डॉ. शकुन्तला मिश्रा विश्वविद्यालय परिसर में बनाएगा कृत्रिम अंग:दिव्यांगजनों को मिलेगी मदद, किफायती दामों पर उपलब्ध होंगे

डॉ. शकुन्तला मिश्रा विश्वविद्यालय परिसर में बनाएगा कृत्रिम अंग:दिव्यांगजनों को मिलेगी मदद, किफायती दामों पर उपलब्ध होंगे

डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय ने दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। विश्वविद्यालय अब अपने परिसर में ही कृत्रिम अंगों के आवश्यक पुर्जों का निर्माण करेगा। इस पहल से दिव्यांगजनों को समय पर उच्च गुणवत्ता वाले और किफायती कृत्रिम अंग उपलब्ध हो सकेंगे, साथ ही तकनीकी आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी। यह प्रयास जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में कुलपति आचार्य संजय सिंह की पहल पर शुरू हुआ। इसके तहत फरवरी 2026 में विश्वविद्यालय और सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सिपेट) के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) प्रस्तावित है। एमओयू के बाद, सिपेट के तकनीकी सहयोग से विश्वविद्यालय परिसर में कृत्रिम पैर के पंजे सहित अन्य महत्वपूर्ण पुर्जों का निर्माण शुरू हो जाएगा। संस्थानों के अधिकारियों ने विस्तृत चर्चा की इस संबंध में सिपेट में आयोजित दो दिवसीय थ्रीडी प्रिंटिंग और कंप्यूटर एडेड डिजाइन (कैड) आधारित स्किल अपग्रेडेशन प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान दोनों संस्थानों के अधिकारियों ने विस्तृत चर्चा की। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के डीन एकेडमिक्स प्रो. वीके सिंह मुख्य अतिथि रहे। सिपेट लखनऊ के जॉइंट डायरेक्टर एवं हेड विवेक कुमार सिंह, हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. यशवंत वीरोदय, सिपेट के टेक्निकल ऑफिसर कृष्ण प्रताप सिंह और विश्वविद्यालय के कृत्रिम अंग एवं पुनर्वास केंद्र के कार्यशाला प्रबंधक डॉ. रणजीत सिंह सहित कई विशेषज्ञ उपस्थित थे। स्टार्टअप के अवसरों के लिए भी तैयार करेगा प्रशिक्षण के पहले दिन विश्वविद्यालय के एमपीओ और बीपीओ पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों को कैड-कैम और थ्रीडी प्रिंटिंग से जुड़ी आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। यह प्रशिक्षण विद्यार्थियों को रोजगार, उद्यमिता और स्टार्टअप के अवसरों के लिए भी तैयार करेगा। वर्तमान में विश्वविद्यालय को कृत्रिम अंगों के अधिकांश पुर्जे बाजार से खरीदने पड़ते हैं, लेकिन एमओयू के बाद कई प्रमुख पुर्जे परिसर में ही तैयार किए जाएंगे। कुलपति आचार्य संजय सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य केवल शिक्षा प्रदान करना नहीं है, बल्कि दिव्यांगजनों के जीवन को आसान और आत्मनिर्भर बनाना भी है। उन्होंने कहा कि थ्रीडी प्रिंटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों से कृत्रिम अंगों की गुणवत्ता में सुधार होगा और जरूरतमंदों को समय पर सहायता मिल सकेगी।

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