मैनपुरी के कचहरी रोड स्थित रज्जो देवी कबीर आश्रम में रविवार को एक सत्संग का आयोजन किया गया। आश्रम के महंत अमर साहेब की अध्यक्षता में हुए इस सत्संग में बड़ी संख्या में संत भक्त उपस्थित रहे। सत्संग के दौरान महंत अमर साहेब ने हिरण और कस्तूरी का उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस प्रकार हिरण की नाभि में कस्तूरी होती है, लेकिन वह उसे जंगल में इधर-उधर खोजता फिरता है। जब वह थककर बैठता है और उसकी नासिका नाभि के पास आती है, तब उसे अपनी भूल का एहसास होता है। इसी तरह, हर साधक अपनी सत्य आत्मा और परमात्मा को मन और इंद्रियों के माध्यम से बाहर खोजता रहता है। जबकि परमात्मा तो हमारे हृदय में ही निवास करते हैं। महंत साहेब ने तुलसीदास जी का भी उल्लेख किया, जिन्होंने कहा है कि परमात्म सत्ता घट के भीतर ही विराजमान है, जिसे लोग बाहर ढूंढते हैं। उन्होंने आगे कहा कि लोगों को मोतियाबिंद हो गया है, इसलिए उन्हें घट के अंदर रहने वाला राम दिखाई नहीं देता। जैसे तिल में तेल और चकमक पत्थर में आग होती है, वैसे ही राम हमारे भीतर विराजमान हैं। इसे देखने के लिए बाहरी नेत्र नहीं, बल्कि तीसरे नेत्र या विवेक की आंख की आवश्यकता होती है। महंत साहेब ने बताया कि जिस प्रकार कच्चे और पक्के हीरे को केवल एक सच्चा जौहरी ही पहचान सकता है, उसी प्रकार सत्य आत्मा रूपी हीरे को वही व्यक्ति देख सकता है जिसकी अंदर की विवेक की आंख, जिसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं, प्रस्फुटित हो गई हो। रामायण में भी कहा गया है कि सत्य के समान कोई दूसरा धर्म नहीं है। उन्होंने सच्चे संत और सतगुरु जनों के सत्संग की महत्ता पर जोर दिया, क्योंकि यह हमारी आत्मिक स्थिति को समझने और परमात्मा का साक्षात्कार करने के लिए आवश्यक है। इस अवसर पर आत्माराम दास दुबे, कालीचरण दास, राम सेवक दास, सियाराम दास, प्रखर दास, राजेंद्र दास और अरविंद दास सहित कई संत भक्त मौजूद रहे।


