मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम मामले पर सुनवाई करते हुए पति की याचिका पर कहा कि कुटुम्ब न्यायालय का जो आदेश डीएनए के लिए दिया गया है, वह सही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पति ने यह जांच बच्ची को पाने या फिर भरण-पोषण से बचने के लिए नहीं बल्कि पत्नी के व्यभिचार के आधार पर तलाक के लिए किया है। कोर्ट ने पुलिस मे पदस्थ पत्नी की याचिका को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने डीएनए टेस्ट कराने की भी अनुमति दी है। दरअसल यह पूरा मामला सेना में पदस्थ पति और पुलिस विभाग में जाॅब कर रही पत्नी से जुड़ा हुआ है। पति-पत्नी के बीच संदेह है। सेना में पदस्थ पति की दलील है कि अक्टूबर, 2015 में पत्नी ने उसे बुलाया था और चार दिन के भीतर ही पत्नी ने यह जानकारी दी कि वह गर्भवती है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रूप से चार दिन के भीतर गर्भ ठहरने की जानकारी संभव नहीं है। पति ने यह भी दावा किया कि बच्ची का जन्म अक्टूबर, 2015 के लगभग आठ महीने के भीतर हो गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जिस समय गर्भधारण हुआ, उस समय पति का पत्नी से कोई संपर्क नहीं था। इन तथ्यों के आधार पर पति ने पत्नी के व्यभिचार का आरोप लगाया। जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने कुटुम्ब न्यायालय, जबलपुर के उस आदेश को उचित माना, जिसके जरिए पति की अर्जी पर नाबालिग बच्ची का डीएनए टेस्ट कराने की अनुमति दी गई थी। पति ने यह डीएनए जांच पत्नी पर लगाए गए व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए मांगी थी। हाईकोर्ट ने पत्नी द्वारा दायर याचिका को निरस्त करते हुए कहा कि इस मामले में कुटुम्ब न्यायालय द्वारा डीएनए जांच का आदेश देना उचित है। रिकार्ड पर स्पष्ट रूप से कोई संपर्क न होने की दलील मौजूद है। लिहाजा, यह मामला डीएनए टेस्ट के लिए उपयुक्त है, और कुटुम्ब न्यायालय ने बच्ची का डीएनए टेस्ट कराने का आदेश देकर कोई गलती नहीं की है। सुनवाई के दौरान पत्नी की ओर से कोर्ट में दलील दी गई थी, कि डीएनए जांच से उसके निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा और यह बच्ची की पहचान और बाल अधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन के भी प्रतिकूल है। हाई कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने साफ किया कि पति ने डीएनए जांच का अनुरोध बच्ची की वैधता को चुनौती देने या भरण-पोषण से बचने के लिए नहीं किया, बल्कि केवल व्यभिचार के आधार पर तलाक की याचिका को साबित करने के लिए किया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां पर्याप्त दलीलें मौजूद हों, गर्भधारण के समय पति-पत्नी के बीच संपर्क न होने के ठोस आधार हों और बच्ची को अवैध घोषित करने की कोई मांग न की गई हो, वहां उपयुक्त मामलों में डीएनए टेस्ट का आदेश दिया जा सकता है। इस तरह हाइकोर्ट ने कुटुम्ब न्यायालय का आदेश बरकरार रखते हुए पत्नी की याचिका निरस्त कर दी।


