600KG सोना दान करने वाली महारानी का बनेगा मंदिर:दरभंगा राजघराने का 400 साल पुराना है इतिहास, चिता पर मंदिर बनवाते हैं वारिस

600KG सोना दान करने वाली महारानी का बनेगा मंदिर:दरभंगा राजघराने का 400 साल पुराना है इतिहास, चिता पर मंदिर बनवाते हैं वारिस

दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी और भारत सरकार को 600KG सोना दान करने वाली कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। राजघराने की परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार माधेश्वरी परिसर में किया गया। यह वही परिसर है, जहां पिछले करीब 250 वर्षों से दरभंगा राज परिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार होता आ रहा है। दरभंगा राजघराने की एक विशिष्ट परंपरा है कि परिवार के प्रत्येक सदस्य की चिता पर मंदिर का निर्माण किया जाता है। माधेश्वरी परिसर में अब तक कुल 9 मंदिर हैं, जो सभी किसी-न-किसी राजपरिवार के सदस्य की चिता पर बने हुए हैं। इन मंदिरों में प्रतिदिन पूजा-पाठ होता है और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। सुबह से ही लंबी कतारें लग जाती हैं। यहां देश ही नहीं, विदेशों से भी श्रद्धालु पूजा करने पहुंचते हैं। राजघराने के अंतिम महाराज कामेश्वर सिंह के चिता पर मंदिर तो है, लेकिन उनकी महारानी के चिता पर कोई मंदिर नहीं है। बड़ी महारानी राजलक्ष्मी की चिता पर एक पेड़ लगाया गया है, जहां डीह बाबा की मूर्ति रखी गई है। दूसरी महारानी कामेश्वरी प्रिया के चिता पर कोई मंदिर नहीं है। सबसे पहले देखिए महारानी कामसुंदरी देवी के अंतिम संस्कार की तस्वीरें… आखिर राजघराने के किसी भी व्यक्ति के चिता पर मंदिर क्यों बनाया जाता है? इसकी शुरुआत कब से हुई? जब सभी की चिता पर मंदिर बना तो दोनों महारानियों की चिता पर मंदिर क्यो नहीं बना है? क्या कामसुंदरी के चिता पर भी मंदिर बनेगा? इसको जानने के लिए हम राजपरिवार के अगले वारिस कुमार कपिलेश्वर से मिले। जानिए उन्होंने क्या कहा…। 400 साल से भी पुराना है दरभंगा राजपरिवार का इतिहास माधेश्वरी परिसर में हमारी मुलाकात दरभंगा राजघराने के उत्तराधिकारी कुमार कपिलेश्वेर माधेश्वरी से हुई। वो श्राद्ध कर्म की तैयारियों में जुटे थे। हमने उनसे बात की और जानने की कोशिश कि क्या कामसुंदरी देवी के चिता पर मंदिर बनेगा? उन्होंने बताया, ‘हमारा इतिहास 400 साल से अधिक का है। हमारी परंपरा है कि हमारे परिवार के किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उनकी चिता पर मंदिर बनाया जाता है।’ पूरे विश्व में यही एक जगह है, जहां श्मशान में मंदिर- श्रद्धालु​​ मंदिर में काफी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ थी। हमने श्रद्धालुओं से भी बात की। मंदिर में पूजा करने आए स्थानीय निवासी केदारनाथ मिश्रा ने बताया कि उम्र 73 साल हो गया है। बचपन से ही हम मंदिर में आते हैं। जब हम छोटे थे, तब से ही इस मंदिर में पूजा के लिए आते हैं। राजघराने के सदस्यों की चिता पर मंदिर बनाने का इतिहास राजपरिवार के वारिस से मुलाकात के बाद हम कामेश्वर सिंह यूनिवर्सिटी में इतिहासकार संतोष कुमार से मिले। हमने उनसे मंदिर बनने के इतिहास और राजघराने के बारे में विस्तार से जाना। उन्होंने बताया कि यह इलाका रामबाग पैलेस का इलाका है। राजघराने का सबसे प्राइम इलाका है। राजतंत्र में राजा अपने राज्य को चलाने के लिए अपने नियम लागू करते थे। उनका अपना संविधान होता था। इतिहासकार संतोष कुमार के मुताबिक, दरभंगा महाराज माधव के चुने जगह पर ही राजघराने के सभी लोगों का अंतिम संस्कार हो रहा है। हालांकि, महाराज माधव सिंह का अंतिम संस्कार इस कैंपस में नहीं हुआ था। उनका अस्थि कलश इस कैंपस में महादेव मंदिर के परिसर में रखा गया है। महाराज माधव ने ही पहली बार इस जगह पर माधेश्वर महादेव मंदिर बनवाया था। आत्मा की मुक्ति से जुड़ा है चिता पर मंदिर बनाने का इतिहास इतिहासकार संतोष कुमार के मुताबिक, दरभंगा राज के महाराज रामेश्वर सिंह मां काली के बहुत बड़े उपासक थे। साथ ही वह पर्यावरण प्रेमी भी थे। वह तंत्र साधना के भी बहुत बड़े साधक थे। रामेश्वर सिंह मां काली की रौद्र रूप की पूजा करते थे। महाराज मां काली के रौद्र रुप को अपना विजय प्रतीक मानते थे। उनका मानना था कि माता की उस रूप की पूजा करने से जिस तरह काली ने राक्षसों का नाश किया था। वैसे ही हम भी अपने दुश्मनों को खत्म कर सकते हैं। मंदिर के अंदर मां काली का रौद्र रूप है, जिसकी महाराज रामेश्वर सिंह उपासना करते थे। मां का काला रूप, जीभ बाहर, चार भुजाएं, तारा-मुंड माला लिए हुए मां काली की प्रतिमा है। मंदिर की गुंबज भगवती के 49 अंग के प्रतीक से बनाया गया है। रामेश्वर सिंह के चिता पर मंदिर बनने के बाद कामेश्वर सिंह ने अपने अन्य पूर्वजों की चिता पर भी मंदिर बनवाया। ताकि उन सभी के आत्मा को मुक्ति मिले। सभी की चिता पर मां काली के अलग-अलग रूपों की प्रतिमा है। राजपरिवार के इन सदस्यों का बना है मंदिर इतिहासकार संतोष कुमार के मुताबिक, महाराज रुद्र सिंह की चिता पर रुदेश्वरी काली, महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह की चिता पर लक्ष्मीश्वरी तारा मंदिर, महाराज कामेश्वर सिंह की चिता पर छोटी श्यामा मंदिर, महादेव मंदिर के परिसर में महाराज माधव का अस्थि कलश रखा गया है। महारानी कामेश्वरी प्रिया की चिता पर अन्नपूर्णा माता मंदिर सहित टोटल 9 मंदिर हैं। बाकि और लोगों के चिता पर पीपल और बरगद के पेड़ लगाए गए हैं। महारानी राज लक्ष्मी ने अपना हीरा का हार बेचकर महाराज कामेश्वर सिंह के चिता पर मंदिर बनवाया था। राजपरिवार के सदस्यों की चिता पर बनी मंदिरों की तस्वीरें… कैसे लोगों की आस्था का केंद्र बना राजपरिवार का मंदिर? मंदिर को लेकर पहले उतना चर्चा नहीं था, क्योंकि इस मंदिर में राज परिवार के लोग ही आते थे। 1987 के आसपास भूकम्प से यहां काफी नुकसान हुआ। लोगों के घर तक उजड़ गए। तब यह रामबाग पैलेस आम लोगों के लिए भी खोल दिया गया। रामबाग पैलेस में हजारों के संख्या में लोग रहने लगे। उस समय यह माधेश्वरी परिसर भी आम लोगों के लिए खुला था। यहां भी हजारों लोग रह रहे थे। उस समय लोगों ने मां काली की पूजा करनी शुरू की। तब से ही लोगों की आस्था इस मंदिर से जुड़ गई। इतिहासकार संतोष कुमार आगे बताते हैं कि दरभंगा राज परिवार खंडवाल कुल के हैं। इनका 450 साल का इतिहास है। राज परिवार के आखिरी महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी महारानी कामसुंदरी देवी थी। महाराजा कामेश्वर सिंह राज्यसभा के मेंबर रहे हैं। वह संविधान सभा के भी मेंबर रहे हैं। पूरी संपत्ति देश को समर्पित करने वाला राजपरिवार यह ऐसा परिवार है, जिसने अपने लिए बिना कुछ बचाए पूरी संपत्ति देश के नाम कर दिया। भारत-चीन युद्ध के दौरान राज परिवार ने आर्थिक रूप से सरकार का सहयोग किया। राज परिवार ने बनारस विश्वविद्यालय, दरभंगा में दो-दो विश्वविद्यालय, पटना में विश्वविद्यालय के लिए जमीन और पैसे दिए। इस परिवार की आखिरी रानी थी कामसुंदरी देवी। इनका नाम कल्याणी है, लेकिन घर में इन्हें कामसुंदरी कहते थे। राजपरिवार के योगदान को लेकर कपिलेश्वर सिंह कहते है कि दरभंगा राज परिवार हमेशा से लोगों की सेवा के लिए तत्पर रहा है। हर समय में सरकार और लोगों को आर्थिक से लेकर जमीन और अन्य प्रकार की सेवा करते रहे हैं। 1962 के युद्ध में 600 किलो सोना का दान साल 1962 में भारत-चाइना वार हुआ तो सरकार ने मदद की गुहार लगाई थी। इसके बाद दरभंगा राज सबसे पहले मदद के लिए आगे आया था। दरभंगा के इंद्रभवन मैदान में 15 मन यानी 600 किलो सोना तौला गया और उसे लड़ाई में मदद के लिए राज परिवार की तरफ से दान में दिया गया था। दरभंगा राज ने अपना तीन-तीन एयरक्रॉफ्ट भी लड़ाई के लिए दान कर दिया। अपना खुद का 90 एकड़ का एयरपोर्ट भी दान कर दिया था। आज इसी जमीन पर दरभंगा एयरपोर्ट बना है। दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी और भारत सरकार को 600KG सोना दान करने वाली कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। राजघराने की परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार माधेश्वरी परिसर में किया गया। यह वही परिसर है, जहां पिछले करीब 250 वर्षों से दरभंगा राज परिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार होता आ रहा है। दरभंगा राजघराने की एक विशिष्ट परंपरा है कि परिवार के प्रत्येक सदस्य की चिता पर मंदिर का निर्माण किया जाता है। माधेश्वरी परिसर में अब तक कुल 9 मंदिर हैं, जो सभी किसी-न-किसी राजपरिवार के सदस्य की चिता पर बने हुए हैं। इन मंदिरों में प्रतिदिन पूजा-पाठ होता है और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। सुबह से ही लंबी कतारें लग जाती हैं। यहां देश ही नहीं, विदेशों से भी श्रद्धालु पूजा करने पहुंचते हैं। राजघराने के अंतिम महाराज कामेश्वर सिंह के चिता पर मंदिर तो है, लेकिन उनकी महारानी के चिता पर कोई मंदिर नहीं है। बड़ी महारानी राजलक्ष्मी की चिता पर एक पेड़ लगाया गया है, जहां डीह बाबा की मूर्ति रखी गई है। दूसरी महारानी कामेश्वरी प्रिया के चिता पर कोई मंदिर नहीं है। सबसे पहले देखिए महारानी कामसुंदरी देवी के अंतिम संस्कार की तस्वीरें… आखिर राजघराने के किसी भी व्यक्ति के चिता पर मंदिर क्यों बनाया जाता है? इसकी शुरुआत कब से हुई? जब सभी की चिता पर मंदिर बना तो दोनों महारानियों की चिता पर मंदिर क्यो नहीं बना है? क्या कामसुंदरी के चिता पर भी मंदिर बनेगा? इसको जानने के लिए हम राजपरिवार के अगले वारिस कुमार कपिलेश्वर से मिले। जानिए उन्होंने क्या कहा…। 400 साल से भी पुराना है दरभंगा राजपरिवार का इतिहास माधेश्वरी परिसर में हमारी मुलाकात दरभंगा राजघराने के उत्तराधिकारी कुमार कपिलेश्वेर माधेश्वरी से हुई। वो श्राद्ध कर्म की तैयारियों में जुटे थे। हमने उनसे बात की और जानने की कोशिश कि क्या कामसुंदरी देवी के चिता पर मंदिर बनेगा? उन्होंने बताया, ‘हमारा इतिहास 400 साल से अधिक का है। हमारी परंपरा है कि हमारे परिवार के किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उनकी चिता पर मंदिर बनाया जाता है।’ पूरे विश्व में यही एक जगह है, जहां श्मशान में मंदिर- श्रद्धालु​​ मंदिर में काफी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ थी। हमने श्रद्धालुओं से भी बात की। मंदिर में पूजा करने आए स्थानीय निवासी केदारनाथ मिश्रा ने बताया कि उम्र 73 साल हो गया है। बचपन से ही हम मंदिर में आते हैं। जब हम छोटे थे, तब से ही इस मंदिर में पूजा के लिए आते हैं। राजघराने के सदस्यों की चिता पर मंदिर बनाने का इतिहास राजपरिवार के वारिस से मुलाकात के बाद हम कामेश्वर सिंह यूनिवर्सिटी में इतिहासकार संतोष कुमार से मिले। हमने उनसे मंदिर बनने के इतिहास और राजघराने के बारे में विस्तार से जाना। उन्होंने बताया कि यह इलाका रामबाग पैलेस का इलाका है। राजघराने का सबसे प्राइम इलाका है। राजतंत्र में राजा अपने राज्य को चलाने के लिए अपने नियम लागू करते थे। उनका अपना संविधान होता था। इतिहासकार संतोष कुमार के मुताबिक, दरभंगा महाराज माधव के चुने जगह पर ही राजघराने के सभी लोगों का अंतिम संस्कार हो रहा है। हालांकि, महाराज माधव सिंह का अंतिम संस्कार इस कैंपस में नहीं हुआ था। उनका अस्थि कलश इस कैंपस में महादेव मंदिर के परिसर में रखा गया है। महाराज माधव ने ही पहली बार इस जगह पर माधेश्वर महादेव मंदिर बनवाया था। आत्मा की मुक्ति से जुड़ा है चिता पर मंदिर बनाने का इतिहास इतिहासकार संतोष कुमार के मुताबिक, दरभंगा राज के महाराज रामेश्वर सिंह मां काली के बहुत बड़े उपासक थे। साथ ही वह पर्यावरण प्रेमी भी थे। वह तंत्र साधना के भी बहुत बड़े साधक थे। रामेश्वर सिंह मां काली की रौद्र रूप की पूजा करते थे। महाराज मां काली के रौद्र रुप को अपना विजय प्रतीक मानते थे। उनका मानना था कि माता की उस रूप की पूजा करने से जिस तरह काली ने राक्षसों का नाश किया था। वैसे ही हम भी अपने दुश्मनों को खत्म कर सकते हैं। मंदिर के अंदर मां काली का रौद्र रूप है, जिसकी महाराज रामेश्वर सिंह उपासना करते थे। मां का काला रूप, जीभ बाहर, चार भुजाएं, तारा-मुंड माला लिए हुए मां काली की प्रतिमा है। मंदिर की गुंबज भगवती के 49 अंग के प्रतीक से बनाया गया है। रामेश्वर सिंह के चिता पर मंदिर बनने के बाद कामेश्वर सिंह ने अपने अन्य पूर्वजों की चिता पर भी मंदिर बनवाया। ताकि उन सभी के आत्मा को मुक्ति मिले। सभी की चिता पर मां काली के अलग-अलग रूपों की प्रतिमा है। राजपरिवार के इन सदस्यों का बना है मंदिर इतिहासकार संतोष कुमार के मुताबिक, महाराज रुद्र सिंह की चिता पर रुदेश्वरी काली, महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह की चिता पर लक्ष्मीश्वरी तारा मंदिर, महाराज कामेश्वर सिंह की चिता पर छोटी श्यामा मंदिर, महादेव मंदिर के परिसर में महाराज माधव का अस्थि कलश रखा गया है। महारानी कामेश्वरी प्रिया की चिता पर अन्नपूर्णा माता मंदिर सहित टोटल 9 मंदिर हैं। बाकि और लोगों के चिता पर पीपल और बरगद के पेड़ लगाए गए हैं। महारानी राज लक्ष्मी ने अपना हीरा का हार बेचकर महाराज कामेश्वर सिंह के चिता पर मंदिर बनवाया था। राजपरिवार के सदस्यों की चिता पर बनी मंदिरों की तस्वीरें… कैसे लोगों की आस्था का केंद्र बना राजपरिवार का मंदिर? मंदिर को लेकर पहले उतना चर्चा नहीं था, क्योंकि इस मंदिर में राज परिवार के लोग ही आते थे। 1987 के आसपास भूकम्प से यहां काफी नुकसान हुआ। लोगों के घर तक उजड़ गए। तब यह रामबाग पैलेस आम लोगों के लिए भी खोल दिया गया। रामबाग पैलेस में हजारों के संख्या में लोग रहने लगे। उस समय यह माधेश्वरी परिसर भी आम लोगों के लिए खुला था। यहां भी हजारों लोग रह रहे थे। उस समय लोगों ने मां काली की पूजा करनी शुरू की। तब से ही लोगों की आस्था इस मंदिर से जुड़ गई। इतिहासकार संतोष कुमार आगे बताते हैं कि दरभंगा राज परिवार खंडवाल कुल के हैं। इनका 450 साल का इतिहास है। राज परिवार के आखिरी महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी महारानी कामसुंदरी देवी थी। महाराजा कामेश्वर सिंह राज्यसभा के मेंबर रहे हैं। वह संविधान सभा के भी मेंबर रहे हैं। पूरी संपत्ति देश को समर्पित करने वाला राजपरिवार यह ऐसा परिवार है, जिसने अपने लिए बिना कुछ बचाए पूरी संपत्ति देश के नाम कर दिया। भारत-चीन युद्ध के दौरान राज परिवार ने आर्थिक रूप से सरकार का सहयोग किया। राज परिवार ने बनारस विश्वविद्यालय, दरभंगा में दो-दो विश्वविद्यालय, पटना में विश्वविद्यालय के लिए जमीन और पैसे दिए। इस परिवार की आखिरी रानी थी कामसुंदरी देवी। इनका नाम कल्याणी है, लेकिन घर में इन्हें कामसुंदरी कहते थे। राजपरिवार के योगदान को लेकर कपिलेश्वर सिंह कहते है कि दरभंगा राज परिवार हमेशा से लोगों की सेवा के लिए तत्पर रहा है। हर समय में सरकार और लोगों को आर्थिक से लेकर जमीन और अन्य प्रकार की सेवा करते रहे हैं। 1962 के युद्ध में 600 किलो सोना का दान साल 1962 में भारत-चाइना वार हुआ तो सरकार ने मदद की गुहार लगाई थी। इसके बाद दरभंगा राज सबसे पहले मदद के लिए आगे आया था। दरभंगा के इंद्रभवन मैदान में 15 मन यानी 600 किलो सोना तौला गया और उसे लड़ाई में मदद के लिए राज परिवार की तरफ से दान में दिया गया था। दरभंगा राज ने अपना तीन-तीन एयरक्रॉफ्ट भी लड़ाई के लिए दान कर दिया। अपना खुद का 90 एकड़ का एयरपोर्ट भी दान कर दिया था। आज इसी जमीन पर दरभंगा एयरपोर्ट बना है।  

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