12वीं का छात्र है तो भी मुआवजा देने पर विचार:हाईकोर्ट ने कहा उसे अकुशल श्रमिक मानकर मुआवजा  दिया जाएगा

12वीं का छात्र है तो भी मुआवजा देने पर विचार:हाईकोर्ट ने कहा उसे अकुशल श्रमिक मानकर मुआवजा  दिया जाएगा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल इस आधार पर यह मान लेना सही नहीं है कि सड़क दुर्घटना में मृतक कक्षा बारहवीं का छात्र था और वह कोई आय अर्जित नहीं कर रहा था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मुआवजे की गणना मृतक को अकुशल श्रमिक मानकर की जानी चाहिए। जस्टिस संदीप जैन ने श्रीमती कश्मीरी व 3 अन्य की अपील पर फैसले में कहा — “ केवल इस कारण कि मृतक कक्षा 12 वीं में पढ़ रहा था, यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह कोई आय अर्जित नहीं कर रहा था। यह स्पष्ट है कि दावेदार मृतक की आय और व्यवसाय से संबंधित कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके, इसलिए ट्रिब्यूनल ने मृतक की काल्पनिक आय 15,000 प्रति वर्ष मानकर मुआवजे का निर्धारण किया, जो कि अत्यंत अपर्याप्त है।” यह मामला 10 जून 2014 को हुई एक सड़क दुर्घटना से संबंधित है, जिसमें मृतक की मृत्यु हो गई थी। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण/अपर जिला न्यायाधीश, बुलंदशहर द्वारा मृतक की माता, बहन और भाई को कुल ₹2,60,000/- का मुआवजा 7% वार्षिक ब्याज सहित प्रदान किया गया था। इस आदेश के खिलाफ मुआवजा बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। अपील में यह तर्क दिया गया कि मृतक की आयु 22 वर्ष थी और वह एक मजदूर के रूप में कार्य कर रहा था तथा लगभग 9,000 प्रति माह कमा रहा था। यह भी कहा गया कि ट्रिब्यूनल द्वारा मृतक की काल्पनिक आय 15,000 प्रति वर्ष मानना पूरी तरह गलत और अत्यंत कम है। इसके अलावा, यह भी दलील दी गई कि गुणक 16 लागू किया गया, जबकि सही गुणक 18 होना चाहिए था। गुरप्रीत कौर व अन्य बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और जितेंद्र बनाम सादिया व अन्य मामलों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि मृतक की माता ने यह साक्ष्य प्रस्तुत किया था कि मृतक कक्षा 12वीं में पढ़ाई कर रहा था और साथ ही 9,000 प्रति माह कमा रहा था। न्यायालय ने कहा कि केवल छात्र होने से यह सिद्ध नहीं होता कि मृतक काम नहीं कर रहा था। न्यायालय ने कहा— “यह स्थापित सिद्धांत है कि यदि मृतक की आय और व्यवसाय से संबंधित कोई दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध न हो, तो ट्रिब्यूनल को मृतक को अकुशल श्रमिक मानते हुए उस समय उत्तर प्रदेश में प्रचलित न्यूनतम मजदूरी के आधार पर मुआवजे का निर्धारण करना चाहिए था, जो उस समय 6,362/- प्रतिमाह थी।” इस आधार पर न्यायालय ने माना कि दावेदार 15,000 प्रति वर्ष के बजाय 6,362/- प्रति माह के आधार पर मुआवजे के हकदार हैं। इसके अलावा, नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी एवं अन्य के फैसले का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि चूंकि मृतक की आयु 22 वर्ष थी, इसलिए गुणक 16 के बजाय 18 लागू किया जाना चाहिए था। यह भी कहा गया कि मृतक चार सदस्यों वाले परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 16,04,092/- कर दी, जिस पर 7% वार्षिक ब्याज देय होगा। हाईकोर्ट ने इस प्रकार मुआवजा बढ़ाने संबंधी इस अपील को स्वीकार कर लिया।

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