस्था नहीं की गई। यदि यह इंफ्रास्ट्रक्चर विश्वविद्यालयों को सौंप दिया जाता, तो हॉस्टल खिलाड़ी उपयोग में आते, मैदानों का नियमित इस्तेमाल होता और रखरखाव भी बेहतर होता। उन्होंने कहा कि इसी तरह की व्यावहारिक और टिकाऊ सोच के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।

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