सरकार का एक नियम…15 लाख लोगों की कमाई घटेगी!:70 हजार की नौकरी जाएगी, बिहार के इथेनॉल प्लांट्स पर संकट क्यों, क्या है नई पॉलिसी?

सरकार का एक नियम…15 लाख लोगों की कमाई घटेगी!:70 हजार की नौकरी जाएगी, बिहार के इथेनॉल प्लांट्स पर संकट क्यों, क्या है नई पॉलिसी?

नीतीश सरकार 2021 में अपनी इथेनॉल नीति लेकर आई थी। मकसद था बिहार को इथेनॉल उत्पादन में अव्वल राज्य बनाना। इसके लिए 100 से ज्यादा प्लांट लगाने की तैयारी थी। 2017 में इसकी मंजूरी मिली, लेकिन अब 4 साल के भीतर ही इनमें से 10 प्लांट बंदी के कगार पर हैं। नतीजा, सीधे तौर पर बिहार में 5 हजार से ज्यादा लोग बेरोजगार हो जाएंगे। 70 हजार से ज्यादा लोगों पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सीधा असर पड़ेगा। उनकी नौकरी जाएगी। 15 लाख मक्का किसानों की आमदनी घटेगी। आखिर क्यों बिहार में इथेनॉल प्लांट अपने शुरुआती दौर में ही संकट में घिर गए हैं? क्या इसके लिए बिहार सरकार जिम्मेदार है? क्या सरकार ने उद्यमियों के साथ धोखा किया है? इससे बिहार सरकार को कितना नुकसान हो सकता है? इसका समाधान क्या होगा? 8 पॉइंट में पूरा मामला समझिए… 1. इथेनॉल प्लांट पर अचानक संकट क्यों आया है? क्या प्लांट संचालकों को इसकी जानकारी नहीं थी? देश में फिलहाल इथेनॉल के खरीदार केवल तेल वितरण कंपनियां (इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम) हैं। उनके अलावा इथेनॉल किसी और को नहीं बेचा जा सकता। बिक्री करने वाले इथेनॉल प्लांट के संचालक हैं। बिहार इथेनॉल एसोसिएशन के सचिव कुणाल किशोर ने बताया कि तेल कंपनियां दो तरह के इसकी खरीदारी करती है। उन्होंने कहा, ‘इसके साथ तेल कंपनियों ने एग्रीमेंट के दौरान प्लांट संचालकों से एक और बात की रजामंदी दी थी कि अगर करार की मात्रा से अधिक इथेनॉल की जरूरत होगी तो इसे खरीदने के लिए प्राथमिकता उस प्लांट को देंगे, जिसके साथ पहले से करार है। अगर इनके पास पर्याप्त मात्रा में इथेनॉल नहीं होगा तब बिना एग्रीमेंट वाले प्लांट से संपर्क करेंगे।’ 2. जब कंपनी तेल खरीद रही है तो प्लांट बंद होने की बात कहां से आ रही? किशोर कुणाल ने बताया कि बिहार के 17 लोगों ने प्लांट में निवेश कर लाइसेंस लिया है। कंपनियों ने 10 साल का एग्रीमेंट किया है। एग्रीमेंट में इथेनॉल खरीद की मात्रा को दो हिस्से में बांटा गया है। 50 प्रतिशत एग्रीमेंट के तहत और 50 प्रतिशत दूसरे से पहले। उन्होंने कहा, ‘समस्या ये है कि अभी तक कंपनी एग्रीमेंट से ज्यादा मात्रा में इथेनॉल इन प्लांटों से ले रही थी। ऐसे में बिहार के जितने भी प्लांट हैं, उन्होंने अपने तय एग्रीमेंट से दोगुनी क्षमता का प्लांट बना लिया है। अभी तक जितना उत्पादन हो रहा था, सब बिक भी जा रहा था।’ अब समझिए क्या है परेशानी… 3. ऑयल कंपनी के इस फैसले का प्लांट संचालकों पर क्या असर पड़ेगा? प्लांट संचालक बताते हैं, ‘समस्या ये है कि इथेनॉल को दूसरी जगह बेचा नहीं जा सकता। इसे 30 दिन से ज्यादा स्टोर नहीं कर सकते। प्लांट आधी क्षमता पर नहीं चला सकते। जितनी डिमांड तेल कंपनियों की तरफ से की गई है। अपनी क्षमता के मुताबिक ये प्लांट 3-4 महीने में उतना उत्पादन कर देंगी। ऐसे में 8 महीने तक प्लांट बंद रखना पड़ेगा। ऐसे में एक प्लांट को चलाने के लिए जो फाइनांशियल सपोर्ट की जरूरत है वो हासिल नहीं हो पाएगी। ओवरऑल साल भर में जितना कमाएंगे बैंक का ईएमआई भी नहीं दे पाएंगे। न ही अपने कर्मचारी को सैलरी दे सकेंगे। 4. प्लांट बंद होने का असर कितने लोगों पर पड़ेगा? बिहार इथेनॉल एसोसिएशन के सचिव किशोर कुणाल ने कहा, ‘औसतन 100 किलो लीटर के एक प्लांट में 250 हाइली ट्रेंड एंप्लॉइज होते हैं। केमिकल इंजीनियर से लेकर टेक्निकल इंजीनियर तक, जिनकी सैलरी लाखों में रहती है। इनके अलावा प्रत्यक्ष तौर पर सैकड़ों लोगों को काम मिलता है। अप्रत्यक्ष तौर लाखों लोगों का इकोसिस्टम जुड़ा होता है। इसमें किसान से लेकर ट्रैक्टर ड्राइवर तक शामिल होते हैं। ये प्लांट सरकार को सालाना लगभग 20 करोड़ रुपए का टैक्स देते हैं।’ बिहार में देशभर का 25% मक्का उत्पादन होता है। बिहार में ज्यादातर प्लांट मक्का से इथेनॉल बनाते हैं। इससे मक्का की कीमत में लगभग डेढ़ गुणा तक का इजाफा हुआ था। ये प्लांट अगर अपने फुल फोर्स के साथ चलते रहे तो मक्का किसानों को इससे काफी लाभ हो सकता है। 5. प्लांट संचालकों की क्या डिमांड है? इसके लिए उन्होंने क्या किया है? प्लांट संचालक ने बताया कि बिहार के प्लांट फुल फ्लैज्ड चालू रहने पर 47.64 करोड़ लीटर इथेनॉल उत्पादन करते हैं। इस वित्तीय वर्ष में तेल कंपनियों ने 23.82 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने का अलॉटमेंट दिया है। अगर 24 करोड़ लीटर इथेनॉल और खरीदने का आश्वासन मिल जाता है तो बिहार के प्लांट के संचालन में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। बिहार इथेनॉल एसोसिएशन ने इसके लिए बिहार के उद्योग विभाग के सचिव, मुख्य सचिव से लेकर केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय तक अपनी समस्या पहुंचाई है। सभी जगह से आश्वासन मिला है, लेकिन प्लांट संचालकों को अभी तक कोई समाधान मिलता नहीं दिख रहा है। 6. केंद्र सरकार इथेनॉल ​​​​​​का क्या कर रही है? अभी देश में कितनी जरूरत है? केंद्र सरकार ने साल 2006 में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर बेचने का निर्णय लिया। 2018 से पहले बिहार में मिलावट बेहद कम स्तर पर हो रही थी। 2018 में मोदी सरकार ने इसके लिए एक नीति बनाई और पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट बढ़ाकर 20 फीसदी करने का निर्णय लिया। इसके बाद देश में इथेनॉल ​​​​​​​की डिमांड 1350 करोड़ लीटर तक पहुंच गई। नतीजा सभी राज्यों को अपनी अलग इथेनॉल ​​​​​​​नीति बनानी पड़ी। हर राज्य में इथेनॉल ​​​​​​​के प्लांट लगने लगे। इसके उत्पादन में तेजी आई। नतीजा डिमांड से ज्यादा सप्लाई होने लगी। मौजूदा समय में तेल कंपनियों को 1350 करोड़ लीटर इथेनॉल ​​​​​​​की जरूरत है, जबकि देश भर में 1700 करोड़ लीटर इथेनॉल ​​​​​​​का उत्पादन हो रहा है। इथेनॉल के प्लांट दो प्रकार के होते हैं ग्रेन सेक्टर के प्लांट- मक्का, ब्रोकन राइस और एफसीआई के सरप्लस चावल का इस्तेमाल इसमें किया जाता है। शुगर सेक्टर के प्लांट- गन्ना, मोलासे और चीनी, शुगर सीरप से इथेनॉल​​​​​​​ बनाया जा सकता है। 7. क्या बिहार सरकार की इसमें कोई भूमिका है? बिल्कुल नहीं, बिहार सरकार की भूमिका बस प्लांट के चालू होने तक है। जमीन की लीज से लेकर बैंक से लोन दिलाने तक में बिहार सरकार मदद करती है। इसके बाद ये सीधे तौर पर केंद्र का मामला होता है। पेट्रोलियम मिनिस्ट्री के अधीन ही तेल कंपनियां आती हैं। सब कुछ वहीं से कंट्रोल किया जाता है। प्लांट संचालकों के आरोप पर तेल कंपनियों ने क्या कहा? तेल कंपनियों का पक्ष जानने के लिए हमने इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम के बिहार-झारखंड के अधिकारी से लेकर दिल्ली और मुंबई तक के अधिकारियों को फोन किया। पटना के अधिकारियों का कहना है कि दिल्ली वाले बताएंगे और दिल्ली के अधिकारियों का कहना है कि हम इसके लिए अधिकृत नहीं हैं। मुंबई के अधिकारियों ने कहा कि हम फिलहाल इस पर कुछ नहीं बोल सकते हैं। अभी तक तेल कपंनियों की ओर से कोई स्पष्ट पक्ष नहीं आया है। जैसे ही उनका पक्ष आता है, हम उसे भी अपनी खबर में जगह देंगे। 8. बिहार के उद्योग मंत्री प्लांट को बचाने के लिए क्या कर रहे हैं? बिहार के उद्योग मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल ने इस संबंध में कहा, ‘इथेनॉल​​​​​​​ प्लांट में जो प्रोडक्शन होता था, केंद्र सरकार उसकी पूरी खरीदारी करती थी। अभी केंद्र सरकार उत्पादन के हिसाब से खरीदारी नहीं कर रही है। इसके कारण परेशानी हो रही है। हम लोग केंद्र सरकार से इस मामले पर बात कर रहे हैं। हम लोगों ने अनुरोध किया है कि इथेनॉल ​​​​​​​की मिक्सिंग की मात्रा बढ़ाई जाए तो यह समस्या दूर हो जाएगी। केंद्र सरकार इस पर लगातार विचार कर रही है।’ इथेनॉल प्लांट बंद हुए तो 15 लाख किसानों की घटेगी कमाई बिहार मक्का उत्पादन में देश के शीर्ष राज्यों में स्थान रखता है। 2024-25 में यहां 9.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मक्का की खेती की गई। 66.03 लाख मीट्रिक टन उत्पादन हुआ। बिहार में मक्के का इस्तेमाल सबसे अधिक इथेनॉल बनाने में होता है। इसके बाद मुर्गी दाना और पशु आहार तैयार करने में होता है। इथेनॉल​​​​​​​ प्लांट लगने के बाद पिछले कुछ वर्षों में मक्के की मांग और कीमत बढ़ी थी। मक्का जो कभी 12-15 रुपए प्रति किलो बिकता था, 20 रुपए प्रति किलो से अधिक रेट पर बिकने लगा। इथेनॉल प्लांट बंद होने की आशंका ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। बिहार के 15-17 लाख किसान मक्का की खेती करते हैं। कीमत गिरने से उनकी कमाई घटेगी। वैशाली जिले के किसान प्रमोद सिंह ने बताया, ‘मक्का हमारे लिए आमदनी का बड़ा स्रोत है। आलू की फसल के बाद हमलोग मक्का लगाते हैं। कम लागत में मक्का प्रति कट्ठा एक क्विंटल से ज्यादा उपज देता है। कीमत भी करीब 2000 रुपए प्रति क्विंटल मिल जाती है। इथेनॉल प्लांट बंद होने से मक्के की कीमत गिरने का डर है।’ नीतीश सरकार 2021 में अपनी इथेनॉल नीति लेकर आई थी। मकसद था बिहार को इथेनॉल उत्पादन में अव्वल राज्य बनाना। इसके लिए 100 से ज्यादा प्लांट लगाने की तैयारी थी। 2017 में इसकी मंजूरी मिली, लेकिन अब 4 साल के भीतर ही इनमें से 10 प्लांट बंदी के कगार पर हैं। नतीजा, सीधे तौर पर बिहार में 5 हजार से ज्यादा लोग बेरोजगार हो जाएंगे। 70 हजार से ज्यादा लोगों पर प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सीधा असर पड़ेगा। उनकी नौकरी जाएगी। 15 लाख मक्का किसानों की आमदनी घटेगी। आखिर क्यों बिहार में इथेनॉल प्लांट अपने शुरुआती दौर में ही संकट में घिर गए हैं? क्या इसके लिए बिहार सरकार जिम्मेदार है? क्या सरकार ने उद्यमियों के साथ धोखा किया है? इससे बिहार सरकार को कितना नुकसान हो सकता है? इसका समाधान क्या होगा? 8 पॉइंट में पूरा मामला समझिए… 1. इथेनॉल प्लांट पर अचानक संकट क्यों आया है? क्या प्लांट संचालकों को इसकी जानकारी नहीं थी? देश में फिलहाल इथेनॉल के खरीदार केवल तेल वितरण कंपनियां (इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम) हैं। उनके अलावा इथेनॉल किसी और को नहीं बेचा जा सकता। बिक्री करने वाले इथेनॉल प्लांट के संचालक हैं। बिहार इथेनॉल एसोसिएशन के सचिव कुणाल किशोर ने बताया कि तेल कंपनियां दो तरह के इसकी खरीदारी करती है। उन्होंने कहा, ‘इसके साथ तेल कंपनियों ने एग्रीमेंट के दौरान प्लांट संचालकों से एक और बात की रजामंदी दी थी कि अगर करार की मात्रा से अधिक इथेनॉल की जरूरत होगी तो इसे खरीदने के लिए प्राथमिकता उस प्लांट को देंगे, जिसके साथ पहले से करार है। अगर इनके पास पर्याप्त मात्रा में इथेनॉल नहीं होगा तब बिना एग्रीमेंट वाले प्लांट से संपर्क करेंगे।’ 2. जब कंपनी तेल खरीद रही है तो प्लांट बंद होने की बात कहां से आ रही? किशोर कुणाल ने बताया कि बिहार के 17 लोगों ने प्लांट में निवेश कर लाइसेंस लिया है। कंपनियों ने 10 साल का एग्रीमेंट किया है। एग्रीमेंट में इथेनॉल खरीद की मात्रा को दो हिस्से में बांटा गया है। 50 प्रतिशत एग्रीमेंट के तहत और 50 प्रतिशत दूसरे से पहले। उन्होंने कहा, ‘समस्या ये है कि अभी तक कंपनी एग्रीमेंट से ज्यादा मात्रा में इथेनॉल इन प्लांटों से ले रही थी। ऐसे में बिहार के जितने भी प्लांट हैं, उन्होंने अपने तय एग्रीमेंट से दोगुनी क्षमता का प्लांट बना लिया है। अभी तक जितना उत्पादन हो रहा था, सब बिक भी जा रहा था।’ अब समझिए क्या है परेशानी… 3. ऑयल कंपनी के इस फैसले का प्लांट संचालकों पर क्या असर पड़ेगा? प्लांट संचालक बताते हैं, ‘समस्या ये है कि इथेनॉल को दूसरी जगह बेचा नहीं जा सकता। इसे 30 दिन से ज्यादा स्टोर नहीं कर सकते। प्लांट आधी क्षमता पर नहीं चला सकते। जितनी डिमांड तेल कंपनियों की तरफ से की गई है। अपनी क्षमता के मुताबिक ये प्लांट 3-4 महीने में उतना उत्पादन कर देंगी। ऐसे में 8 महीने तक प्लांट बंद रखना पड़ेगा। ऐसे में एक प्लांट को चलाने के लिए जो फाइनांशियल सपोर्ट की जरूरत है वो हासिल नहीं हो पाएगी। ओवरऑल साल भर में जितना कमाएंगे बैंक का ईएमआई भी नहीं दे पाएंगे। न ही अपने कर्मचारी को सैलरी दे सकेंगे। 4. प्लांट बंद होने का असर कितने लोगों पर पड़ेगा? बिहार इथेनॉल एसोसिएशन के सचिव किशोर कुणाल ने कहा, ‘औसतन 100 किलो लीटर के एक प्लांट में 250 हाइली ट्रेंड एंप्लॉइज होते हैं। केमिकल इंजीनियर से लेकर टेक्निकल इंजीनियर तक, जिनकी सैलरी लाखों में रहती है। इनके अलावा प्रत्यक्ष तौर पर सैकड़ों लोगों को काम मिलता है। अप्रत्यक्ष तौर लाखों लोगों का इकोसिस्टम जुड़ा होता है। इसमें किसान से लेकर ट्रैक्टर ड्राइवर तक शामिल होते हैं। ये प्लांट सरकार को सालाना लगभग 20 करोड़ रुपए का टैक्स देते हैं।’ बिहार में देशभर का 25% मक्का उत्पादन होता है। बिहार में ज्यादातर प्लांट मक्का से इथेनॉल बनाते हैं। इससे मक्का की कीमत में लगभग डेढ़ गुणा तक का इजाफा हुआ था। ये प्लांट अगर अपने फुल फोर्स के साथ चलते रहे तो मक्का किसानों को इससे काफी लाभ हो सकता है। 5. प्लांट संचालकों की क्या डिमांड है? इसके लिए उन्होंने क्या किया है? प्लांट संचालक ने बताया कि बिहार के प्लांट फुल फ्लैज्ड चालू रहने पर 47.64 करोड़ लीटर इथेनॉल उत्पादन करते हैं। इस वित्तीय वर्ष में तेल कंपनियों ने 23.82 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने का अलॉटमेंट दिया है। अगर 24 करोड़ लीटर इथेनॉल और खरीदने का आश्वासन मिल जाता है तो बिहार के प्लांट के संचालन में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। बिहार इथेनॉल एसोसिएशन ने इसके लिए बिहार के उद्योग विभाग के सचिव, मुख्य सचिव से लेकर केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय तक अपनी समस्या पहुंचाई है। सभी जगह से आश्वासन मिला है, लेकिन प्लांट संचालकों को अभी तक कोई समाधान मिलता नहीं दिख रहा है। 6. केंद्र सरकार इथेनॉल ​​​​​​का क्या कर रही है? अभी देश में कितनी जरूरत है? केंद्र सरकार ने साल 2006 में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर बेचने का निर्णय लिया। 2018 से पहले बिहार में मिलावट बेहद कम स्तर पर हो रही थी। 2018 में मोदी सरकार ने इसके लिए एक नीति बनाई और पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट बढ़ाकर 20 फीसदी करने का निर्णय लिया। इसके बाद देश में इथेनॉल ​​​​​​​की डिमांड 1350 करोड़ लीटर तक पहुंच गई। नतीजा सभी राज्यों को अपनी अलग इथेनॉल ​​​​​​​नीति बनानी पड़ी। हर राज्य में इथेनॉल ​​​​​​​के प्लांट लगने लगे। इसके उत्पादन में तेजी आई। नतीजा डिमांड से ज्यादा सप्लाई होने लगी। मौजूदा समय में तेल कंपनियों को 1350 करोड़ लीटर इथेनॉल ​​​​​​​की जरूरत है, जबकि देश भर में 1700 करोड़ लीटर इथेनॉल ​​​​​​​का उत्पादन हो रहा है। इथेनॉल के प्लांट दो प्रकार के होते हैं ग्रेन सेक्टर के प्लांट- मक्का, ब्रोकन राइस और एफसीआई के सरप्लस चावल का इस्तेमाल इसमें किया जाता है। शुगर सेक्टर के प्लांट- गन्ना, मोलासे और चीनी, शुगर सीरप से इथेनॉल​​​​​​​ बनाया जा सकता है। 7. क्या बिहार सरकार की इसमें कोई भूमिका है? बिल्कुल नहीं, बिहार सरकार की भूमिका बस प्लांट के चालू होने तक है। जमीन की लीज से लेकर बैंक से लोन दिलाने तक में बिहार सरकार मदद करती है। इसके बाद ये सीधे तौर पर केंद्र का मामला होता है। पेट्रोलियम मिनिस्ट्री के अधीन ही तेल कंपनियां आती हैं। सब कुछ वहीं से कंट्रोल किया जाता है। प्लांट संचालकों के आरोप पर तेल कंपनियों ने क्या कहा? तेल कंपनियों का पक्ष जानने के लिए हमने इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम के बिहार-झारखंड के अधिकारी से लेकर दिल्ली और मुंबई तक के अधिकारियों को फोन किया। पटना के अधिकारियों का कहना है कि दिल्ली वाले बताएंगे और दिल्ली के अधिकारियों का कहना है कि हम इसके लिए अधिकृत नहीं हैं। मुंबई के अधिकारियों ने कहा कि हम फिलहाल इस पर कुछ नहीं बोल सकते हैं। अभी तक तेल कपंनियों की ओर से कोई स्पष्ट पक्ष नहीं आया है। जैसे ही उनका पक्ष आता है, हम उसे भी अपनी खबर में जगह देंगे। 8. बिहार के उद्योग मंत्री प्लांट को बचाने के लिए क्या कर रहे हैं? बिहार के उद्योग मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल ने इस संबंध में कहा, ‘इथेनॉल​​​​​​​ प्लांट में जो प्रोडक्शन होता था, केंद्र सरकार उसकी पूरी खरीदारी करती थी। अभी केंद्र सरकार उत्पादन के हिसाब से खरीदारी नहीं कर रही है। इसके कारण परेशानी हो रही है। हम लोग केंद्र सरकार से इस मामले पर बात कर रहे हैं। हम लोगों ने अनुरोध किया है कि इथेनॉल ​​​​​​​की मिक्सिंग की मात्रा बढ़ाई जाए तो यह समस्या दूर हो जाएगी। केंद्र सरकार इस पर लगातार विचार कर रही है।’ इथेनॉल प्लांट बंद हुए तो 15 लाख किसानों की घटेगी कमाई बिहार मक्का उत्पादन में देश के शीर्ष राज्यों में स्थान रखता है। 2024-25 में यहां 9.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मक्का की खेती की गई। 66.03 लाख मीट्रिक टन उत्पादन हुआ। बिहार में मक्के का इस्तेमाल सबसे अधिक इथेनॉल बनाने में होता है। इसके बाद मुर्गी दाना और पशु आहार तैयार करने में होता है। इथेनॉल​​​​​​​ प्लांट लगने के बाद पिछले कुछ वर्षों में मक्के की मांग और कीमत बढ़ी थी। मक्का जो कभी 12-15 रुपए प्रति किलो बिकता था, 20 रुपए प्रति किलो से अधिक रेट पर बिकने लगा। इथेनॉल प्लांट बंद होने की आशंका ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। बिहार के 15-17 लाख किसान मक्का की खेती करते हैं। कीमत गिरने से उनकी कमाई घटेगी। वैशाली जिले के किसान प्रमोद सिंह ने बताया, ‘मक्का हमारे लिए आमदनी का बड़ा स्रोत है। आलू की फसल के बाद हमलोग मक्का लगाते हैं। कम लागत में मक्का प्रति कट्ठा एक क्विंटल से ज्यादा उपज देता है। कीमत भी करीब 2000 रुपए प्रति क्विंटल मिल जाती है। इथेनॉल प्लांट बंद होने से मक्के की कीमत गिरने का डर है।’  

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