अफगानिस्तान जंग पर ट्रम्प के बयान से नाराज यूरोपीय देशों:ट्रम्प बोले थे- NATO अफगान में लड़ाई से दूर रहा; ब्रिटिश PM बोले- यह सैनिकों का अपमान

अफगानिस्तान जंग पर ट्रम्प के बयान से नाराज यूरोपीय देशों:ट्रम्प बोले थे- NATO अफगान में लड़ाई से दूर रहा; ब्रिटिश PM बोले- यह सैनिकों का अपमान

ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अफगानिस्तान में यूरोपीय सैनिकों के बारे में दिए गए बयान को अपमानजनक और चौंकाने वाला बताया है। ट्रम्प ने फॉक्स नेटवर्क के एक इंटरव्यू में कहा था कि अमेरिका को कभी NATO गठबंधन की जरूरत नहीं पड़ी और यूरोपीय सहयोगी अफगानिस्तान में फ्रंट लाइन्स से पीछे रहे थे। उन्होंने दावा किया कि सहयोगी देशों ने कुछ सैनिक भेजे जरूर थे, लेकिन वे मुख्य लड़ाई से दूर रहे। इस बयान पर यूरोपीय देशों के नेताओं, पूर्व सैनिकों और शहीदों के परिवारों ने ट्रम्प के खिलाफ नाराजगी जताई। स्टार्मर ने शुक्रवार को कहा, “मैं राष्ट्रपति ट्रम्प के इन बयानों को अपमानजनक मानता हूं। इससे उन लोगों के परिजनों को बहुत दुख पहुंचा है जिन्होंने अफगानिस्तान में अपनी जान गंवाई या घायल हुए।” उन्होंने आगे कहा कि अगर खुद उन्होंने ऐसा कोई गलत बयान दिया होता तो वे लोगों से माफी मांगते। ब्रिटेन ने अफगानिस्तान युद्ध में 457 सैनिक खोए, जो 1950 के दशक के बाद सबसे घातक विदेशी युद्ध था।
ब्रिटिश प्रिंस हैरी ने कहा कि नाटो सैनिकों के बलिदान को सच्चाई और सम्मान के साथ याद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘मैं वहां सेवा दे चुका हूं। मैंने वहां आजीवन दोस्त बनाए और वहां दोस्त खोए भी।’ दो बार अफगानिस्तान में तैनात हो चुके प्रिंस हैरी प्रिंस हैरी ब्रिटेन के राजा चार्ल्स III के छोटे बेटे हैं और वे वेल्स के प्रिंस विलियम के छोटे भाई हैं। वे ड्यूक ऑफ ससेक्स के खिताब से जाने जाते हैं। प्रिंस हैरी ने ब्रिटिश आर्मी में सेवा की थी और उन्होंने अफगानिस्तान में दो बार तैनाती की थी। वे अपाचे हेलीकॉप्टर पायलट के रूप में काम कर चुके हैं। अफगानिस्तान युद्ध में उनकी सेवा काफी चर्चित रही, और उन्होंने कई बार कहा है कि सेना ने उन्हें एक बड़ा मकसद दिया था। यूरोपीय देश बोले- हमने साथ मिलकर लड़ाई की, इसे नहीं भुलाया जा सकता डच विदेश मंत्री डेविड वैन वील ने ट्रम्प के बयान को झूठा बताया। पोलैंड के पूर्व विशेष बल कमांडर और रिटायर्ड जनरल रोमन पोल्को ने कहा कि ट्रम्प ने हद पार कर दी है। उन्होंने कहा, “हमने इस गठबंधन के लिए खून बहाया, अपनी जानें दीं। हमने साथ मिलकर लड़ाई की लेकिन सभी घर नहीं लौटे।” पोलैंड के रक्षा मंत्री व्लादिस्लाव कोसिनियाक-कामिश ने कहा कि पोलैंड के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता और इसे कमतर नहीं दिखाया जा सकता। ब्रिटेन के पूर्व MI6 प्रमुख रिचर्ड मूर ने कहा कि उन्होंने और उनके सहयोगियों ने CIA के बहादुर अधिकारियों के साथ खतरनाक मिशनों में काम किया और अमेरिका को अपना सबसे करीबी सहयोगी माना। ट्रम्प के बयान पर ब्रिटेन के लिबरल डेमोक्रेट्स नेता एड डेवी ने एक्स पर लिखा कि ट्रम्प ने वियतनाम युद्ध में ड्राफ्ट से बचने के लिए पांच बार छूट ली थी, फिर वे दूसरों के बलिदान पर सवाल कैसे उठा सकते हैं। NATO ने अफगानिस्तान में दो अभियान चलाए थे अफगानिस्तान में NATO के तहत मुख्य रूप से दो बड़े अभियान चले, जिनमें ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, पोलैंड, डेनमार्क सहित दर्जनों देशों के हजारों सैनिकों ने हिस्सा लिया। पहला और सबसे बड़ा अभियान अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (ISAF) था, जो 2001 से 2014 तक चला। इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आदेश पर शुरू किया गया और 2003 से नाटो ने इसका नेतृत्व संभाला। ISAF का मकसद अफगान सुरक्षा बलों को प्रशिक्षित करना, सुरक्षा प्रदान करना और तालिबान/अल-कायदा के खिलाफ लड़ाई में मदद करना था। इस मिशन में अधिकतम 1,30,000 से ज्यादा सैनिक तैनात थे, जिसमें 51 नाटो और पार्टनर देश शामिल थे। दूसरा अभियान रेजोल्यूट सपोर्ट मिशन था, जो 2015 से 2021 तक चला। यह गैर-लड़ाकू मिशन था, जिसमें अफगान राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा बलों (ANDSF) को प्रशिक्षण, सलाह और सहायता दी जाती थी। इसमें भी नाटो के 36 देशों के लगभग 9,000-17,000 सैनिक शामिल रहे। इन अभियानों में ब्रिटेन के 457 सैनिक, कनाडा के 159, फ्रांस के 90, जर्मनी के 62, पोलैंड के 44, डेनमार्क के 44 सैनिक शहीद हुए। NATO के अनुच्छेद 5 को जानिए NATO के अनुच्छेद 5 के तहत किसी नाटो सदस्य देश पर हमला होता है, तो इसे सभी सदस्य देशों पर हमला समझा जाएगा। फिर सभी सदस्य देश मिलकर उस हमले का जवाब देने के लिए सहमत होते हैं। हालांकि, यह युद्ध की गारंटी नहीं देता। हर देश अपनी संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई कर सकता है। यह अनुच्छेद मुख्य रूप से सोवियत संघ के खतरे के खिलाफ बनाया गया था, ताकि कोई भी देश अकेला न रहे। इसका मशहूर नारा है- एक पर हमला, सभी पर हमला। NATO से बाहर निकलना चाहते हैं ट्रम्प अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प NATO को लेकर कई बार नाराजगी जता चुके हैं। ट्रम्प ने बार-बार कहा कि यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा के लिए पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे और सारा बोझ अमेरिका उठा रहा है। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर यूरोपीय देश 2% GDP रक्षा पर खर्च नहीं करते तो अमेरिका संगठन से हट भी सकता है। डोनाल्ड ट्रम्प पिछले दो दशक से अमेरिका को नाटो से बाहर निकलने की वकालत करते रहे हैं। 2016 में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में ट्रम्प ने कहा था कि यदि रूस बाल्टिक देशों (एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया) पर हमला करता है, तो वे यह देखने के बाद ही मदद करेंगे कि उन्होंने अमेरिका के लिए अपना फर्ज पूरा किया है या नहीं। ट्रम्प का मानना है कि यूरोपीय देश अमेरिका के खर्च पर नाटो की सुविधाएं भोग रहे हैं। 2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद तो उन्होंने नाटो से निकलने की धमकी ही दे दी थी। ट्रम्प ने 2024 में एक इंटरव्यू में साफ कह दिया था कि जो देश अपने रक्षा बजट पर 2% से कम खर्च कर रहे हैं, अगर उन पर रूस हमला करता है तो अमेरिका उनकी मदद के लिए नहीं आएगा। उल्टे वे रूस को हमला करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद कमजोर हुआ यूरोप सेकेंड वर्ल्ड वॉर (1939-45) के बाद यूरोप आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर हो गया था। दूसरी तरफ जापान पर परमाणु बम गिराने के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरा। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना और परमाणु हथियार थे। उसने यूरोपीय देशों को परमाणु सुरक्षा मुहैया कराई। इससे यूरोपीय देशों को अपने परमाणु हथियार विकसित करने की जरूरत नहीं थी। अमेरिका खासतौर पर रूस से परमाणु हमलों के खिलाफ यूरोपीय देशों को परमाणु सुरक्षा की गारंटी देता है। इससे यूरोपीय देशों का सैन्य खर्च कम होता है। यूरोप में अमेरिका की मजबूत सैन्य मौजूदगी है। जर्मनी, पोलैंड और ब्रिटेन में 10 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। अमेरिका ने यहां मिलिट्री बेस बनाए हैं और मिसाइल डिफेंस सिस्टम तैनात किए हैं। अमेरिका की मौजूदगी यूरोप को सुरक्षा का भरोसा देती है। अमेरिका के नाटो से बाहर होने से क्या बदलेगा यूरोप की सैन्य शक्ति सीमित है। ज्यादातर यूरोपीय देश अमेरिका की तुलना में रक्षा पर कम खर्च करते हैं। यूरोपीयन यूनियन (EU) के पास NATO जैसी संगठित सेना नहीं है। यहां तक कि जर्मनी और फ्रांस जैसे ताकतवर देश भी खुफिया जानकारी और तकनीक के लिए अमेरिका पर निर्भर है। अगर अमेरिका गठबंधन छोड़ देता है तो यूरोप को अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए और ज्यादा खर्च करने की आवश्यकता होगी। उन्हें गोला-बारूद, परिवहन, ईंधन भरने वाले विमान, कमांड और नियंत्रण प्रणाली, उपग्रह, ड्रोन इत्यादि की कमी को पूरा करना होगा, जो वर्तमान में अमेरिका द्वारा मुहैया कराए जाते हैं। यूके और फ्रांस जैसे नाटो सदस्य-देशों के पास 500 एटमी हथियार हैं, जबकि अकेले रूस के पास 6000 हैं। अगर अमेरिका नाटो से बाहर चला गया तो गठबंधन को अपनी न्यूक्लियर-पॉलिसी को नए सिरे से आकार देना होगा। ——————— ये खबर भी पढ़ें…

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