चित्तौड़गढ़ जिले में एक ऐसा गांव है, जहां पेड़ बाथरूम, किचन, कमरे और घर के बरामदे से निकल रहे हैं। यहां तक की गांव में निकलने वाली सड़क के बीच में भी पेड़ लगा है। सालों पुराने इन मकानों का यदि रिनोवेशन भी करवाना है, तो इनका नक्शा भी इन पेड़ों के अनुसार तैयार करवाया जाता है। ये गांव है पुरोहितों का सांवता ग्राम पंचायत का ‘मांदलदा’। मान्यता है कि गांव में किसी पेड़, उसकी टहनी या फिर पत्तियां तक काटना अपराध है। इसका कारण है- यहां के लोग इसे भगवान देवनारायण की आज्ञा मानते हैं। इसी कारण गांव में जन्में हर परिवार के पहले बच्चे का नामकरण भी भगवान देवनारायण के पांच नामों में से एक का होता है, इसलिए यहां नारायण और भैरू नाम के कई लोग मिल जाएंगे। भगवान देवनारायण की जयंती पर पढ़िए खास गांव मांदलदा की कहानी… गांव में पेड़ ही पेड़, टहनी और पत्तियां तक काटना अपराध इस गांव की आबादी करीब 2200 से 2500 है। जब गांव में एंट्री की तो पूरा गांव पेड़ों से घिरा मिला। यहां के लोगों ने बताया कि यह हमारे भगवान (देवनारायण) की आज्ञा है कि पेड़ों को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाया जाए। इसी कारण यहां सारे घरों में पेड़ दिख जाएंगे। टीम जब गांव के घरों में पहुंची तो नजारा हैरान कर देने वाला था। किसी घर के बाथरूम में से, तो किसी के कमरे से पेड़ों की टहनियां गुजर रही हैं। लोगों ने बताया कि जहां से पेड़ निकल रहा है, वह जगह हमने छोड़ दी है। यहां तक कि जब घर का रिनोवेशन करवाने की सोचते हैं तो पहले इस बात का ध्यान रखा जाता है कि एक भी पेड़ को किसी तरह से नुकसान न पहुंचाया जाए। दो घर, दोनों में किसी पेड़ को नुकसान नहीं पहुंचाया गया रतन सिंह रावत के गांव में ही दो घर है। रतन सिंह ने बताया- दोनों घरों में बरामदे में ही पेड़ है। कई सालों से ये पेड़ उनके आंगन है। एक मकान में पेड़ साइड की दीवार से निकल रहा है। लेकिन, ऐसा नहीं है कि दीवार को पूरी करने के लिए पेड़ को काट दिया जाए। दोनों घरों को डिजाइन ही इसी तरह से किया गया है कि पेड़ को कोई नुकसान नहीं हो। इसी तरह 48 साल के नारायण गुर्जर के मकान में तीन पेड़ हैं। तीनों पेड़ों की शाखाएं ऊपर छत तक जा रही हैं। छत को इस तरह से बनाया गया है कि पेड़ छत की दीवार से आराम से बाहर निकल सके और उनकी टहनियां घनी रहे। हम भगवान की आज्ञा मानते हैं, रिनोवेशन में भी पेड़ों को नहीं छेड़ा देवी सिंह रावत (43) और उनकी पत्नी मंजू देवी रावत (40) का कहना है- उनका घर काफी पुराना है। देवी सिंह के परदादा के समय का ये मकान है। मंजू देवी ने बताया कि भगवान देवनारायण के कारण हमें मना कर रखा है कि यहां पेड़ों को नहीं काटना है। पहले भी नहीं काटा गया था और आज कोई रिनोवेशन करता है या करवाता है तो भी नहीं काटते है। पप्पू दास ने बताया- मकान परदादा के समय से है, लेकिन 15 साल पहले रिनोवेशन करवाया था। उस समय भी हमने पेड़ों को नहीं काटा था। आज बाथरूम, किचन और यहां तक की बरामदे में पेड़ों की टहनी आ रही थी। लेकिन हमने घर को उसी हिसाब से बनाया, जिससे एक टहनी भी ना काटनी पड़े। मुकेश सिंह रावत का कहना है- कई पीढ़ियों से यहीं रह रहे हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी यही कहानी सुनाई जाती है कि यहां पेड़ों को काटने से नुकसान होता है। हम छोटे थे, तब हमने खुद भी ऐसा कई बार देखा है। आज घर के अंदर बरामदे में भी तीन-तीन पेड़ हैं। अभी 5 साल पहले ही हमने अपने मकान का काम करवाया था। छत भी डलवाई है, लेकिन हर बार हमने इसी चीज का ध्यान रखा की पेड़-पौधों को कोई नुकसान नहीं हो। जहां से पेड़ या फिर उसकी टहनियां गुजर रही होती हैं तो हम उस जगह को छोड़कर दूसरी जगह निर्माण का काम पूरा करते हैं। पेड़ों के प्रति ऐसी आस्था, सड़क बनी तब भी पेड़ नहीं काटा गांव के लोगों में पेड़ों के प्रति गहरी आस्था है। इसका उदाहरण ये है कि जब गांव में सड़क बनी तो एक पेड़ बीच में आ रहा था। पेड़ को बिना किसी नुकसान पहुंचाए सड़क बनाई गई। आज भी गांव की सड़क के बीच में वो पेड़ मौजूद है। इतना ही नहीं एक परिवार ऐसा भी था, जिनके मकान के पीछे दूसरा मकान बनाने की जगह थी, लेकिन वहां काफी पेड़ थे। इन पेड़ों के लिए परिवार ने जगह छोड़ दी और घर नहीं बनाने का निर्णय लिया। ग्रामीण बताते हैं- फोरलेन सड़क निर्माण के दौरान जब पेड़ों को काटने के लिए जेसीबी लाई गई, तो मशीन अचानक खराब हो गई। आठ दिन तक जेसीबी सड़क पर खड़ी रही। कई मिस्त्री आए, लेकिन मशीन चालू नहीं हुई। अंत में जेसीबी ड्राइवर ने भगवान देवनारायण के सामने माफी मांगी और पेड़ नहीं काटने की बात कही, तब जाकर मशीन चल पाई। गुर्जर समाज की आस्था और पहचान मांदलदा गांव में लगभग 2200 से 2500 लोग रहते हैं, जिनमें से करीब 90 प्रतिशत गुर्जर समाज से हैं। गुर्जर समाज के आराध्य देव भगवान देवनारायण माने जाते हैं। गांव की हर परंपरा, हर नियम और हर विश्वास भगवान देवनारायण से जुड़ा हुआ है। चाहे पेड़ों की रक्षा हो या बच्चों के नामकरण की परंपरा, हर चीज में भगवान की आस्था दिखाई देती है। गांव में मवेशियों के लिए भी पेड़ों से पत्तियां काटने से बचा जाता है। ग्रामीणों का कहना है- जिसने भी भगवान देवनारायण की आज्ञा का उल्लंघन किया, उसके घर में बीमारी, नुकसान और परेशानी आई। इसी डर और श्रद्धा के कारण आज भी गांव के लोग पेड़ों को हाथ तक नहीं लगाते। एक ही नाम के कई लोग, पहले बच्चे का नाम भगवान को समर्पित भगवान देवनारायण के प्रति आस्था केवल पेड़ों तक सीमित नहीं है। मांदलदा गांव में हर घर में पैदा होने वाले पहले बच्चे का नाम भगवान देवनारायण के नाम पर ही रखा जाता है। गांव में अधिकतर घरों में लोगों के नाम नारायण, देव, उदल, किशन या भैरू मिल जाएंगे। जन्म पत्री में सबसे पहले बच्चे का नाम इन्हीं पांचों नाम पर रखा जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसा करने से भगवान की कृपा पूरे परिवार पर बनी रहती है। यह परंपरा आज भी बनी हुई है। ऐसे में जब आप इस गांव में जाएंगे तो इन पांच नाम वाले कई लोग आपको मिल भी जाएंगे। गांव के प्राचीन मंदिर से जुड़ी है कहानी ग्रामीणों की मान्यता है कि भगवान देवनारायण भीलवाड़ा जिले के मांडल के बीड़ से मालवा की ओर जाते समय तीन दिन तक मांदलदा गांव में रुके थे। इस दौरान उन्होंने गायों और जंगल की रक्षा की थी। कहा जाता है कि भगवान ने यहां रहते हुए पेड़ों को नुकसान न पहुंचाने की आज्ञा दी थी। गांव की एक पहाड़ी पर भगवान देवनारायण का प्राचीन मंदिर स्थित है। य ह मंदिर पूरे गांव की आस्था का केंद्र है। ग्रामीणों का कहना है कि भगवान आज भी यहीं विराजमान हैं और गांव की रक्षा कर रहे हैं। मंदिर के आसपास का क्षेत्र घना जंगल है, जहां हजारों पेड़ खड़े हैं। मंदिर में उनके पैरों के निशानों की होती है पूजा भगवान देवनारायण के इस प्राचीन मंदिर में मूर्ति के साथ-साथ कई पत्थरों पर बने निशानों की पूजा की जाती है। इनमें भगवान के पैरों के निशान, उनकी मोजड़ी के निशान, एक मॉनिटर लिजर्ड की आकृति वाला पत्थर (माना जाता है कि उन्होंने एक बार मॉनिटर लिजर्ड को अपने हाथों से पकड़ा था) और अन्य विशेष निशान शामिल हैं। इन निशानों में बच्चों के पैरों की छाप भी है, जिसकी पूजा की जाती हैं। इसके अलावा मंदिर के पीछे पहाड़ी पर गाय की रस्सी रगड़ने का निशान और मटकी रखने का निशान भी हैं। इन्हीं मोजड़ी के निशानों के कारण मंदिर को ‘श्री मोचड़ियों के देवनारायण’ भी कहा जाता है। नीम, खेजड़ी और धोखड़ा भगवान की अमानत गांव के बुजुर्ग नारायण गुर्जर बताते हैं- मांदलदा में नीम, खेजड़ी, टिमरू और धोखड़ा जैसे पेड़ सैकड़ों साल पुराने हैं। इन पेड़ों को कभी काटा नहीं गया। ग्रामीणों का विश्वास है कि ये पेड़ भगवान देवनारायण की अमानत हैं। जो व्यक्ति इन्हें नुकसान पहुंचाता है, उसे भगवान का कोप भुगतना पड़ता है। पुजारी कालू भोपा बताते हैं- पहले कुछ लोगों ने दरवाजे बनाने के लिए पेड़ काट दिए थे। कुछ ही समय बाद उनके परिवारों पर विपत्ति आ गई। कोई गंभीर बीमारी का शिकार हुआ तो कोई कंगाल हो गया। हालात ऐसे बने कि उन्हें गांव छोड़ना पड़ा। आज उनकी जमीन पर दूसरे लोग खेती कर रहे हैं।


