सर्दी का सीजन अपने अंतिम दौर में है, लेकिन इस बार मौसम ने मध्य प्रदेश में एक असामान्य स्थिति बनाई। करीब ढाई महीने की सर्दी गुजर जाने के बावजूद प्रदेश में शीतकालीन बारिश यानी मावठे की एक भी बूंद नहीं गिरी। मौसम विशेषज्ञ इसे सूखी ठंड या ड्राई विंटर बता रहे हैं। इसका असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हवा में नमी न होने से सेहत, खेती और आगे के मौसम चक्र पर भी खतरे के संकेत दिखाई देने लगे हैं। आमतौर पर 1 नवंबर से 28 फरवरी के बीच दिसंबर-जनवरी में हल्का मावठा होता है। यही बारिश मिट्टी में नमी बनाए रखती है, जो फसलों को संजीवनी देती है और ठंड को संतुलित करती है। इस बार कड़ाके की ठंड के कई रिकॉर्ड बने, लेकिन हवा पूरी तरह शुष्क रही और आसमान ज्यादातर साफ रहा। असर : सेहत पर
हमीदिया के पल्मोनरी विभाग के एचओडी डॉ. लोकेंद्र दवे बताते हैं कि सूखी ठंड में शरीर की प्राकृतिक नमी तेजी से खत्म होती है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है। श्वसन तंत्र के संक्रमण, सर्दी-खांसी, वायरल फीवर, गले में खराश और एलर्जी के मामले बढ़ते हैं। अस्थमा और एलर्जी के मरीजों को दिक्कत होती है। दबाव : खेती पर
कृषि विशेषज्ञ योगेश द्विवेदी के अनुसार गेहूं, चना और सरसों के लिए मावठा संजीवनी होता है। इसके नहीं होने से ज्यादा सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे लागत बढ़ी है। मिट्टी की ऊपरी परत सूखने और न्यूनतम तापमान गिरने से पाले का खतरा बढ़ गया है। आलू, टमाटर और मटर में कीट और वायरस का प्रकोप बढ़ने की आशंका है। खतरा : मौसम पर
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि सर्दी में नमी की कमी का असर आगे भी दिख सकता है। मार्च में तेज गर्मी, प्री-मानसून में आंधी-तूफान और ओलावृष्टि की घटनाएं बढ़ सकती हैं। मानसून की शुरुआती चाल में भी बदलाव की आशंका है। सर्दियों में वायुमंडल को जरूरी नमी नहीं मिलती, तो मौसम का संतुलन चक्र बिगड़ जाता है। क्यों नहीं हुआ मावठा… मौसम वैज्ञानिक एके शुक्ला के मुताबिक इस साल स्ट्रॉन्ग वेस्टर्न डिस्टर्बेंस सक्रिय नहीं रहा। जो पश्चिमी विक्षोभ आए भी, वे कमजोर थे। इससे मध्य भारत तक नमी पहुंच ही नहीं पाई। न बादल बने और न बारिश की स्थिति बनी। नतीजा यह हुआ कि रात के तापमान में अचानक गिरावट आई और ठंड तीखी होती चली गई।


