रिपब्लिक-डे परेड में यूपी की 4 ट्रांसजेंडर स्पेशल गेस्ट:मॉडल तो कोई फोटोग्राफर, गोरखपुर की गरिमा गृह केंद्र से जुड़ीं हुईं हैं

रिपब्लिक-डे परेड में यूपी की 4 ट्रांसजेंडर स्पेशल गेस्ट:मॉडल तो कोई फोटोग्राफर, गोरखपुर की गरिमा गृह केंद्र से जुड़ीं हुईं हैं

26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर यूपी की 4 ट्रांसजेंडर शामिल होंगी। ये ट्रांसजेंडर परेड पर स्पेशल गेस्ट बनेंगी। ये चारों गोरखपुर की गरिमा गृह से जुड़ी हुई हैं। ये सभी 24 जनवरी को दिल्ली जाएंगे। प्रोटोकाल के साथ वहां पहुंचेंगे। 25 जनवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। उसके बाद म्यूजियम और नेशनल वार मेमोरियल घूमने जाएंगी। 26 जनवरी को नेशनल परेड में स्पेशल गेस्ट के तौर पर हिस्सा लेंगे। गरिमा गृह की संचालिका एकता महेश्वरी ने बताया- सेंट्रल गवर्नमेंट की ओर से ट्रांसजेंडर की प्रोफाइल मांगी गई थी। पूरे भारत में इस कम्युनिटी की ओर से समाज में अच्छा काम करने वाले लगभग 200 लोगों की प्रोफाइल भेजी गई। इसमें करीब 50 ऐसे लोगों का सेलेक्शन किया गया है, जिन्होंने अपने दम पर एक अलग पहचान बनाई है। समाज में अच्छा काम कर रहे हैं। बताया कि मुझे इमेल के जरिए इसकी जानकारी मिली है। अब पढ़िए ट्रांसजेंडरों के संघर्ष और सफलता की कहानी 1. वीरेंद्र से एकता बनने की कहानी, वो पढ़िए- एकता बताती हैं, मेरा जन्म लखीमपुर खीरी में हुआ। तब मैं लड़का थी। मुझे बचपन से लड़कियों की तरह रहना, सजना-संवरना पसंद था। 3 साल की उम्र में ही सर से पिता का साया हट गया। बड़े भाई ने परिवार की कमान संभाली। छोटी सी उम्र से ही मानसिक तनाव झेलना पड़ा। मां के सपोर्ट से दसवीं तक ही पढ़ाई कर सका। लड़की जैसी चाल होने पर समाज के लोगों ने ताने मारने शुरू कर दिए। कोई हिजड़ा बोलता था तो कोई छक्का। घर वालों को मेरी वजह से शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही थी। जो मुझसे देखा नहीं गया। एक दिन मैंने चुपचाप घर छोड़ दिया। मगर हिम्मत नहीं हारी। मैं लखनऊ के एलजीबीटी कम्युनिटी के लोगों से मिला। तब मेरी हिम्मत और बढ़ गई। मैंने लड़की होने की पहचान छुपाते हुए छोटी- छोटी नौकरी की। ग्रेजुएशन तक अपनी पढाई पूरी की। फिर फोटोग्राफी सीखी।इसके बाद मैंने समाज को वो सच बता दिया, जो मैं अंदर से था। मैंने सबको अपने नए नाम से रूबरू कराया। मैंने अपना नाम रखा- एकता महेश्वरी। एकता बनने के बाद मैंने एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर के तौर पर काम करना शुरू किया। 2007 में मैं गोरखपुर पहुंची। 2011 में गरिमा गृह शेल्टर होम की शुरुआत की। तब से ऐसे बच्चों को अपने साथ जोड़ती हूं। उनके टैलेंट को पहचान कर ट्रेनिंग दिलवाती हूं। बताया कि आज गरिमा गृह के बच्चे आज गवर्नमेंट, दिल्ली, मुंबई और देश के कोने- कोने में अलग- अलग फिल्ड में काम कर रहे हैं। वो कहती हैं कि मुझे खुशी है कि आज मैं सेंट्रल गवर्नमेंट के साथ मिलकर एक शेल्टर होम के जरिए अपने जैसे लोगों की जिंदगी बदल रही हूं। उनके हक, पहचान और पॉलिसी में बदलाव के लिए काम कर रही हूं। 2. दीपिका के पिता बोले- लड़के की तरह रहो, वरना मेरा घर छोड़ दो कुशीनगर जिले में जन्मी दीपिका बताती हैं। बचपन में मेरा नाम दीपक था। जैसे-जैसे मैं बड़ी होने लगी तो मेरा बर्ताव लड़कियों जैसा होने लगा। घर के लोगों ने इसका विरोध किया। बाहर भी लोग मेरा मजाक उड़ाते थे। पिता ने मुझे खूब पीटा। फिर बोले- रहना है तो लड़कों की तरह रहो, वरना मेरा घर छोड़ दो। उस समय मैं अंदर से टूट गई। फिर मैंने घर छोड़ने का फैसला किया। मैंने सामान पैक करने लगी तो मां रोने लगी। मुझे रोक लिया। मैं रुक तो गई, मगर लोगों के ताने बढ़ने लगे। मेंटली टॉर्चर किया जाने लगा। मैंने 12वीं का एग्जाम दिया। मैं सोचती कि शायद पैसा कमाऊंगी तो मेरी फैमिली मुझे एक्सेप्ट करेगी। इसके लिए मैंने कम्प्यूटर कोर्स करना शुरू किया। वहीं पर गरिमा गृह से जुड़े एक व्यक्ति ने मुझे देखा। फिर उन्होंने एकता मां से मिलवाया। वहीं से मैंने खुद को समझा। फिर मैंने नौकरी करने के नाम पर घर छोड़ दिया। फिर गोरखपुर आई। इसके बाद मैंने लड़की की तरह रहना शुरू कर दिया। एक फेसबुक फ्रेंड की मदद से मैं जॉब के ही बहाने दिल्ली गई। यहां भी मुझे लोगों के ताने सहने पड़े। मगर मैंने यहां एक NGO में काम करके मेकअप आर्टिस्ट का कोर्स किया। डॉक्टरों ने मुझसे प्रूफ के लिए पैंट उतारने को कहा
दीपिका बताती हैं लड़के के बॉडी में लड़की की तरह रहना आसान नहीं था। जहां जाती लोग चिढ़ाते थे। मुझसे दूरी रखते। फिर मैंने ब्रेस्ट इम्प्लांट करवाने का सोचा। जिसके लिए मैं एक सरकारी अस्पताल पहुंची। यहां डॉक्टरों ने मुझसे प्रूफ के लिए पैंट उतारने को कहा। वह पल मेरे लिए बहुत डरावना था। मैं वहां से भाग निकली। फिर एक प्राइवेट हॉस्पिटल में ब्रेस्ट इम्प्लांट करवाया। अभी मैं एक लड़की की तरह रहती हूं। दिल्ली में खुद का एक सैलून खोला है। मॉडलिंग भी कर लेती हूं। अब मैं वो सब खुलेआम करती हूं जो मुझे पसंद है। किसी का कोई डर नहीं है। आज हमें नेशनल लेवल पर पहचान मिल रही है। अब हमें खुद पर गर्व होता है। 3. हीर बोली- पिता ने कहा अपना देख लो, 12वीं के बाद पैसा देना बंद कर दिया कुशीनगर के ही रहने वाली हीर की कहानी भी संघर्षों से भरी है। वो कहती हैं मैं परिवार में बेटे की तरह पैदा हुआ। मेरा नाम अमित रखा गया। मगर मेरे अंदर एक लड़की थी। बचपन से ही मैं लड़कियों की तरह क्रीम, लिपस्टिक और बिंदी लगाने लगा। ये मुझे पसंद था। मेरी चाल, हरकतें देखकर बच्चे, परिवार के लोग, पड़ोसी छक्का और हिजड़ा कह कर चिढ़ाते थे। तब मैंने ऐसे लोगों से दूरी बना ली। उन्हें देखकर मैं डर जाती। ऐसे लोगों के सामने जाने से मैं डरने लगी। चिढ़ाने के डर से अपने साथ के बच्चों के साथ खेलना, घूमना- फिरना सब बंद कर दिया। मेरा मन पढाई में खूब लगता था। मैं क्लास में हमेशा टॉप करती थी। 9 से 12 क्लास तक के दौरान वो समय था जब मुझे घर से लेकर बाहर हर जगह चिढ़ाया गया। मुझे समझने को कोई तैयार नहीं था। मैं डिप्रेशन में चली गई। एग्जाम में फेल होने लगी। मैं जब बड़ी हुई तो पता चला की ट्रांजेंडर भी कुछ होता है। मेरे चाचा-चाची मां को ताने मारते थे
जब मेरे परिवार को पता चला कि मेरे अंदर लड़का और लड़की दोनों के गुण हैं। तब मेरे पिता ने मुझसे कहा- अपना रास्ता देखो। जिसके बाद ही मैंने घर छोड़ दिया। मैं मुंबई पहुंची। वहां मुझे किसी ने नौकरी नहीं दी। मैं फिर देवरिया जिला पहुंची। यहां मैंने EDCA कोर्स करना शुरू किया। जिसकी फीस 12000 थी। तब मेरे पास सिर्फ 4000 रुपए थे। फिर मैं LGBT कम्युनिटी से मिली। मैंने जब पढ़ने की बात कही तो समुदाय के लोगों ने मुझे डांटा। कहा कि पढाई- लिखाई हमारे लिए नहीं बनी है। तू भी हमारी तरह ही नाच-गा और बधाई मांग। मैं वहां से भाग निकली। फिर मैं अपने एक दोस्त की मदद से गोरखपुर के गरिमा गृह से जुड़ी। आज मैं दो-फेलोशिप के जरिए जेंडर और कंस्टीटूशन पर काम कर रही हूं। हीर कहती हैं कि आज भी मेरे परिवार को मेरी सच्चाई नहीं पता है। पापा को मेरे से कोई मतलब नहीं है। उन्हें लगता है कि मैं गोरखपुर में रहकर अपनी पढ़ाई कर रही हूं। मेरे चाचा- चाची और रिश्तेदार मेरी मां को ताने मारते हैं। तब मुझे बहुत बुरा लगता है। आज भी मैं घर जानें से डरती हूं। 4. लाडो को मिला परिवार का सपोर्ट, पड़ोसियों से छुपाई पहचान
गोरखपुर की लाडो कहती हैं कि मैं तो लड़का बनकर ही पैदा हुई। मगर जैसे-जैसे बड़ी हुई तो मेरे अंदर लड़के और लड़की दोनों के गुण आने लगे। घर के बाहर निकलती तो लोग मुझे ताने देते। मैं डिप्रेशन में चली गई। फिर मैंने एक दिन अपने घर में सब सच्चाई बता दी। मेरे परिवार ने हमेशा मेरा सपोर्ट किया। मैं 2019 में वो गरिमा गृह से जुडी। वहीं जॉब करना शुरू किया। अपनी एक अलग पहचान बनाई। मैंने यूपी इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन एंड रिसर्च से डिप्लोमा किया। आज कल्याण साथी पोर्टल में काम करती हूं। बताया कि आज मैं भले ही एक ट्रांसजेंडर की तरह रहती हूं। मगर अभी भी मैं खुल कर लोगों को नहीं बता सकती। वरना मेरी फैमिली का जीना मुश्किल हो जाएगा।

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