ईरानी डेरे से आपराधिक गतिविधियों के संचालन और अपराधियों को पनाह देने का सिलसिला 1970 के दशक से चल रहा है। शुरुआत में मुख्य केंद्र रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर-6 के पास था। यहां से लूट, झपटमारी के साथ सरकारी और निजी जमीनों पर कब्जे किए गए और अवैध प्लॉटिंग कर मोटी कमाई की। कब्जों के मामलों में सफेदपोशों की भागीदारी भी सामने आती रही। 2012 में ईरानी डेरे के 30 से अधिक परिवार सरदार राजू ईरानी के साथ करोंद की अमन कॉलोनी पहुंचे। यहां दो एकड़ जमीन औने-पौने दाम पर लेने के बाद सरकारी जमीन पर कब्जा कर डेरा बसाया। कुछ परिवार भानपुर में भी बसे, जहां से आपराधिक गतिविधियां संचालित होती रहीं। भोपाल स्टेशन और अमन कॉलोनी दोनों ईरानी डेरों की कमान फिलहाल राजू ईरानी के पास है। इससे पहले उसके पिता हसमत ईरानी सरदार थे। राजू के सरदार बनने के बाद गैंग ने भोपाल, मप्र और अन्य राज्यों में वारदातें बढ़ा दीं। राजू पर 21 केस, सरकारी जमीन पर भी कब्जे किए राजू ईरानी पर पहला मुकदमा 2006 में अपहरण का दर्ज हुआ। इसके बाद 2014, 2015, 2016 और 2020 में गंभीर धाराओं में केस दर्ज हुए। उसने गैंग को अलग-अलग ग्रुप में बांटकर संगठित तरीके से संचालित किया। वह नकली सीबीआई और कस्टम अफसर बनकर यूपी, महाराष्ट्र और राजस्थान में वारदात कर चुका है। उसका भाई जाकिर ईरानी गिरोह में दूसरे नंबर पर है और प्रॉपर्टी कब्जाने में माहिर है। किसानों को धमकाकर जमीनें हड़पीं… 1980 के दशक से ईरानी गैंग राजधानी में अवैध कब्जे और प्लॉटिंग में सक्रिय रही। करोंद, भानपुर और विदिशा रोड के ग्राम चोपड़ा में किसानों को धमकाकर जमीनें ली गईं और प्लॉटिंग की गई। गैंग के बाबा कीर ईरानी, सालिक ईरानी, तालिब ईरानी और काला ईरानी भी लूट, स्नेचिंग और अड़ीबाजी में सक्रिय रहे हैं। पूरी प्लानिंग के साथ होती थीं वारदातें… गैंग वारदात के दौरान एक बैकअप टीम तैयार रखती है। पकड़े जाने पर आरोपी को गलत नाम बताने की ट्रेनिंग दी जाती है। लूट का माल किसी भी हालत में सरदार तक पहुंचाया जाता था। राजू आरोपी की जमानत और उसके परिवार की देखरेख करता था। डेरों को सुरक्षित रखने के लिए महिलाओं और बच्चों को आगे किया जाता है।


