पॉक्सो पीड़िता को मुआवजा-चोटों का होना जरूरी नहीं:हाईकोर्ट ने कहा, FIR-चार्जशीट में POCSO धारा का उल्लेख तो मुआवजा मिलेगा

पॉक्सो पीड़िता को मुआवजा-चोटों का होना जरूरी नहीं:हाईकोर्ट ने कहा, FIR-चार्जशीट में POCSO धारा का उल्लेख तो मुआवजा मिलेगा

लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पॉक्सो एक्ट के तहत पीड़िता को मुआवजा देने के लिए मेडिकल रिपोर्ट में चोटों का होना अनिवार्य नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि एफआईआर और चार्जशीट में पॉक्सो एक्ट की धारा 4 (पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट) का उल्लेख है, तो मुआवजा रोका नहीं जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने गोंडा जिले की एक नाबालिग पीड़िता की याचिका पर दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि 7 मार्च 2025 को पीड़िता के साथ यौन उत्पीड़न हुआ था। 25 जून 2025 को चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद, उसे उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना, 2015 के तहत मिलने वाला मुआवजा अब तक नहीं मिला था। राज्य सरकार ने दलील दी थी कि मेडिकल रिपोर्ट में पेनेट्रेटिव चोट के साक्ष्य नहीं मिलने के कारण जिला संचालन समिति ने मुआवजे का दावा निरस्त कर दिया था। हालांकि, न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पेनेट्रेटिव यौन उत्पीड़न हर मामले में शारीरिक चोट के रूप में दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने जिला संचालन समिति के निर्णय को कानून के विपरीत बताते हुए निरस्त कर दिया। न्यायालय ने पीड़िता को तीन लाख रुपये का मुआवजा दस दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है। साथ ही, यह भी कहा कि यह योजना पीड़ितों के कल्याण के लिए है और इसे उदारतापूर्वक लागू किया जाना चाहिए।

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