ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए फेमस राजगीर अब प्रवासी पक्षियों का भी पसंदीदा ठिकाना बनता जा रहा है। वन विभाग की ओर से कराए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि बीते 11 महीनों में यहां प्रवासी पक्षियों की प्रजातियों की संख्या 29 से बढ़कर 33 हो गई है। दो चरणों में हुआ व्यापक सर्वेक्षण वन विभाग ने राजगीर सफारी और आसपास के इलाकों में दो चरणों में सर्वेक्षण कराया। फरवरी 2025 में पहले चरण के दौरान पक्षियों की 109 प्रजातियां मिलीं, जिनमें से 29 प्रवासी थी। दिसंबर में किए गए दूसरे चरण में आसपास की पहाड़ियों को भी शामिल किया गया और कुल 135 प्रजातियां दर्ज की गईं, जिनमें से 33 प्रवासी पक्षी थे। यह वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि ठंड के मौसम में यहां का वातावरण इन विदेशी मेहमानों के लिए अधिक अनुकूल हो जाता है। यूरोप, मध्य एशिया, विशेषकर रूस, साइबेरिया और हिमालयी क्षेत्रों से हजारों किलोमीटर की यात्रा तय कर ये पक्षी यहां पहुंचते हैं। नालंदा में पहली बार दिखा यूरेशियन स्पैरोहॉक इस बार के सर्वेक्षण में एक खास उपलब्धि ‘यूरेशियन स्पैरोहॉक’ का नालंदा जिले में पहली बार दिखना रहा। इसके अलावा स्केली थ्रश, ऑरेंज-हेडेड थ्रश, टिकेल्स थ्रश, इंडियन पिट्टा, लार्ज हॉक-कुक्कू, साइबेरियन स्टोनचैट, हिमालयन बजर्ड, बोनेलीज ईगल, ब्लैक-विंग्ड काइट जैसे दुर्लभ और सुंदर पक्षी भी देखे गए। विशेष रूप से वॉबलर प्रजाति के 11 प्रकार के पक्षी मिले हैं, जिनमें बूटेड वॉबलर, सल्फर-बेलिड वॉबलर, येलो-ब्राउड वॉबलर, टिकेल्स लीफ वॉबलर, कॉमन चिफचाफ और ग्रीनिश वॉर्बलर प्रमुख हैं। ये सभी मध्य-एशियाई प्रवासी पक्षी हैं जो स्वस्थ वन आवासों पर निर्भर करते हैं। साइबेरिया की ठंडी वादियों से राजगीर की गर्म शरण तक सर्वेक्षण में पिन-टेल्ड स्नाइप की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह लंबी दूरी तय करने वाली प्रवासी पक्षी उत्तरी रूस और साइबेरिया की आर्द्रभूमियों एवं टुंड्रा क्षेत्रों में प्रजनन करती है और शीतकाल में भारत, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रवास करती है। राजगीर के जंगली और नमी वाले इलाके इनके लिए आदर्श आश्रय साबित हो रहे हैं। इसी तरह टिकेल्स ब्लू फ्लायकैचर, इंडियन पैराडाइज फ्लायकैचर, ब्लू-थ्रोटेड ब्लू फ्लायकैचर, टैगा फ्लायकैचर और रेड-ब्रेस्टेड फ्लायकैचर जैसे फ्लायकैचर भी यहां दर्ज किए गए। ये हिमालयी और मध्य एशियाई प्रवासी प्रणालियों से जुड़े हुए हैं। पारिस्थितिकी संरक्षण के सार्थक प्रयास राजगीर जू सफारी के निदेशक राम सुन्दर एम का कहना है कि यह सर्वेक्षण राजगीर वन्यजीव अभयारण्य की पारिस्थितिकी महत्ता को रेखांकित करता है। यहां प्रवासी और आवासीय दोनों प्रकार के पक्षियों के लिए सुरक्षित शीतकालीन आश्रय उपलब्ध है। हमने सफारी गाइडों को प्रवासी पक्षियों को पहचानने का प्रशिक्षण दिया है ताकि पर्यटकों को इनके बारे में विस्तृत जानकारी मिल सके। वन विभाग की ओर से मृदा एवं नमी संरक्षण की पहल की जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप जलाशयों में जल स्तर बढ़ा है और प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां निर्मित हुई हैं। पर्यटन को मिलेगा नया आयाम राजगीर का परिदृश्य यूरोप और मध्य एशिया से भारतीय उप-महाद्वीप तक फैले अंतरराष्ट्रीय प्रवासी पक्षी मार्गों से जुड़ा हुआ है। यह भौगोलिक स्थिति राजगीर को पक्षी प्रेमियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण गंतव्य बना रही है। जू सफारी अब केवल स्तनधारियों और बड़े प्राणियों पर केंद्रित नहीं है। पक्षियों की चहचहाहट और मधुर स्वर इस परिदृश्य की सुंदरता को और बढ़ाते हैं। ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए फेमस राजगीर अब प्रवासी पक्षियों का भी पसंदीदा ठिकाना बनता जा रहा है। वन विभाग की ओर से कराए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि बीते 11 महीनों में यहां प्रवासी पक्षियों की प्रजातियों की संख्या 29 से बढ़कर 33 हो गई है। दो चरणों में हुआ व्यापक सर्वेक्षण वन विभाग ने राजगीर सफारी और आसपास के इलाकों में दो चरणों में सर्वेक्षण कराया। फरवरी 2025 में पहले चरण के दौरान पक्षियों की 109 प्रजातियां मिलीं, जिनमें से 29 प्रवासी थी। दिसंबर में किए गए दूसरे चरण में आसपास की पहाड़ियों को भी शामिल किया गया और कुल 135 प्रजातियां दर्ज की गईं, जिनमें से 33 प्रवासी पक्षी थे। यह वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि ठंड के मौसम में यहां का वातावरण इन विदेशी मेहमानों के लिए अधिक अनुकूल हो जाता है। यूरोप, मध्य एशिया, विशेषकर रूस, साइबेरिया और हिमालयी क्षेत्रों से हजारों किलोमीटर की यात्रा तय कर ये पक्षी यहां पहुंचते हैं। नालंदा में पहली बार दिखा यूरेशियन स्पैरोहॉक इस बार के सर्वेक्षण में एक खास उपलब्धि ‘यूरेशियन स्पैरोहॉक’ का नालंदा जिले में पहली बार दिखना रहा। इसके अलावा स्केली थ्रश, ऑरेंज-हेडेड थ्रश, टिकेल्स थ्रश, इंडियन पिट्टा, लार्ज हॉक-कुक्कू, साइबेरियन स्टोनचैट, हिमालयन बजर्ड, बोनेलीज ईगल, ब्लैक-विंग्ड काइट जैसे दुर्लभ और सुंदर पक्षी भी देखे गए। विशेष रूप से वॉबलर प्रजाति के 11 प्रकार के पक्षी मिले हैं, जिनमें बूटेड वॉबलर, सल्फर-बेलिड वॉबलर, येलो-ब्राउड वॉबलर, टिकेल्स लीफ वॉबलर, कॉमन चिफचाफ और ग्रीनिश वॉर्बलर प्रमुख हैं। ये सभी मध्य-एशियाई प्रवासी पक्षी हैं जो स्वस्थ वन आवासों पर निर्भर करते हैं। साइबेरिया की ठंडी वादियों से राजगीर की गर्म शरण तक सर्वेक्षण में पिन-टेल्ड स्नाइप की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह लंबी दूरी तय करने वाली प्रवासी पक्षी उत्तरी रूस और साइबेरिया की आर्द्रभूमियों एवं टुंड्रा क्षेत्रों में प्रजनन करती है और शीतकाल में भारत, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रवास करती है। राजगीर के जंगली और नमी वाले इलाके इनके लिए आदर्श आश्रय साबित हो रहे हैं। इसी तरह टिकेल्स ब्लू फ्लायकैचर, इंडियन पैराडाइज फ्लायकैचर, ब्लू-थ्रोटेड ब्लू फ्लायकैचर, टैगा फ्लायकैचर और रेड-ब्रेस्टेड फ्लायकैचर जैसे फ्लायकैचर भी यहां दर्ज किए गए। ये हिमालयी और मध्य एशियाई प्रवासी प्रणालियों से जुड़े हुए हैं। पारिस्थितिकी संरक्षण के सार्थक प्रयास राजगीर जू सफारी के निदेशक राम सुन्दर एम का कहना है कि यह सर्वेक्षण राजगीर वन्यजीव अभयारण्य की पारिस्थितिकी महत्ता को रेखांकित करता है। यहां प्रवासी और आवासीय दोनों प्रकार के पक्षियों के लिए सुरक्षित शीतकालीन आश्रय उपलब्ध है। हमने सफारी गाइडों को प्रवासी पक्षियों को पहचानने का प्रशिक्षण दिया है ताकि पर्यटकों को इनके बारे में विस्तृत जानकारी मिल सके। वन विभाग की ओर से मृदा एवं नमी संरक्षण की पहल की जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप जलाशयों में जल स्तर बढ़ा है और प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां निर्मित हुई हैं। पर्यटन को मिलेगा नया आयाम राजगीर का परिदृश्य यूरोप और मध्य एशिया से भारतीय उप-महाद्वीप तक फैले अंतरराष्ट्रीय प्रवासी पक्षी मार्गों से जुड़ा हुआ है। यह भौगोलिक स्थिति राजगीर को पक्षी प्रेमियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण गंतव्य बना रही है। जू सफारी अब केवल स्तनधारियों और बड़े प्राणियों पर केंद्रित नहीं है। पक्षियों की चहचहाहट और मधुर स्वर इस परिदृश्य की सुंदरता को और बढ़ाते हैं।


