Pakistan Economic Crisis: पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली अब सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों (SOEs) के प्रदर्शन से साफ नजर आ रही है। वित्त वर्ष 2025 (FY25) में इन कंपनियों का शुद्ध घाटा 300% बढ़कर 122.9 अरब रुपये हो गया, जबकि पिछले साल यह महज 30.6 अरब रुपये था। वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट और द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के संपादकीय ने इसे “भयानक संरचनात्मक विफलता” करार दिया है, जो सार्वजनिक संसाधनों को लगातार चूस रही है और आर्थिक स्थिरता को कमजोर कर रही है।
पाकिस्तान राजस्व में भारी गिरावट
राजस्व में भारी गिरावट आई है। कुल राजस्व 1.4 ट्रिलियन रुपये घटकर 12.4 ट्रिलियन रुपये रह गया। लाभ कमाने वाली SOEs के मुनाफे में 13% की कमी आई (709.9 अरब रुपये), जबकि घाटे वाली कंपनियों के नुकसान में मामूली सुधार के बावजूद कुल घाटा बढ़ा। सरकार ने इन कंपनियों को 2.1 ट्रिलियन रुपये की वित्तीय मदद दी, जो करदाताओं के पैसे से दी गई है। यह मदद मुख्य रूप से इक्विटी इंजेक्शन और सर्कुलर डेट क्लियर करने के लिए थी।
रेलवे और स्टीम मिल्स में भी भारी नुकसान
मेजर घाटे वाली संस्थाएं जैसे नेशनल हाईवे अथॉरिटी (NHA), बिजली वितरण कंपनियां (DISCOs जैसे PESCO, QESCO), पाकिस्तान रेलवे और पाकिस्तान स्टील मिल्स अभी भी भारी नुकसान में हैं। ये संस्थाएं लंबे समय से संरचनात्मक खामियों, परिचालन अक्षमताओं और राजनीतिक हस्तक्षेप से जूझ रही हैं। सुधार की बातें होती हैं, लेकिन ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
गरीबों की हालत बदतर
सरकार ‘पेपर ग्रोथ’ को बढ़ावा दे रही है, जैसे रियल एस्टेट सेक्टर, जहां अमीर वर्ग अपनी संपत्ति पार्क कर बढ़ाते हैं। इससे जीडीपी में कागजी बढ़ोतरी दिखती है, लेकिन वास्तविक निवेश और रोजगार नहीं बढ़ता। गरीबों की हालत बदतर हो गई है। 2019 के बाद से सबसे गरीब 20% परिवारों की वास्तविक मासिक आय में लगभग 12% की गिरावट आई है, जबकि सबसे अमीर वर्ग की आय में 7% की बढ़ोतरी हुई। यह तब हुआ जब अर्थव्यवस्था गिरावट में थी, गरीबी बढ़ी और औसत वेतन घटा। कुल बचत में 66% की कमी आई, क्योंकि लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जमा पूंजी खर्च कर रहे हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च में 19% की गिरावट दर्ज हुई, जो देश के भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।
11.7 ट्रिलियन रुपये तक पहुंचा कर्ज
SOEs का कुल कर्ज और देयताएं 11.7 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना सुधार के यह बोझ बढ़ता रहेगा। सरकार प्राइवेटाइजेशन पर जोर दे रही है, लेकिन अब तक ज्यादा सफलता नहीं मिली। यह स्थिति पाकिस्तान की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और गंभीर आर्थिक संकट को उजागर करती है। अगर सुधार नहीं हुए, तो करदाता और गरीब तबके पर बोझ और बढ़ेगा।


