‘मुस्लिम परिवार ने शिवलिंग के लिए दान की जमीन’:मोतिहारी में स्थापित होगा विराट शिवलिंग, विक्रेता बोले- हिंदू-मुस्लमान सभी को मिल रहा फायदा

यहां कोई नहीं पूछता कि आप हिंदू हैं या मुसलमान… सभी को बराबर मिल रहा सम्मान। इस शिवलिंग के बनने से नुकसान कहां है? चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, सभी को इसका फायदा मिल रहा है। क्या मुस्लिम परिवार यहां नहीं जी सकता? क्या हमें अधिकार नहीं है? कोई देवता बांटे हुए नहीं हैं। एक ही कलम से राम लिखा जाता है और एक ही कलम से रहीम। फर्क सिर्फ ‘ज़े’ और ‘जबर’ का है। हिंदू-मुस्लिम ये सब लोगों की सोच है। हम सभी इंसान हैं। ये कहना है खिलौना बेचने वाले मोहम्मद जमील का, जो हर दिन 500 से 700 रुपए कमाकर अपना घर चला रहे हैं। दरअसल, पूर्वी चंपारण जिले के कैथवलिया क्षेत्र में विराट रामायण मंदिर बन रहा है। इस भव्य मंदिर परिसर में 17 जनवरी को विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग की स्थापना होने जा रही है। इससे पहले ही यहां श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा है। हालांकि, ये मंदिर करीब 120 एकड़ में बनाया जा रहा है। जिसमें करीब 20 एकड़ जमीन मुस्लिम परिवारों ने भगवान शिव-राम के नाम पर दान दिया है। वहीं, 23 एकड़ जमीन हिंदू परिवार वालों ने दिया है। इसके अलावा बाकी जमीन मंदिर से जुड़े परिवार और सदस्यों ने दान दिया है। मौके पर की कुछ तस्वीरें देखिए… इस जमीन से जुड़ी हकीकत जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड पर पहुंची। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… मंदिर परिसर में एंट्री करते ही सबसे पहले हमारी मुलाकात मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे सदस्यों से हुई, जिन्होंने हमें इसके इतिहास के बारे में बताया। हालांकि, उन्होंने नाम न छापने के शर्त पर कई अहम बातें बताईं हैं। ‘पहले कहीं और स्थापित होने वाला था शिवलिंग’ उन्होंने भास्कर से बातचीत में बताया, ये मंदिर बिहार के किसी और जिले में बनने वाली थी, लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। जहां पर पहले इस शिवलिंग को स्थापित करने की बात थी, वहां पर जमीन को लेकर मामला फंस गया था। एक परिवार ने जमीन देने से इनकार कर दिया था। इसकी वजह से कुछ समय बाद मोतिहारी के कैथवलिया में मंदिर बनाने की बात रखी गई। उन्होंने आगे बताया, इस विराट शिवलिंग के सामने एक कैथवलिया मठ है। विराट रामायण मंदिर जहां बन रही है, वो उसी मठ की जमीन है। यही जमीन बाद में मंदिर के लिए तय की गई। इसके बाद कुछ मुस्लिम परिवार ने भी आगे आकर मंदिर के नाम पर जमीन दान दिया था। इनसे बात करने के बाद हमारी टीम वहां मौजूद कुछ मुस्लिम विक्रेताओं के पास पहुंची। उसने इस मंदिर को लेकर बात की। 75 साल के बुजुर्ग के लिए बना जीवनयापन का सहारा विराट शिवलिंग स्थल के पास बांसुरी बेचने वाले 75 साल के बुजुर्ग मुस्लिम मोहम्मद शमी बताते हैं, उनका जीवन काफी संघर्षों से भरा रहा है। उनकी पत्नी हार्ट और शुगर जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, जिनकी दवाइयों में हर महीने भारी खर्च आता है। बच्चे अपने-अपने काम के सिलसिले में बाहर चले गए हैं और बुजुर्ग दंपती को देखने वाला कोई नहीं है। वे भावुक होकर कहते हैं, इस उम्र में बांसुरी बेचकर जो 200 से 500 रुपए रोज कमाता था, वो सिर्फ दो वक्त की रोटी और दवाई में ही खत्म हो जाते थे। जब से शिवलिंग देखने के लिए लोगों की भीड़ बढ़ी है, हमारी आमदनी भी बढ़ी है। अब हम दवाइयां भी समय पर ले पा रहे हैं और सम्मान से जी पा रहे हैं। 60 किलोमीटर सफर तय कर रोज कमा रहा 700 रुपए एक अन्य मुस्लिम युवक एहसान ने बताया, मैं चार बहनों में इकलौता भाई हूं। मेरे पिता बुजुर्ग हो चुके हैं। वे बाहर जाकर मजदूरी करने में असमर्थ हैं। घर की पूरी जिम्मेदारी मुझपर ही है। चौथी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद मैंने बाहर जाकर मजदूरी की, लेकिन वहां कमाई संतोषजनक नहीं रही। छह महीने पहले मैं गांव लौट आया। यहां कोई काम नहीं मिलने के कारण मैं 6 महीने तक बेरोजगार बैठा था। बहनों की शादी के लिए जोड़ रहे पैसे एहसान आगे बताता है, घर में खाने के लाले थे। बहनों की पढ़ाई तक रुकने लगी थी। जैसे ही मुझे इस शिवलिंग की स्थापना की जानकारी मिली, मैं यहां आ गया। हर दिन 60 किलोमीटर का सफर तय कर गुब्बारे बेचता हूं और 500 से 700 रुपए कमा लेता हूं। अब घर का खर्च भी चल रहा है और बहनों की पढ़ाई भी। एक-एक कर अब सभी बहनों की शादी भी करनी है। इसके लिए कुछ पैसे बचाने होंगे। हिंदू-मुस्लिम सभी को मिल रहा बराबर लाभ स्थानीय मुस्लिम दुकानदारों और फेरीवालों का कहना है, शिवलिंग बनने से किसी तरह का भेदभाव नहीं हो रहा है। सभी धर्मों के लोगों को यहां आने, काम करने और रोजगार कमाने की पूरी आजादी है। खिलौना बेचने वाले मोहम्मद जमील कहते हैं, यहां कोई नहीं पूछता कि आप हिंदू हैं या मुस्लिम… सभी को बराबर सम्मान मिल रहा। मैं हर दिन खिलौने बेचकर 500-600 रुपए कमा लेता हूं और अपने बच्चों की परवरिश अच्छे से कर पा रहा हूं। शिवलिंग से बिहार को मिलेगी वैश्विक पहचान मोहम्मद जमील कहते हैं, मोतिहारी में विराट शिवलिंग की स्थापना से पूरे विश्व में बिहार को एक अलग पहचान मिलेगी। उनका मानना है बिहार में अब तक ऐसा कोई धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल नहीं था, जो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित कर सके। यहां दुकानदार अगर 10 रुपए भी कमा ले, तो उससे अपने और अपने परिवार का पेट पाल सकता है। हम मुस्लिम परिवार वालों के लिए यह कोई चिंता की बात नहीं है, बल्कि शिवलिंग बनने से खुशी का माहौल है। रोज 500-600 रुपए की कमाई, छह बच्चों का सहारा मोहम्मद जमील आगे बताते हैं, हम रोज यहां आएंगे, खिलौना बेचकर कमाएंगे और घर लौट जाएंगे। मेरे छह बच्चे हैं। अब मैं उनकी अच्छी परवरिश कर पा रहा हूं। शिवलिंग स्थल ने मेरे जैसे सैकड़ों गरीब परिवारों को रोजगार दिया है, जो पहले बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। हॉस्पिटल की बात करने वालों से मेरा सवाल मोहम्मद जमील कहते हैं, कुछ लोगों ने उनसे कहा, सरकार को शिवलिंग बनवाने की जगह अस्पताल बनवाना चाहिए था, ताकि लोगों को इलाज की सुविधा मिल सके।इस पर मैं पूछता हूं कि इससे बेहतर और क्या होता? अगर यहां शिवलिंग स्थापित नहीं होता, तो हम गरीबों को रोजगार कहां मिलता। जैसे-जैसे भीड़ बढ़ेगी, हम गरीबों को और काम मिलेगा। नुकसान कहां है, फायदा ही फायदा है जमील का कहना है कि शिवलिंग बनने से किसी समुदाय को नुकसान नहीं हो रहा है। इस शिवलिंग के बनने से नुकसान कहां है? चाहे हिंदू हों या मुस्लिम, सभी को इसका फायदा मिल रहा है। मुस्लिम भाइयों को भी यहां आने की पूरी अनुमति है। न हमें कोई रोक रहा है और न ही हमारे साथ कोई गलत व्यवहार कर रहा है। संघर्ष और ईमानदारी ही असली धर्म वे कहते हैं कि इंसान इस धरती पर संघर्ष और ईमानदारी से कमाकर जीने के लिए आया है। अगर कोई यहां घमंड में रहेगा, तो ऊपर वाला उस घमंड को तोड़ देगा। यहां संभलकर चलना चाहिए। भविष्य में और बढ़ेगी भीड़ मोहम्मद जमील का मानना है कि शिवलिंग का निर्माण पूरा होने के बाद यहां इतनी भीड़ होगी कि लोगों को खड़े होने तक की जगह नहीं मिलेगी। कुछ समय बाद जब यह पूरी तरह तैयार हो जाएगा, तब इसकी सुंदरता और भव्यता सबको दिखेगी। यहां कोई नहीं पूछता कि आप हिंदू हैं या मुसलमान… सभी को बराबर मिल रहा सम्मान। इस शिवलिंग के बनने से नुकसान कहां है? चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, सभी को इसका फायदा मिल रहा है। क्या मुस्लिम परिवार यहां नहीं जी सकता? क्या हमें अधिकार नहीं है? कोई देवता बांटे हुए नहीं हैं। एक ही कलम से राम लिखा जाता है और एक ही कलम से रहीम। फर्क सिर्फ ‘ज़े’ और ‘जबर’ का है। हिंदू-मुस्लिम ये सब लोगों की सोच है। हम सभी इंसान हैं। ये कहना है खिलौना बेचने वाले मोहम्मद जमील का, जो हर दिन 500 से 700 रुपए कमाकर अपना घर चला रहे हैं। दरअसल, पूर्वी चंपारण जिले के कैथवलिया क्षेत्र में विराट रामायण मंदिर बन रहा है। इस भव्य मंदिर परिसर में 17 जनवरी को विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग की स्थापना होने जा रही है। इससे पहले ही यहां श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा है। हालांकि, ये मंदिर करीब 120 एकड़ में बनाया जा रहा है। जिसमें करीब 20 एकड़ जमीन मुस्लिम परिवारों ने भगवान शिव-राम के नाम पर दान दिया है। वहीं, 23 एकड़ जमीन हिंदू परिवार वालों ने दिया है। इसके अलावा बाकी जमीन मंदिर से जुड़े परिवार और सदस्यों ने दान दिया है। मौके पर की कुछ तस्वीरें देखिए… इस जमीन से जुड़ी हकीकत जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड पर पहुंची। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… मंदिर परिसर में एंट्री करते ही सबसे पहले हमारी मुलाकात मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे सदस्यों से हुई, जिन्होंने हमें इसके इतिहास के बारे में बताया। हालांकि, उन्होंने नाम न छापने के शर्त पर कई अहम बातें बताईं हैं। ‘पहले कहीं और स्थापित होने वाला था शिवलिंग’ उन्होंने भास्कर से बातचीत में बताया, ये मंदिर बिहार के किसी और जिले में बनने वाली थी, लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। जहां पर पहले इस शिवलिंग को स्थापित करने की बात थी, वहां पर जमीन को लेकर मामला फंस गया था। एक परिवार ने जमीन देने से इनकार कर दिया था। इसकी वजह से कुछ समय बाद मोतिहारी के कैथवलिया में मंदिर बनाने की बात रखी गई। उन्होंने आगे बताया, इस विराट शिवलिंग के सामने एक कैथवलिया मठ है। विराट रामायण मंदिर जहां बन रही है, वो उसी मठ की जमीन है। यही जमीन बाद में मंदिर के लिए तय की गई। इसके बाद कुछ मुस्लिम परिवार ने भी आगे आकर मंदिर के नाम पर जमीन दान दिया था। इनसे बात करने के बाद हमारी टीम वहां मौजूद कुछ मुस्लिम विक्रेताओं के पास पहुंची। उसने इस मंदिर को लेकर बात की। 75 साल के बुजुर्ग के लिए बना जीवनयापन का सहारा विराट शिवलिंग स्थल के पास बांसुरी बेचने वाले 75 साल के बुजुर्ग मुस्लिम मोहम्मद शमी बताते हैं, उनका जीवन काफी संघर्षों से भरा रहा है। उनकी पत्नी हार्ट और शुगर जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, जिनकी दवाइयों में हर महीने भारी खर्च आता है। बच्चे अपने-अपने काम के सिलसिले में बाहर चले गए हैं और बुजुर्ग दंपती को देखने वाला कोई नहीं है। वे भावुक होकर कहते हैं, इस उम्र में बांसुरी बेचकर जो 200 से 500 रुपए रोज कमाता था, वो सिर्फ दो वक्त की रोटी और दवाई में ही खत्म हो जाते थे। जब से शिवलिंग देखने के लिए लोगों की भीड़ बढ़ी है, हमारी आमदनी भी बढ़ी है। अब हम दवाइयां भी समय पर ले पा रहे हैं और सम्मान से जी पा रहे हैं। 60 किलोमीटर सफर तय कर रोज कमा रहा 700 रुपए एक अन्य मुस्लिम युवक एहसान ने बताया, मैं चार बहनों में इकलौता भाई हूं। मेरे पिता बुजुर्ग हो चुके हैं। वे बाहर जाकर मजदूरी करने में असमर्थ हैं। घर की पूरी जिम्मेदारी मुझपर ही है। चौथी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद मैंने बाहर जाकर मजदूरी की, लेकिन वहां कमाई संतोषजनक नहीं रही। छह महीने पहले मैं गांव लौट आया। यहां कोई काम नहीं मिलने के कारण मैं 6 महीने तक बेरोजगार बैठा था। बहनों की शादी के लिए जोड़ रहे पैसे एहसान आगे बताता है, घर में खाने के लाले थे। बहनों की पढ़ाई तक रुकने लगी थी। जैसे ही मुझे इस शिवलिंग की स्थापना की जानकारी मिली, मैं यहां आ गया। हर दिन 60 किलोमीटर का सफर तय कर गुब्बारे बेचता हूं और 500 से 700 रुपए कमा लेता हूं। अब घर का खर्च भी चल रहा है और बहनों की पढ़ाई भी। एक-एक कर अब सभी बहनों की शादी भी करनी है। इसके लिए कुछ पैसे बचाने होंगे। हिंदू-मुस्लिम सभी को मिल रहा बराबर लाभ स्थानीय मुस्लिम दुकानदारों और फेरीवालों का कहना है, शिवलिंग बनने से किसी तरह का भेदभाव नहीं हो रहा है। सभी धर्मों के लोगों को यहां आने, काम करने और रोजगार कमाने की पूरी आजादी है। खिलौना बेचने वाले मोहम्मद जमील कहते हैं, यहां कोई नहीं पूछता कि आप हिंदू हैं या मुस्लिम… सभी को बराबर सम्मान मिल रहा। मैं हर दिन खिलौने बेचकर 500-600 रुपए कमा लेता हूं और अपने बच्चों की परवरिश अच्छे से कर पा रहा हूं। शिवलिंग से बिहार को मिलेगी वैश्विक पहचान मोहम्मद जमील कहते हैं, मोतिहारी में विराट शिवलिंग की स्थापना से पूरे विश्व में बिहार को एक अलग पहचान मिलेगी। उनका मानना है बिहार में अब तक ऐसा कोई धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल नहीं था, जो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित कर सके। यहां दुकानदार अगर 10 रुपए भी कमा ले, तो उससे अपने और अपने परिवार का पेट पाल सकता है। हम मुस्लिम परिवार वालों के लिए यह कोई चिंता की बात नहीं है, बल्कि शिवलिंग बनने से खुशी का माहौल है। रोज 500-600 रुपए की कमाई, छह बच्चों का सहारा मोहम्मद जमील आगे बताते हैं, हम रोज यहां आएंगे, खिलौना बेचकर कमाएंगे और घर लौट जाएंगे। मेरे छह बच्चे हैं। अब मैं उनकी अच्छी परवरिश कर पा रहा हूं। शिवलिंग स्थल ने मेरे जैसे सैकड़ों गरीब परिवारों को रोजगार दिया है, जो पहले बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। हॉस्पिटल की बात करने वालों से मेरा सवाल मोहम्मद जमील कहते हैं, कुछ लोगों ने उनसे कहा, सरकार को शिवलिंग बनवाने की जगह अस्पताल बनवाना चाहिए था, ताकि लोगों को इलाज की सुविधा मिल सके।इस पर मैं पूछता हूं कि इससे बेहतर और क्या होता? अगर यहां शिवलिंग स्थापित नहीं होता, तो हम गरीबों को रोजगार कहां मिलता। जैसे-जैसे भीड़ बढ़ेगी, हम गरीबों को और काम मिलेगा। नुकसान कहां है, फायदा ही फायदा है जमील का कहना है कि शिवलिंग बनने से किसी समुदाय को नुकसान नहीं हो रहा है। इस शिवलिंग के बनने से नुकसान कहां है? चाहे हिंदू हों या मुस्लिम, सभी को इसका फायदा मिल रहा है। मुस्लिम भाइयों को भी यहां आने की पूरी अनुमति है। न हमें कोई रोक रहा है और न ही हमारे साथ कोई गलत व्यवहार कर रहा है। संघर्ष और ईमानदारी ही असली धर्म वे कहते हैं कि इंसान इस धरती पर संघर्ष और ईमानदारी से कमाकर जीने के लिए आया है। अगर कोई यहां घमंड में रहेगा, तो ऊपर वाला उस घमंड को तोड़ देगा। यहां संभलकर चलना चाहिए। भविष्य में और बढ़ेगी भीड़ मोहम्मद जमील का मानना है कि शिवलिंग का निर्माण पूरा होने के बाद यहां इतनी भीड़ होगी कि लोगों को खड़े होने तक की जगह नहीं मिलेगी। कुछ समय बाद जब यह पूरी तरह तैयार हो जाएगा, तब इसकी सुंदरता और भव्यता सबको दिखेगी।  

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