इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस व न्यायिक मजिस्ट्रेटों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए ताकि उन्हें पता चले कि कपट व आपराधिक न्यास भंग जुड़वां अपराध नहीं है। दोनों में अंतर है। दोनों का अस्तित्व अलग है। दोनों एक समय एक साथ नहीं हो सकते। कोर्ट ने कहा पुलिस व मजिस्ट्रेट के दिमाग में कानून को लेकर भ्रम है। वे धारा 406 व 420 में दंडनीय अपराध का अंतर समझ नहीं पा रहे हैं। कोर्ट ने इसी के साथ ए सी जे एम गोरखपुर द्वारा धारा 406,420,467,468,471,व120बी के तहत याची को जारी सम्मन आदेश रद्द कर दिया और दिल्ली रेस क्लब केस में स्थापित सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था के अनुसार नये सिरे से आदेश जारी करने के लिए प्रकरण वापस कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने श्रीमती प्रभा सिंह व एक अन्य की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया है। याचिका पर याची का कहना था कि कपट व आपराधिक न्यास भंग के अपराध में काफी अंतर है। दोनों एक नहीं है, बल्कि भिन्न है। स्वतंत्र अपराध है। दोनों अपराध एक साथ नहीं किए जा सकते। दिल्ली रेस क्लब केस में कोर्ट ने साफ कहा है कि कपट में मंशा महत्वपूर्ण है। जो शुरू से ही झूठ व बेईमानी,धोखे से संपत्ति प्राप्त कर हड़पने की होती है।जबकि न्यास भंग में विश्वास के साथ वैध तरीके से संपत्ति दी जाती है और बाद में विश्वास तोड़कर संपत्ति हड़पी जाती है। इसलिए दोनों अपराध एक साथ नहीं किए जा सकते। अदालत से दोनों धाराओं में सम्मन जारी करना उचित नहीं है। मामला थाना खोराबार, गोरखपुर से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कपट धारा 415 मे है और धारा 420 मे दंडनीय है जबकि आपराधिक न्यास भंग धारा 405 मे है जो धारा 406 मे दंडनीय अपराध है।एक अपराध होगा तो उसी समय दूसरा नहीं हो सकता। दोनों धाराओं में एक साथ आपराधिक केस कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती।


