इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामले में अभियुक्त पर अपराध संदेह से परे साबित होना अनिवार्य है। किसी पर संदेह होना साक्ष्य का विकल्प नहीं है। इसी के साथ कोर्ट ने रेप और हत्या के मामले में उम्र कैद की सज़ा पाए कानपुर देहात के ओम प्रकाश को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया है। यह निर्णय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्र की खंडपीठ ने ओम प्रकाश की अपील स्वीकार करते हुए दिया है। मामले के तथ्यों के अनुसार 15 फरवरी 1987 को शिकायतकर्ता राजकुमार ने बिल्हौर थाने में रिपोर्ट दर्ज़ कराई थी कि वह व उसके परिवार के लोग अपने भाई रामेश्वर की पत्नी की डिलेवरी के लिए अस्पताल गए थे। घर पर उनके रिश्ते की एक लड़की (मृतका) अकेली थी। इसे देखते हुए वह और उसका भाई घर जल्दी वापस लौट आए। जब वे घर लौटे तो देखा कि ओम प्रकाश व एक अन्य युवक उनके घर से निकल रहे थे। उनके हाथ में चाकू था। ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयानों और अन्य साक्ष्यों पर विश्वास करते हुए ओम प्रकाश को हत्या के लिए उम्र कैद और रेप के लिए सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। इस निर्णय को चुनौती देते हुए यह अपील दाखिल की गई। बचाव पक्ष का कहना था कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा है। चश्मदीद गवाहों की घटनास्थल पर मौजूदगी संदिग्ध है। अभियोजन कहानी से ऐसा लगता है कि गवाहों का घटनास्थल पर पहुंचना और अभियुक्त को अपने घर से निकलते देखना, सब कुछ संयोग से हुआ। पंचनामा रिपोर्ट में भी खामियां हैं। कोर्ट ने तथ्यों के विश्लेषण के बाद ओम प्रकाश को आरोपों से बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा है।


