स्मॉग बन रही गंभीर समस्या मिलकर उठाने होंगे कदम

स्मॉग बन रही गंभीर समस्या मिलकर उठाने होंगे कदम

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार

एक समय था जब सर्दी के मौसम का अहसास ही तब होता था जब पाला और कोहरा वाले हालात बनते थे। पाला जहां खेती-किसानी के लिए अमृत वर्षा के समान होता है वहीं कोहरे की बूंदें भी खेती में लाभकारी ही रही हैं। पर अब पाला-कोहरा का स्थान जानलेवा स्मॉग लेता जा रहा है। दरअसल स्मॉग स्मोक और फॉग से बना है। स्मोक का अर्थ धुआं है तो फॉग का अर्थ कोहरा है। जैसे-जैसे प्रदूषण का स्तर बढ़ा, स्मॉग के पांव जमने लगे और उसी का परिणाम है कि आज दुनिया के अधिकांश देश स्मॉग की समस्या से दो-चार हो रहे हैं। चीन में यह समस्या लंबे समय से है पर पिछले कुछ सालों से दिल्ली-एनसीआर के लिए स्मॉग आम होता जा रहा है। स्मॉग के कारण सड़क दुर्घटनाओं तथा हवाई यात्राओं सहित रेल परिवहन तक प्रभावित होने के समाचार आते रहे हैं।

स्मॉग हमारे स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर डाल रहा है। आंख, कान, नाक, गले में जलन, खांसी, घबराहट, सांस लेने में दिक्कत ही नहीं अपितु अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, हृदय रोग और सीओपीडी जैसी बीमारियों का कारण बन रहा है स्मॉग। सर्दियों में अब मास्क, इन्हेलर, एयर प्यूरिफायर जैसी वस्तुएं भी जरूरी हो गई हैं। एक समय था जब बीजिंग दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में से एक थी और कहते हैं कि लगभग 20 लाख लोगों की मौत प्रतिवर्ष स्मॉग के कारण हो जाती थी। चीन ने कठोर कदम उठाए, प्रशासनिक स्तर पर सख्ती दिखाई और पुराने अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया। स्वच्छ व हरित ऊर्जा को बढ़ावा दिया, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत किया। वाहनों या किसी भी तरह के ईंधन से होने वाले प्रदूषण उत्सर्जन के मानक तय कर सख्ती से पालना सुनिश्चित की। आज हम दिल्ली-एनसीआर की ही बात करें तो एक लाख से अधिक नए वाहन प्रतिवर्ष आ रहे हैं। ईवी के प्रति लोगों का रुझान तो हुआ है पर अभी गिनती के ईवी वाहन ही दिखाई देते हैं। स्मॉग आज गंभीर समस्या बनती जा रही है। यह हालात हमारे द्वारा ही बनाए गए हैं। ऐसे में इसके निराकरण के उपाय भी हमें ही खोजने होंगे।

स्मॉग से बचाव के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है वाहनों और उद्योगों द्वारा उगले जाना वाला धुआं कम करना। सभी जानते हैं कि यातायात पर दबाव कम करने के लिए नागरिकों को निजी वाहनों के स्थान पर सार्वजनिक वाहनों से दैनिक कार्य निपटाने पर प्रेरित किया जाना चाहिए, लेकिन अभी तक अधिकांश शहरों में सार्वजनिक यातायात व्यवस्था इस हालात में नहीं है कि वह इस जरूरत को पूरा कर सके। सरकार को प्रदूषण नियंत्रित करने वाले उपकरणों को भी बढ़ावा देना होगा। लोगों में जागरूकता भी लानी होगी और इसके लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को आगे आना होगा।

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