कटिहार में आदिवासी समाज का महापर्व सोहराय पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। नगर निगम क्षेत्र के वार्ड संख्या एक स्थित टीवी सेंटर डुमरीखाल मोहल्ले में आदिवासी समुदाय के लोग पांच दिवसीय इस पर्व को पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार मना रहे हैं। पर्व को लेकर पूरे मोहल्ले में उल्लास का माहौल है। पांच दिवसीय पर्व, घर-घर में उत्सव की तैयारी आयोजक सिद्धू सोरेन और अभिजीत मरांडी ने बताया कि सोहराय आदिवासी समाज का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो हर वर्ष अच्छी फसल और पशुधन की समृद्धि की कामना के साथ मनाया जाता है। इस पर्व के लिए लोगों ने अपने घरों की विशेष रूप से साफ-सफाई की और पारंपरिक चित्रों व सजावट से उन्हें सजाया। साथ ही खेती में सहयोग देने वाले गाय-बैलों को भी नहलाकर, सिंगार कर उत्सव के लिए तैयार किया गया। 10 जनवरी से हुई पर्व की शुरुआत सोहराय पर्व की शुरुआत 10 जनवरी से हुई। पहले दिन मोहल्ले और घरों की साफ-सफाई कर पूजा की तैयारी की गई।दूसरे दिन ‘गोड़ा बोंगा’, जबकि तीसरे दिन ‘खुन्टो बोंगा’ का आयोजन किया गया। इन अवसरों पर लोगों ने अपने गायों और बैलों के साथ पारंपरिक नृत्य किया और मांदर की थाप पर खुशियां मनाईं। टोली बनाकर घर-घर पहुंचा उत्सव पर्व के चौथे दिन कटिहार के मांसाही प्रखंड से आई महिलाओं और पुरुषों की टोली ने एक साथ मिलकर त्योहार मनाया। लोग बांसुरी और मांदर के साथ एक-दूसरे के घर पहुंचे और सामूहिक रूप से नृत्य-संगीत के जरिए पर्व का आनंद लिया। इस दौरान पूरे इलाके में पारंपरिक गीतों और ढोल-मांदर की गूंज सुनाई दी। अंतिम दिन नई फसल से बनेगी खिचड़ी पर्व के अंतिम दिन 14 जनवरी (बुधवार) को खेतों से नई फसल निकालकर खिचड़ी बनाई जाएगी। इसे सामूहिक रूप से ग्रहण कर अच्छी फसल और खुशहाली की कामना की जाएगी। पशुधन के प्रति सम्मान का पर्व है सोहराय सोहराय पर्व मनाने का मुख्य उद्देश्य गायों और बैलों को प्रसन्न करना है, क्योंकि वे खेती-किसानी में अहम भूमिका निभाते हैं। आदिवासी समाज मानता है कि बेजुबान पशु दिन-रात मेहनत कर खेतों को उपजाऊ बनाते हैं, इसलिए उनके सम्मान और देखभाल के लिए यह पर्व मनाया जाता है। बैल नृत्य बना मुख्य आकर्षण इस पर्व का सबसे बड़ा आकर्षण बैल नृत्य होता है। सोहराय के अवसर पर रिश्तेदार और परिजन एक सप्ताह पहले से ही एक-दूसरे के घर जुटने लगते हैं। मांदर की थाप पर गायों और बैलों के साथ किया जाने वाला नृत्य न सिर्फ परंपरा को जीवंत करता है, बल्कि समाज को आपसी मेल-जोल और एकता का संदेश भी देता है। कटिहार में आदिवासी समाज का महापर्व सोहराय पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। नगर निगम क्षेत्र के वार्ड संख्या एक स्थित टीवी सेंटर डुमरीखाल मोहल्ले में आदिवासी समुदाय के लोग पांच दिवसीय इस पर्व को पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार मना रहे हैं। पर्व को लेकर पूरे मोहल्ले में उल्लास का माहौल है। पांच दिवसीय पर्व, घर-घर में उत्सव की तैयारी आयोजक सिद्धू सोरेन और अभिजीत मरांडी ने बताया कि सोहराय आदिवासी समाज का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो हर वर्ष अच्छी फसल और पशुधन की समृद्धि की कामना के साथ मनाया जाता है। इस पर्व के लिए लोगों ने अपने घरों की विशेष रूप से साफ-सफाई की और पारंपरिक चित्रों व सजावट से उन्हें सजाया। साथ ही खेती में सहयोग देने वाले गाय-बैलों को भी नहलाकर, सिंगार कर उत्सव के लिए तैयार किया गया। 10 जनवरी से हुई पर्व की शुरुआत सोहराय पर्व की शुरुआत 10 जनवरी से हुई। पहले दिन मोहल्ले और घरों की साफ-सफाई कर पूजा की तैयारी की गई।दूसरे दिन ‘गोड़ा बोंगा’, जबकि तीसरे दिन ‘खुन्टो बोंगा’ का आयोजन किया गया। इन अवसरों पर लोगों ने अपने गायों और बैलों के साथ पारंपरिक नृत्य किया और मांदर की थाप पर खुशियां मनाईं। टोली बनाकर घर-घर पहुंचा उत्सव पर्व के चौथे दिन कटिहार के मांसाही प्रखंड से आई महिलाओं और पुरुषों की टोली ने एक साथ मिलकर त्योहार मनाया। लोग बांसुरी और मांदर के साथ एक-दूसरे के घर पहुंचे और सामूहिक रूप से नृत्य-संगीत के जरिए पर्व का आनंद लिया। इस दौरान पूरे इलाके में पारंपरिक गीतों और ढोल-मांदर की गूंज सुनाई दी। अंतिम दिन नई फसल से बनेगी खिचड़ी पर्व के अंतिम दिन 14 जनवरी (बुधवार) को खेतों से नई फसल निकालकर खिचड़ी बनाई जाएगी। इसे सामूहिक रूप से ग्रहण कर अच्छी फसल और खुशहाली की कामना की जाएगी। पशुधन के प्रति सम्मान का पर्व है सोहराय सोहराय पर्व मनाने का मुख्य उद्देश्य गायों और बैलों को प्रसन्न करना है, क्योंकि वे खेती-किसानी में अहम भूमिका निभाते हैं। आदिवासी समाज मानता है कि बेजुबान पशु दिन-रात मेहनत कर खेतों को उपजाऊ बनाते हैं, इसलिए उनके सम्मान और देखभाल के लिए यह पर्व मनाया जाता है। बैल नृत्य बना मुख्य आकर्षण इस पर्व का सबसे बड़ा आकर्षण बैल नृत्य होता है। सोहराय के अवसर पर रिश्तेदार और परिजन एक सप्ताह पहले से ही एक-दूसरे के घर जुटने लगते हैं। मांदर की थाप पर गायों और बैलों के साथ किया जाने वाला नृत्य न सिर्फ परंपरा को जीवंत करता है, बल्कि समाज को आपसी मेल-जोल और एकता का संदेश भी देता है।


